अब हमारा लोकतंत्र सड़ने लगा है!

इतिहास गवाह है जब-जब अति हुई है उसका अंत भी हुआ है। भारत को आजादी के बाद एक सम्पूर्ण लोकतान्त्रिक गणराज्य बनाने का सपना जो देश के महापुरुषों ने देखा था वो पूरा तो हुआ पर एक सपने की तरह। जब आंख खुली तो लोकतान्त्रिक गणराज्य बिखरा हुआ पाया,  जिसका नतीजा आज हम सभी के सामने है। नेताओं के प्रति उमड़ता जनाक्रोश, आये दिन हो रहे धरने, अनशन और विरोध प्रदर्शन ये सभी बिखरे हुए लोकतान्त्रिक देश की तस्वीर है। गणराज्य तो जनता का राज्य होता है, एक ऐसा देश होता है जहां के शासनतन्त्र में सैद्धान्तिक रूप से देश का सर्वोच्च पद पर आम जनता में से कोई भी व्यक्ति पदासीन हो सकता है। इस तरह के शासनतन्त्र को गणतन्त्र कहा जाता है। इसी प्रकार लोकतंत्र या प्रजातंत्र इससे अलग होता है। लोकतन्त्र वो शासनतन्त्र होता है जहाँ वास्तव में सामान्य जनता या उसके बहुमत की इच्छा से शासन चलता है।

यादें चार चवन्नी की!

पैसे की अहमियत बच्चे पैदा होते ही समझने लगते हैं। मेरी बचपन की शुरुआत भी 5 और 10 पैसे से हुई थी। उस समय 5-10 पैसे में ही कमपटें आ जाया करती थी। धीरे-धीरे समय बदला और वहीं कमपटें आधुनिक समय की टॉफी बन गयी जो 25 पैसे में आया करती थी। लेकिन उस 25 पैसे को बचपन से ही चवन्नी कहना सिखाया गया था। जैसे-जैसे महंगाई बढ़ी 5-10 पैसे ने बाजार में अपना दम तोड़ दिया। अब बाजार में केवल चवन्नी को पहचाना जाता था। दिन भर के काम खत्म कर जब पिताजी घर आते तो मैं उनसे चवन्नी मांगा करता था। उनके पूछने पर ”क्या लोगे?”  तो मेरे मुंह से एक ही जबाव निकलता था ”टॉफी”  वो चुपचाप से एक चवन्नी निकालकर मेरे हाथ में थमा देते।

रियल स्वयंवर और स्वयंवर की रियलटी?

इन दिनों एक प्रतिष्ठित चैनल पर प्रसारित हो रहे एक रियलटी ड्रामे के फाइनल एपिसोड की हर कोई बाट जोह रह है। हर किसी के दिल में ये सवाल है कि क्या वाकई में इस ड्रामे वाले स्वयंवर में सच्ची शादी हो पाएंगी या नहीं? पर जो भी हो यह केवल एक ड्रामा है और जो न केवल समाजिक बंधनों का बल्कि धर्म पर भी कुठाराघात कर रहा है। हमारे देश में प्रचीन काल से स्वयंवर की परम्परा चली आ रही है। सुंदर, सुशील राजकुमारियों के लिए श्रेष्ठतम वर की तलाश स्वयंवर के माध्यम से ही की जाती थी। राजा आस-पास की रियासतों के राजकुमारों को अपने यहां निमंत्रित करते थे और फिर उनकी योग्‍यता का परीक्षण किया जाता था। कभी-कभी इस तरह भी होता था कि राजकुमारियों को स्वाधिकार दिया जाता था कि वो खुद अपने योग्य वर का चयन करें। इतिहास गवाह है कि जब-जब नारी सर्वश्रेष्ठ दक्षता से परिपूर्ण होती थी तब स्वयंवर का आयोजन किया जाता था।