दादाओं के शक्ति परीक्षण का मंच नहीं कर्नाटक पंचायत चुनाव

शेषजीकर्नाटक में पंचायत चुनाव चल रहे हैं. दो दौर में पूरे राज्य में चुनाव होने हैं. पहले दौर का चुनाव 26 दिसंबर को पूरा हो गया. अनुमान है कि करीब 70 प्रतिशत वोट पड़े हैं. अगला दौर 31 दिसंबर के लिए तय है. बंगलोर, चित्रदुर्ग, रामनगरम, कोलार, चिकबल्लापुर, शिमोगा, टुन्कूर, बीदर, बेल्लारी, रायचूर और यादगिर जिलों में चुनाव का काम पूरा हो गया है. छिटपुट हिंसा की खबरें हैं. कुछ जिलों में दो-चार जगहों पर फिर से वोट डाले जायेगें. चिकबल्लापुर के सोरब तालुका के दो गावों में लोगों ने चुनाव का बहिष्कार किया और कहा कि विकास के काम में उनके इलाके की उपेक्षा की गयी है, इसलिए वे लोग वोट नहीं देगें और चुनाव का बहिष्कार करेंगे. कर्नाटक में पंचायत चुनाव देखना एक अलग तरह का अनुभव है. उत्तर प्रदेश में जिस दादागीरी के दर्शन होते हैं, वह इस राज्य में कहीं नहीं नज़र आता. बंगलोर के पड़ोसी जिले रामनगरम के मगडी तालुक के कुछ गाँवों में चुनाव प्रक्रिया को करीब से देखने का मौका मिला. उत्तर प्रदेश या अन्य उत्तरी राज्यों में चुनाव की रिपोर्टिंग करने वाले इंसान के लिए यह बिलकुल नया अनुभव था.

अमरीका से दोस्ती से पहले इतिहास पर भी नज़र डालना ज़रूरी

शेषजीआजकल अमरीका से भारत के रिश्ते सुधारने की कोशिश चल रही है. लेकिन ज़रूरी यह है कि इस बात की जानकारी रखी जाय कि अमरीका कभी भी भारत के बुरे वक़्त में काम नहीं आया है. अमरीका की जेएफके लाइब्रेरी में नेहरू-केनेडी पत्र-व्यवहार को सार्वजनिक किये जाने के बाद कुछ ऐसे तथ्य सामने आये हैं जिनसे पता चलता है कि अमरीका ने भारत की मुसीबत के वक़्त कोई मदद नहीं की थी. भारत के ऊपर जब 1962 में चीन का हमला हुआ था तो वह नवस्वतंत्र भारत के लिए सबसे बड़ी मुसीबत थी. उस वक़्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अमरीका से मदद माँगी भी थी, लेकिन अमरीकी राष्ट्रपति जॉन केनेडी ने कोई भी सहारा नहीं दिया  और नेहरू की चिट्ठियों का जवाब तक नहीं दिया था. इसके बाद इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद लिंडन जॉनसन ने भारत का अमरीकी कूटनीति के हित में इस्तेमाल करने की कोशिश की थी, लेकिन इंदिरा गाँधी ने अपने राष्ट्रहित को महत्व दिया और अमरीका के हित से ज्यादा महत्व अपने हित को दिया और गुट निरपेक्ष आन्दोलन की नेता के रूप में भारत की इज़्ज़त बढ़ाई. हालांकि अमरीका की यह हमेशा से कोशिश रही है कि वह एशिया की राजनीति में भारत का अमरीकी हित में इस्तेमाल करे, लेकिन भारतीय विदेशनीति के नियामक अमरीकी राष्ट्रहित के प्रोजेक्ट में अपने आप को पुर्जा बनाने को तैयार नहीं थे.

मुंबई लक्ष्मी का नइहर है

शेषजीजब 2004 में मुंबई में जाकर काम करने का प्रस्ताव मिला तो मेरी माँ दिल्ली में ही थीं. घर आकर मैं बताया कि नयी नौकरी मुंबई में मिल रही है. माताजी बहुत खुश हो गयीं और कहा कि भइया चले जाओ, मुंबई लक्ष्मी का नइहर है. सारा दलेद्दर भाग जाएगा. मुंबई चला गया, करीब दो साल तक ठोकर खाने के बाद पता चला कि जिस प्रोजेक्ट के लिए हमें लाया गया था उसे टाल दिया गया है. बहुत बड़ी कंपनी थी लेकिन काम के बिना कोई पैसा नहीं देता. बहरहाल वहां से थके-हारे लौट कर फिर दिल्ली आ गए और अपनी दिल्ली में ही रोजी रोटी की तलाश में लग गए. लेकिन अपनी माई की बात मुझे हमेशा झकझोरती रहती थी. अगर मुंबई लक्ष्मी का नइहर है तो मैं क्यों बैरंग लौटा.

