यह क्या हाल बना रखा है…? क्या से क्या हो गए हो…? तुम खुश तो नहीं हो मगर चेहरे पर ख़ुशी का मुखौटा चढ़ाये घूम रहे हो. तुम्हारे आस पास ऐसा कुछ भी नहीं घट रहा है जो तुम्हें सुकून की घड़ियाँ दे सके, मगर तुम शांत होने का नाटक कर रहे हो. तुम्हारे अपने बेगाने हो रहे हैं और तुम ख़ुद अपनों को बेगाना बना रहे हो, मगर तुम्हें लगता है कि तुमने नए नए लोगों से पहचान बढ़ा ली है. तुम्हें मानने और जानने वालों की एक लम्बी क़तार लगी है, जो तुम्हारे ज़रा से इशारे पर तुम पर सब कुछ लुटा देगी…!! लेकिन यह तो तुम्हारा मानना है… जानने वाली बात तो यह है कि यह सब कोरी बकवास भर है, झूठ है, फरेब है और सच तो यह है कि तुम ने रेत में सर डाल रखा है और सच्चाई का सामना करने से डरते हो…डरो नहीं सचाई का सामना करो…!!!
तुम्हें जो दिखाई दे रहा है वह अगर ऐसा नहीं है तो फिर इसका पता तुम्हें क्यों नहीं चल रहा है….? क्यों तुम इससे अनजान हो… तुम्हारी बातें, तुम्हारी शिक्षा, तुम्हारा तजुर्बा तो चीख़-चीख़ कर कह रहा है कि तुम उड़ती चिड़िया के पर गिन सकता हो, लेकिन तुम्हारे साथ जो बीत रहा है उस पर तुम्हारी नज़र क्यों नहीं ठहरती है…? कहीं ऐसा तो नहीं रोज़ी रोटी के लिए दूसरों की ग़ुलामी ने तुमसे तुम्हारा आप ही छीन लिया है… या तुम दूसरों की चिंता में ख़ुद अपना ख्याल ही भूल गए हो….???
सच तो यह है मेरे भाई तुम बिखर गए हो…. टूट गए हो… और ख़ुद से कहीं दूर छूट गए हो… और इसकी ख़बर अभी तक तुम्हें नहीं हुई है, क्योंकि तुम इस तेज़ रफ़्तार ज़िन्दगी से रफ़्तार मिलाने की ज़िद में अपने बारे में सोचने से परहेज़ करने लगे हो… तुम बचते हो… ख़ुद पर ग़ौर करने से… तुम दूर भागते हो ख़ुद को आवाज़ लगाने से… तुम घबराते हो ख़ुद को ढूँढ के लाने से… और सच कहूँ तो तुम डरते हो कहीं अपने आप से तुम्हारी भेंट न हो जाए और यह मुलाक़ात तुम्हें पागल न बना दे.
हाँ तुमने सोचना छोड़ दिया है… तुम भाग रहे हो सोचने से… क्योंकि यह सोच बता देगी कि जिसे तुम हासिल समझ रहे हो वह तो केवल घाटा है… तुम सोचते ही नहीं… तुम ज़िन्दगी के बारे में नहीं सोचते… तुम इराक़, ईरान, अमरीका, रूस, चीन और जापान सब सोच लेते हो पर अपने घर और गुलिस्तान के बारे में नहीं सोचते… उबामा-उसामा पर बहस में तुम्हारा जवाब नहीं… तुम हर प्रकार की चर्चा में आगे आगे हो मगर ख़ुद से कभी अपने बारे में चर्चा नहीं करते… तुम्हारी देश की राजनीति पर मज़बूत पकड़ है मगर क्या तुम ख़ुद की पकड़ में हो….???
