दादाओं के शक्ति परीक्षण का मंच नहीं कर्नाटक पंचायत चुनाव

शेषजीकर्नाटक में पंचायत चुनाव चल रहे हैं. दो दौर में पूरे राज्य में चुनाव होने हैं. पहले दौर का चुनाव 26 दिसंबर को पूरा हो गया. अनुमान है कि करीब 70 प्रतिशत वोट पड़े हैं. अगला दौर 31 दिसंबर के लिए तय है. बंगलोर, चित्रदुर्ग, रामनगरम, कोलार, चिकबल्लापुर, शिमोगा, टुन्कूर, बीदर, बेल्लारी, रायचूर और यादगिर जिलों में चुनाव का काम पूरा हो गया है. छिटपुट हिंसा की खबरें हैं. कुछ जिलों में दो-चार जगहों पर फिर से वोट डाले जायेगें. चिकबल्लापुर के सोरब तालुका के दो गावों में लोगों ने चुनाव का बहिष्कार किया और कहा कि विकास के काम में उनके इलाके की उपेक्षा की गयी है, इसलिए वे लोग वोट नहीं देगें और चुनाव का बहिष्कार करेंगे. कर्नाटक में पंचायत चुनाव देखना एक अलग तरह का अनुभव है. उत्तर प्रदेश में जिस दादागीरी के दर्शन होते हैं, वह इस राज्य में कहीं नहीं नज़र आता. बंगलोर के पड़ोसी जिले रामनगरम के मगडी तालुक के कुछ गाँवों में चुनाव प्रक्रिया को करीब से देखने का मौका मिला. उत्तर प्रदेश या अन्य उत्तरी राज्यों में चुनाव की रिपोर्टिंग करने वाले इंसान के लिए यह बिलकुल नया अनुभव था.

मुंबई लक्ष्मी का नइहर है

शेषजीजब 2004 में मुंबई में जाकर काम करने का प्रस्ताव मिला तो मेरी माँ दिल्ली में ही थीं. घर आकर मैं बताया कि नयी नौकरी मुंबई में मिल रही है. माताजी बहुत खुश हो गयीं और कहा कि भइया चले जाओ, मुंबई लक्ष्मी का नइहर है. सारा दलेद्दर भाग जाएगा. मुंबई चला गया, करीब दो साल तक ठोकर खाने के बाद पता चला कि जिस प्रोजेक्ट के लिए हमें लाया गया था उसे टाल दिया गया है. बहुत बड़ी कंपनी थी लेकिन काम के बिना कोई पैसा नहीं देता. बहरहाल वहां से थके-हारे लौट कर फिर दिल्ली आ गए और अपनी दिल्ली में ही रोजी रोटी की तलाश में लग गए. लेकिन अपनी माई की बात मुझे हमेशा झकझोरती रहती थी. अगर मुंबई लक्ष्मी का नइहर है तो मैं क्यों बैरंग लौटा.

राजनीतिक अदूरदर्शिता और दिशाभ्रम का शिकार है बोडो आन्दोलन

शेषजीनेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ़ बोरोलैंड ने दावा किया है कि उन्होंने पिछले दिनों कुछ ऐसे लोगों को मौत के घाट उतार दिया है, जो असम में रहते थे और मूलतः हिन्दी भाषी थे. एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स ने नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ़ बोरोलैंड की निंदा की है. उन्होंने कहा है कि इस तरह से निर्दोष और निहत्थे नागरिकों को मारना बिल्‍कुल गलत है और इसकी निंदा की जानी चाहिए. नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ़ बोडोलैंड ने क़त्ल-ए-आम की ज़िम्मेदारी लेते हुए दावा किया है कि उनके किसी कार्यकर्ता की कथित फर्जी मुठभेड़ में हुई मौत का बदला लेने के लिए इन लोगों को मार डाला गया. यह वहशत की हद है. अपनी राजनीतिक मंजिल को हासिल करने के लिए निर्दोष बिहारी लोगों को मारना बिकुल गलत है और उसकी चौतरफा निंदा की जानी चाहिए. बदकिस्मती यह है कि कुछ राजनीतिक पार्टियों ने बोडो अवाम और उसकी मांगों के उल्टी-पुल्‍टी व्याख्या करके इस समस्या के आस-पास भी राजनीतिक रोटियाँ सेंकना शुरू कर दिया है. इस तरह की हल्की राजनीतिक पैंतरेबाजी की भी निंदा की जानी चाहिए.

शुक्र है सब ठीक ठाक है

शेषजीअमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के बाद एशिया का कूटनीतिक माहौल बदलना तय है. नए समीकरण उभरेगें और शक्ति का संतुलन बदलेगा. अमरीका की इस इलाके में बढ़ती ताक़त को बैलेंस करने के लिए चीन ने भी अमरीका विरोधियों का एक खेमा तैयार करना शुरू कर दिया है. म्यांमार और इरान के प्रति अमरीकी चिढ़ का उल्लेख कर के ओबामा ने साफ़ संकेत दे दिया है वे भारत की तरफ दोस्ती का जो हाथ बढ़ा रहे हैं उसमें बहुत सारी शर्तें नत्थी हैं. अपने देश का सौभाग्य है कि यहाँ प्रिंट मीडिया में कुछ बहुत ही समझदार किस्म के पत्रकार नौकरी कर रहे हैं. जिसकी वजह से घटना के अगले दिन सही खबर का पता चलता रहा. वरना टेलीविज़न की ख़बरों वाले तो सच्चाई को इतनी मुहब्बत से और बिलकुल अपने दिल की बात समझ कर पेशकर रहे थे कि लगता था सब उल्टा पुल्टा हो रहा था. लेकिन जब अगले दिन अखबारों में खबरें पढ़ी जाती थीं तो सारी बात सही सन्दर्भ में पता लग जाती थीं.

कामनवेल्थ में दिल्ली के शासकों ने अंग्रेजों की तरह लूट मचाई

शेष नारायण सिंह: मिल बांटकर लूटा गया आयोजन के नाम पर पैसा : दिल्ली दरबार में आजकल बड़े-बड़े खेल हो रहे हैं. सबसे बड़ा खेल तो खेल के मैदानों में होना है लेकिन उसके पहले के खेल भी कम दिलचस्प नहीं हैं. जैसा कि आदि काल से होता रहा है किसी भी आयोजन में राजा के दरबारी अपनी नियमित आमदनी से दो पैसे ज्यादा खींचने के चक्कर में रहते हैं. दिल्ली में आजकल दरबारियों की संख्या में भी खासी वृद्धि हुई है. जवाहरलाल नेहरू के टाइम में तो इंदिरा गाँधी की सहेलियां ही लूटमार के खेल की मुख्य ड्राइविंग फ़ोर्स हुआ करती थीं. वैसे लूटमार होती भी कम थी. दिल्ली में जब 1956 में संयुक्त राष्ट्र की यूनिसेफ की कान्‍फ्रेंस हुई तो एक आलीशान होटल की ज़रूरत थी. जवाहरलाल नेहरू जहां अशोका होटल बन रहा था, उस जगह पर खुद ही अपनी मार्निंग वाक में जाकर खड़े हो जाते थे.