अपनी गीतों में कबीरी छोड़ गए शैलेंद्र

जिन्दगी के मायने जिसने आखों से देख अपने जेहन और कलम से अपने गीतों में उकेरा एक ऐसा ही नाम शैलन्द्र का है। ‘तू ज़िन्दा है तो ज़िन्दगी की जीत में यकीन कर, अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर’ 1950 में लिखे इस गीत में भविष्य की सम्भावनाओं और उसके संघर्ष को जो आवाज दी वह आजादी के बाद और आज के हालात का एक तुल्नात्मक अध्ययन है। और वे जब कहते हैं ‘ये ग़म के और चार दिन, सितम के और चार दिन, ये दिन भी जाएंगे गुज़र, गुज़र गए हज़ार दिन’ तो ऐसी सुबह की तलाश होती है, जिसे देखने का हक आने वाली नस्लों से कोई छीन नहीं सकता। और इसीलिए वे आगे कहते हैं कि बुरी है आग पेट की, बुरे हैं दिल के दाग़ ये, न दब सकेंगे, एक दिन बनेंगे इन्क़लाब ये।

पाकिस्‍तान वार्ता के दौरान ही क्‍यों होते हैं आतंकी हमले!

पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी की भारत यात्रा के साथ ही एक बार फिर से भारत-पाक के बीच बेहतर सम्बंधों की आस बढ़ गई है। हिना की इस यात्रा के साथ ही कई सवाल मौजूं हो गए हैं। मसलन भारत-पाक के बीच बेहतर संबंध न होने के दो प्रमुख कारण कश्मीर और आंतकवाद हैं। हिना रब्बानी ने एक चैनल से कहा कि पाकिस्तान आतंकवाद को ज्यादा झेल रहा है ऐसे में दोनों को मजबूती से एक होकर इस लड़ाई को लड़ने की जरुरत है। इस वार्ता के चंद दिनों पहले, 13 जुलाई को मुंबई में बम धमाके हुए थे। यह धमाके उस वक्त हुए जब भारत-पाक के बीच वार्ता और 2 जी स्पेक्ट्रम जैसे महत्वपूर्ण मुद्दा जोर पकड़ा था तो वहीं 19 जुलाई को भारत के साथ रणनीतिक वार्ता के लिए अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भी नई दिल्ली पहुंच रही थीं।

रामपुर जेल में मारपीट की घटना की उच्‍चस्‍तरीय जांच कराई जाए

पीयूसीएल ने बरेली जेल में बंद आतंकवाद के आरोपियों के परिजनों की पुलिस द्वारा की गई पिटाई की कड़ी निन्दा की है। संगठन ने पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग करते हुए दोषी जेल और पुलिस अधिकारियों को तत्काल निलंबित करने की भी मांग की है। पीयूसीएल के प्रदेश संगठन सचिव राजीव यादव और शहनवाज आलम ने जारी विज्ञप्ति में घटना के पीछे गहरी साजिश का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि चूंकि पुलिस रामपुर सीआरपीएफ कैम्प पर हुए कथित आतंकी हमले में गिरफ्तार लोगों के खिलाफ कोइ सुबूत कोर्ट में पेश नहीं कर पाई है, इसलिए उसने कुंठावश आरोपियों के परिजनों की, जो उनसे जेल में मिलने आये थे, आधे घंटे तक बर्बर पिटाई की। जेल में हुई इस आपराधिक घटना के दौरान बच्चों सहित कई महिलाएं बुरी तरह से घायल हुईं हैं।

आरडी निमेष जांच आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक की जाय

मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) ने मुख्यमंत्री से तारिक कासमी और खालिद की गिरफ्तारी की जांच के लिए बने आरडी निमेष जांच आयोग की रिपोर्ट तत्काल सार्वजनिक करने की मांग की। संगठन के प्रदेश संगठन मंत्री मसीहुद्दीन संजरी, तारिक शफीक और विनोद यादव ने कहा कि यह दो बेगुनाहों, जिन पर आतंकवाद जैसा राष्‍ट्रद्रोही आरोप लगा है, के मानवाधिकारों का सवाल है, जो सिर्फ इस जांच रिपोर्ट के न आने की वजह से जेलों में रहने के लिए अभिषप्त हैं। तो वहीं यह इससे भी जुड़ा सवाल है कि जिस यूपी एसटीएफ को विशेष अधिकार दिए गए हैं, वो अपने अधिकारों का उल्लंघन कर जहां राष्‍ट्र के आम नागरिकों को गैर-कानूनी तरीके से फंसा रही है तो वहीं गैर-कानूनी तरीके से मानव समाज के लिए खतरनाक विस्फोटक और असलहे को किन राष्‍ट्र विरोधी तत्वों से प्राप्त कर रही है। आज पीयूसीएल के मसीहुद्दीन संजरी, तारिक शफीक, विनोद यादव, अंशु माला सिंह, अब्दुल्ला एडवोकेट, जीतेंद्र हरि पांडे, आफताब, राजेन्द्र यादव, तबरेज अहमद ने मायावती सरकार से मांग की कि आरडी निमेष जांच आयोग की रिपोर्ट तत्काल लायी जाय।

अति सतर्कता से क्‍यों घबरा रहा है ‘दैनिक जागरण’!

: संवेदनशीलता के मामले में हमेशा कमजोर दिखा है यह अखबार : दैनिक जागरण ने 31 अगस्त 2010 को अपने संपादकीय ‘अति सर्तकता’ में ‘चिंता’ जताई है कि बाबरी मस्जिद पर जैसे-जैसे फैसला आने का समय नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे प्रदेश में प्रशासनिक स्तर पर सक्रियता क्यों बढ़ाई जा रही है? यहां यह सवाल उठता है कि 92 की बजरंगी करतूतों से डरा हुआ समाज, जब फिर से संघ गिरोह द्वारा खुलेआम इस धमकी से, ‘यदि फैसला उनके खिलाफ जाता है तो फिर से सड़क पर उतरेंगे’ से डरा हुआ है और उसके मन में 92 की घटना फिर से जिंदा हो उठी है। ऐसे में हर अमन पंसद नागरिक इस बार एक चौकस व्यवस्था चाहता है। तब देश के सबसे ज्यादा लोगों के बीच पढ़ा जाने वाला अखबार बहुसंख्यक जनता की इस चिंता को क्यों नजरंदाज कर रहा है। दैनिक जागरण को आम लोगों की तरह यह क्यों नहीं लगता कि अगर 92 में तत्कालीन कल्याण सरकार ने चाक चौबंध व्यवस्था की होती, तो बाबरी मस्जिद के विध्वंस जैसी बड़ी घटना नहीं हो पाती और ना ही इतने लोग मारे गए होते।