जुल्म के निहत्थे प्रतिवाद की एक नजीर

राजकिशोर दूसरी महा लड़ाई के दौरान, जब लंदन और पेरिस पर बमों की बारिश हो रही थी और हिटलर के जुल्मों को रोकना बेहद मुश्किल लग रहा था, तब महात्मा गांधी ने एक असाधारण सलाह दी थी। इस सलाह के लिए देश-विदेश में गांधी जी की कठोर आलोचना हुई थी और उनकी बात को बिल्‍कुल हवाई करार दिया गया था। जिस तरह के वातावरण में हमारा जन्म और परवरिश हुई है, उसमें गांधी जी की बहुत-सी बातें हवाई ही लगती हैं। लेकिन कोई बात हवाई है या उसमें कुछ दम है, इसका इम्तहान तो परीक्षण के दौरान ही हो सकता है। गांधी जी की सलाह पर अमल किया जाता, तो यह सामने आ सकता था कि प्रतिकार का एक अहिंसक रूप भी हो सकता है और इससे भी बड़ी बात यह कि वह सफल भी हो सकता है।

किसान को बचाएं कि बचाएं उद्योग को

समाचारपत्रों में प्रकाशित खबरों से लगता है कि किसान बगावत पर उतारू हैं। वे देश के औद्योगिक विकास के लिए अपनी जमीन देना नहीं चाहते। यह औद्योगिक नजरिया है, जो सरकारी नजरिए के साथ मिल कर सहज ही राष्ट्रीय नजरिया बन जाता है। राष्ट्रीय नजरिया यानी उनका नजरिया जो इस समय राष्ट्र का संचालन कर रहे हैं। इन्हीं लोगों में वह मध्य वर्ग भी है, जो अपना भविष्य भारी पूंजी के औद्योगिक विकास में देखता है। यहीं उसका भविष्य है भी, क्योंकि उसका प्रशिक्षण नए औद्योगिक रोजगारों के लिए ही हुआ है। आइआइटी और आइआइएम से पास हो कर निकलने वाली युवा पीढ़ी को कोई और काम करना नहीं आता। जिन्होंने टेक्नोलॉजी पढ़ी है, उनका इस्तेमाल आधुनिक ढंग के कारखानों में ही हो सकता है। जिन्होंने मैंनेजमेंट पढ़ा है, उनका इस्तेमाल आधुनिक ढंग के कार्यालयों में ही हो सकता है।