तुम ख़ुद को गिरफ्तार करते हुए डरते हो…. तुम्हें भय है कि कहीं तुम अपनी असली हालत पर सोचते-सोचते दीवार से सर न टकरा के मर जाओ… सोचो तुम क्या क्या सपने लेकर घर से चले थे… और कहाँ आ पहुंचे… यह ही सोच लो तो मन भारी हो जायेगा… मगर सोचते नहीं हो… सोचोगे तो दिमाग़ सुन्न हो के रह जायेगा… सब छिन जायेगा… लुट जायेगा और तुम जंगल की तरफ भागोगे… मुझे मिल गया… मुझे मिल गया… चिल्लाते हुए… क्या तुम ऐसा कर पाओगे… क्या तुम ख़ुद को पा सकोगे… रात-दिन ख़ुद से… अपने परिवार से दूर भागने वाले इंसान… सोचा करो… सोचा करो कि तुम क्या से क्या हो गए हो… क्यों तुम उन लोगों से मुकाबला कर रहे हो जिनके जैसे तुम बन नहीं सकते… क्यों उनकी नक़ल उतार रहे हो जिनके पास दौलत का अम्बार लगा है… तुम सोचना… सोचना कि उनके जैसा लगने के चक्कर में तुम ख़ुद जैसा लगना भी भूल गए हो… यह घर-बार… यह गाड़ियों की क़तार का चक्कर… फ्लैट पर फ्लैट लेने की होड़… ब्रांडेड कपड़ों के पीछे की भागदौड़… आराम तलबी…तुम्हें कहीं का भी नहीं रखेगी… तुम तुम रहो… तो अच्छा है… यही तुम्हारे लिए और सभी के लिए अच्छा है… मुक़ाबले की अंधी दौड़ में मत कूदो….!!
यह मुक़ाबला क्या है… भला उसकी क़मीज़ मेरी क़मीज़ से सफ़ेद कैसी से क्या फ़र्क़ पड़ता है… उसके घर में बिग स्क्रीन या स्माल स्क्रीन टीवी से तुम्हारा क्या जाता है… तुम छोटी गाड़ी या बड़ी गाड़ी के चक्कर में क्यों पड़ते हो… जाना तो एक जगह से दूसरी जगह ही है… तुम्हारा मोबाइल कोई भी हो क्या फ़र्क़ पड़ता है… उससे आख़िर में फ़ोन ही तो करना है…क्यों दिखावे पर जाते हो… सोचा करो… सोचा करो कि क्या तुम वाक़ई सही कर रहे हो दोनों तरफ से अपनी मोमबत्ती जला कर… सोचा करो कि आज हर चीज़ हो जाने के बाद भी तुम्हारा समय कौन चुरा ले जाता है… कल जब तुम्हारे पास तेज़ रफ्तारी के साधन नहीं थे तब तुम्हारे पास कितना समय था, मगर आज गाड़ी, फैक्स, मोबाइल, इन्टरनेट सुविधा, सब कुछ है मगर समय कहाँ गया…?? सोचना… घबराना नहीं… सोचना कि कहीं तुम दिखावे पर तो नहीं जा रहे हो… तुम तो आजकल सुन ही रहे होगे… दिखावे पर मत जाओ अपनी अक़ल लगाओ… और अक़ल के लिए सोचना ज़रूरी है… डरो नहीं सोचके देखो…!!! अपने बारे में सोच के देखो क्यों यह दुनिया तुम्हें सताती है, तुम भटकते हो देखते ही नहीं, ज़िन्दगी रास्ता दिखाती है.
लेखक तहसीन मुनव्वर बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं. पत्रकारिता से लेकर लेखन तक के कई आयाम नापे हैं. पत्रकार हैं, एंकर हैं, शायर हैं, लेखक हैं, टीचर हैं, कवि हैं, गीतकार हैं, कहानीकार हैं यानी कई शख्सीयतों के संगम हैं. हिंदी, उर्दू, पंजाबी सहित कई भाषाओं के जानकार हैं. विज्ञापनों और जिंगल से लेकर फिल्मों, धारावाहिकों, रेडियो तथा टीवी के लिए लेखन कर चुके हैं. कश्मीर में इन्होंने दूरदर्शन के लिए उस समय रिपोर्टिंग और एंकरिंग की जब वादी गोलियों की तड़तड़ाहट एवं बमों के धमाकों से गूंजा करती थी. कई अखबारों और मैगजीनों में इनके स्तंभ छपते हैं. इंदौर में 2008 में निदा फाजली के साथ भरोसा सम्मान से सम्मानित तहसीन ने अपनी कविताओं की किताब ‘धूप चांदनी’ में जीवन के कई रंगों को उकेरा है. उनकी कहानी की किताब ‘मासूम’ को उर्दू अकादमी ने सम्मानित किया है. इसके अलावा भी वे कई सम्मानों से नवाजे जा चुके हैं. देश-विदेश में कवि सम्मेलनों और मुशायरों में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं. फिलहाल रेल मंत्रालय में मीडिया कंसलटेंट के रूप में कार्य कर रहे हैं.