राजनीतिक अदूरदर्शिता और दिशाभ्रम का शिकार है बोडो आन्दोलन

शेषजीनेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ़ बोरोलैंड ने दावा किया है कि उन्होंने पिछले दिनों कुछ ऐसे लोगों को मौत के घाट उतार दिया है, जो असम में रहते थे और मूलतः हिन्दी भाषी थे. एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स ने नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ़ बोरोलैंड की निंदा की है. उन्होंने कहा है कि इस तरह से निर्दोष और निहत्थे नागरिकों को मारना बिल्‍कुल गलत है और इसकी निंदा की जानी चाहिए. नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ़ बोडोलैंड ने क़त्ल-ए-आम की ज़िम्मेदारी लेते हुए दावा किया है कि उनके किसी कार्यकर्ता की कथित फर्जी मुठभेड़ में हुई मौत का बदला लेने के लिए इन लोगों को मार डाला गया. यह वहशत की हद है. अपनी राजनीतिक मंजिल को हासिल करने के लिए निर्दोष बिहारी लोगों को मारना बिकुल गलत है और उसकी चौतरफा निंदा की जानी चाहिए. बदकिस्मती यह है कि कुछ राजनीतिक पार्टियों ने बोडो अवाम और उसकी मांगों के उल्टी-पुल्‍टी व्याख्या करके इस समस्या के आस-पास भी राजनीतिक रोटियाँ सेंकना शुरू कर दिया है. इस तरह की हल्की राजनीतिक पैंतरेबाजी की भी निंदा की जानी चाहिए.

शुक्र है सब ठीक ठाक है

शेषजीअमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के बाद एशिया का कूटनीतिक माहौल बदलना तय है. नए समीकरण उभरेगें और शक्ति का संतुलन बदलेगा. अमरीका की इस इलाके में बढ़ती ताक़त को बैलेंस करने के लिए चीन ने भी अमरीका विरोधियों का एक खेमा तैयार करना शुरू कर दिया है. म्यांमार और इरान के प्रति अमरीकी चिढ़ का उल्लेख कर के ओबामा ने साफ़ संकेत दे दिया है वे भारत की तरफ दोस्ती का जो हाथ बढ़ा रहे हैं उसमें बहुत सारी शर्तें नत्थी हैं. अपने देश का सौभाग्य है कि यहाँ प्रिंट मीडिया में कुछ बहुत ही समझदार किस्म के पत्रकार नौकरी कर रहे हैं. जिसकी वजह से घटना के अगले दिन सही खबर का पता चलता रहा. वरना टेलीविज़न की ख़बरों वाले तो सच्चाई को इतनी मुहब्बत से और बिलकुल अपने दिल की बात समझ कर पेशकर रहे थे कि लगता था सब उल्टा पुल्टा हो रहा था. लेकिन जब अगले दिन अखबारों में खबरें पढ़ी जाती थीं तो सारी बात सही सन्दर्भ में पता लग जाती थीं.

इक्कीसवीं सदी भारत और अमरीका की है

शेष बराक ओबामा की भारत यात्रा ने भारतीय उप महाद्वीप की राजनीति में एक नया आयाम जोड़ दिया है. पहले दिन ही 10 अरब डालर के अमरीकी निर्यात का बंदोबस्त करके उन्होंने अपने देश में अपनी गिरती लोकप्रियता को थामने का काम किया है. अमरीकी चुनावों में उनकी पार्टी की खासी दुर्दशा भी हुई है. दोबारा चुना जाना उनका सपना है. ज़ाहिर है, भारत के साथ व्यापार को बढ़ावा देकर उन्होंने अपना रास्ता आसान किया है. भारत में उनकी यात्रा को कूटनीतिक स्तर पर सफलता भी माना जा रहा है. बराक ओबामा भारत  को एक महान शक्ति मानते हैं. मुंबई के एक कालेज में उन्होंने कहा कि वे इस बात को सही नहीं मानते कि भारत एक उभरती हुई महाशक्ति है, क्योंकि उनका कहना है कि भारत एक महाशक्ति के रूप में उभर चुका है.

