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मेरी रेल यात्रा और भा‍वी पुलिस वालों की जिंदादिली

रेल यात्रामैंने अपने चारों ओर नजर घुमा के देखा तो पाया कि ट्रेन के हर कोने में पसरी हुई थी एक चुटकी जिंदगी. हर वो चुटकी भर जिंदगी अपने आप में खास थी. किसी के पूरे संसार की आस थी वो चुटकी भर जिंदगी. रात के 12:30 बजे थे. हमारी ट्रेन ग्वालियर से बीकानेर जा रही थी. जब मैं भरतपुर से ट्रेन में चढ़ी तो भगवान को लाख-लाख धन्यवाद किया कि इतनी विकट परिस्थिति में मुझे एक आरामदेह सीट नसीब हुई. मैं एक लड़की थी इसलिये या मेरी किस्मत अच्‍छी थी. मैंने ऐसा इसलिये कहा क्योंकि अगले दिन राजस्थान में पुलिस भर्ती की परीक्षा थी.

रेल यात्रा

रेल यात्रामैंने अपने चारों ओर नजर घुमा के देखा तो पाया कि ट्रेन के हर कोने में पसरी हुई थी एक चुटकी जिंदगी. हर वो चुटकी भर जिंदगी अपने आप में खास थी. किसी के पूरे संसार की आस थी वो चुटकी भर जिंदगी. रात के 12:30 बजे थे. हमारी ट्रेन ग्वालियर से बीकानेर जा रही थी. जब मैं भरतपुर से ट्रेन में चढ़ी तो भगवान को लाख-लाख धन्यवाद किया कि इतनी विकट परिस्थिति में मुझे एक आरामदेह सीट नसीब हुई. मैं एक लड़की थी इसलिये या मेरी किस्मत अच्‍छी थी. मैंने ऐसा इसलिये कहा क्योंकि अगले दिन राजस्थान में पुलिस भर्ती की परीक्षा थी.

स्टेशन पर कभी न खत्म होने वाले हुजूम को देख कर मुझे लगा कि शायद मुझे उल्‍टे पांव लौट जाना चाहिये. बड़ी मशक्‍कत करके मैं ट्रेन में घुस पाई. ट्रेन के डिब्बे के सभी दरवाजे-खिडकियां बंद कर दी गईं. पता चला कि पुलिस की भर्ती के लिये साढ़े छह लाख लड़के परीक्षा देने जा रहे हैं. बस फिर क्या था. लड़कों की बेइन्तहा भीड़ को देख कर ट्रेन के सभी दरवाजे स्टेशन आने पर भी बंद ही रखे गये. लड़कों ने भी ट्रेन को जाने की अनुमति नहीं दी. हर स्टेशन पर आधा घंटे तक ट्रेन में घुसने की मशक्‍कत करते असफल रहने के बाद आखिरकार ट्रेन की छत पर ही चढ़ जाते. इस तरह आधी रात को ट्रेन की ठत पर बैठे हजारों लड़के “बोल कन्हैया लाल की जय” के नारे लगाते हुए जनवरी की बर्फीली सर्दी को टक्कर दे रहे थे.

ट्रेन के डिब्बे में हमारी हालत कुछ अलग ही थी. दिल में डर था कि इतने लड़के कुछ कर न दें. किसी ने जब कहा कि इस बेकाबू भीड़ को देखने के लिए पुलिस कहां हैं? तो जवाब आया कि ट्रेन के अंदर और बाहर ‘भावी पुलिस’ ही तो हैं. लड़के तो छत पर नारे लगा रहे थे लेकिन परीक्षा में बैठने वाली लड़कियां शायद ट्रेन में चढ़ ही नहीं पाईं. ट्रेन का चालक किसी दुर्घटना के डर से लडकों के सुरक्षित बैठ जाने का इंतजार करता और फिर ट्रेन चलाता. कोई पुलिस में भ्रष्टाचार पर बहस कर रहा था तो ‘भावी पुलिस’ उनको मुहतोड़ जवाब दे रही थी. कोई देश में युवाओं की बढ़ती बेरोजगारी पर चिंता व्यक्त कर रहा था. इस ठण्‍ड में ट्रेन की छत पर बैठे लड़के अपनी परीक्षा के लिये सकुशल रहेंगे, इस पर भी एक सावालिया निशान रूच‍िलगाया जा रहा था. लेकिन जिस युवा शक्ति ने पूरे राजस्थान को आधी रात में अपने हौंसले, जोश और नारों से जगा रखा था – उसके लिये उनकी जिंदादिली को सलाम करना लाजमी है.

लेखिका रुचि कौशल माखन लाल पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय की नोएडा शाखा में अध्‍ययनरत हैं.

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