कर्नाटक में खेल अभी ख़त्म नहीं हुआ है

शेष जीकर्नाटक में बीजेपी का संकट अभी ख़त्म नहीं हुआ है. ऐसा लगता है कि पार्टी के बागी विधायकों ने मुख्यमंत्री को हटाने के लिए लंबा दांव खेल दिया है. पता चला है कि जिन बारह विधायकों ने पहले बगावत का नारा बुलंद किया था, वे बागी विधायकों की पहली किस्त थे. निर्दलीय विधायक शिवराज तंगदागी ने दावा किया है कि इस बार उनके लोग बिना हल्ला-गुल्ला किये विधान सभा के अन्दर ही खेल कर जायेंगे. यह भी संभव है कि विधान सभा में शक्ति परीक्षण के ऐन पहले बारह विधायक और बगावत का नारा लगा दें. नामी अखबार डेकन हेराल्ड को शिवराज ने बताया कि हालांकि बीजेपी की ओर से सन्देश आ रहे हैं कि अगर बागी विधायक साथ आने को तैयार हो जाएं तो उनकी सदस्यता को बहाल किया जा सकता है, लेकिन सारे लोग एकजुट हैं और उनकी कोशिश है कि बीजेपी विधायकों की कुल संख्या के एक तिहाई से ज्यादा लोग पार्टी से अलग होकर अपने आपको ही असली बीजेपी घोषित कर देगें. इस बात की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा है कि बीजेपी से अलग होने वाले विधायक राज्य में एक गैर-कांग्रेस सरकार बनाने में मदद करेगें और एचडी कुमारस्वामी की अगुवाई में एक गैर-कांग्रेस, गैर-बीजेपी सरकार बन जायेगी.

गद्दी के वास्ते कुछ भी करेगा

शेष जीकर्नाटक में लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ हुआ है. जिस तरह से विधायकों ने मारपीट की, ध्वनि मत से विश्वास मत पारित हुआ, जिस तरह से अध्यक्ष के पद की गरिमा को नीचा दिखाया गया, सब कुछ अक्षम्य और अमान्य है. हालांकि राज्यपाल की ख्याति ऐसी है कि वह कांग्रेसी खेल का हिस्सा माना जाता है और वह पूरे जीवन तिकड़म की राजनीति करता रहा है लेकिन उसकी ख्याति का बहाना लेकर किसी पार्टी को लोकतंत्र के खिलाफ काम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. इस सारे काण्ड में बीजेपी के आला हाकिम नितिन गडकरी फिर घेर लिए गए हैं और दिल्ली में उनके दुश्मन, डी-4 वाले कह रहे हैं कि पार्टी अध्यक्ष ने गलती की. उन्हें मंत्रिमंडल में बीएस येदुरप्पा को अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए अपने विरोधियों के खिलाफ एक्शन लेने की अनुमति नहीं देनी चाहिये थी. यह अलग बात है कि डी-4 भी अब उतना मज़बूत नहीं है, लेकिन मीडिया में अच्छे संबंधों के बल पर गडकरी का मखौल उड़ाने की उसकी ताक़त तो है ही.

अयोध्‍या 14 : चली है रस्म जहां कोई न सर उठा के चले

 

शेष नारायण सिंह बाबरी मस्जिद की ज़मीन के मालिकाना हक के फैसले के बाद संघी बिरादरी खुश है. उन्हें उम्मीद से ज्यादा सफलता मिली है और अब वे बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के आपराधिक मुक़दमे को भी इसी में लपेट कर पेश करने की  कोशिश कर रहे हैं. शायद इसीलिए जब गृहमंत्री ने कहा कि आपराधिक मुक़दमा अपनी जगह है और यह फैसला अपनी जगह तो संघ की राजनीतिक शाखा के लोग गुस्से में आ गए और बयान देने लगे. टेलीविज़न की कृपा से पत्रकार बने कुछ लोग अखबारों में लेख लिखने लगे कि देश की जनता ने शान्ति को बनाए रखने की दिशा में जो काम किया है वह बहुत ही अहम है. आरएसएस के संगठनों के लोग हर उस लेखक के लिए गालियां बक रहे हैं जो फैसले पर किसी तरह का सवाल उठा रहा है. लेकिन सवाल तो उठ रहे हैं और उम्मीद की जानी चाहिये कि अगले कुछ दिनों में अयोध्या की विवादित ज़मीन के फैसले में जो सूराख हैं, वह सारी दुनिया के सामने आ जायेंगे.

अयोध्‍या 9 : आपके गांव में इसे फैसला कहते हैं!

शेष नारायण सिंहबाबरी मस्जिद की ज़मीन का फैसला आ गया है. इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने अपना आदेश सुना दिया है. फैसले से एक बात साफ़ है कि जिन लोगों ने एक ऐतिहासिक मस्जिद को साज़िश करके ज़मींदोज़ किया था, उनको इनाम दे दिया गया है. जो टाइटिल का मुख्य मुक़दमा था उसके बाहर के भी बहुत सारे मसलों को मुक़दमे के दायरे में लेकर फैसला सुना दिया गया है. ऐसा लगता है कि ज़मीन का विवाद अदालत में ले जाने वाले हाशिम अंसारी संतुष्ट हैं. हाशिम अंसारी ने पिछले 20 वर्षों में अपने इसी मुक़दमे की बुनियाद पर बहुत सारे झगड़े होते देखे हैं. शायद इसीलिये उनको लगता है कि चलो बहुत हुआ अब और झगड़े नहीं होने चाहिए. लेकिन यह फैसला अगर न्याय की कसौटी पर कसा जाए तो कानून के बहुत सारे जानकारों की समझ में नहीं आ रहा है कि हुआ क्या है.

कामनवेल्थ में दिल्ली के शासकों ने अंग्रेजों की तरह लूट मचाई

शेष नारायण सिंह: मिल बांटकर लूटा गया आयोजन के नाम पर पैसा : दिल्ली दरबार में आजकल बड़े-बड़े खेल हो रहे हैं. सबसे बड़ा खेल तो खेल के मैदानों में होना है लेकिन उसके पहले के खेल भी कम दिलचस्प नहीं हैं. जैसा कि आदि काल से होता रहा है किसी भी आयोजन में राजा के दरबारी अपनी नियमित आमदनी से दो पैसे ज्यादा खींचने के चक्कर में रहते हैं. दिल्ली में आजकल दरबारियों की संख्या में भी खासी वृद्धि हुई है. जवाहरलाल नेहरू के टाइम में तो इंदिरा गाँधी की सहेलियां ही लूटमार के खेल की मुख्य ड्राइविंग फ़ोर्स हुआ करती थीं. वैसे लूटमार होती भी कम थी. दिल्ली में जब 1956 में संयुक्त राष्ट्र की यूनिसेफ की कान्‍फ्रेंस हुई तो एक आलीशान होटल की ज़रूरत थी. जवाहरलाल नेहरू जहां अशोका होटल बन रहा था, उस जगह पर खुद ही अपनी मार्निंग वाक में जाकर खड़े हो जाते थे.

कश्मीर में सकारात्मक पहल की ज़रूरत

शेष नारायण सिंहजम्मू-कश्मीर में भारत के राजनीतिक इकबाल की बुलंदी की कोशिश शुरू हो गयी है. कश्मीर में जाकर वहां के लोगों से मिलने की भारतीय संसद सदस्यों की पहल का चौतरफा असर नज़र आने लगा है. सबसे बड़ा असर तो पाकिस्तान में ही दिख रहा है. पाकिस्तानी हुक्मरान को लगने लगा है कि अगर कश्मीरी अवाम के घरों में घुस कर भारत की जनता उनको गले लगाने की कोशिश शुरू कर देगी तो पाकिस्तान की उस बोगी का क्या होगा जिसमें कश्मीरियों को मुख्य धारा से अलग रखने के लिए तरह तरह की कोशिशें की जाती हैं. पाकिस्तान की घबड़ाहट का ही नतीजा है कि उनकी संसद में भी भारत की पहल के खिलाफ प्रस्ताव पास किया गया और अमरीका की यात्रा पर गए उनके विदेश मंत्री अमरीकियों से गिड़गिड़ाते नज़र आये कि अमरीका किसी तरह से कश्मीर मामले में हस्तक्षेप कर दे, जिससे वे अपने मुल्क वापस जा कर शेखी बघार सकें कि अमरीका अब उनके साथ है.

प्रसार भारती में किसकी हुकूमत है?

शेष नारायण सिंह: सीईओ के सामने बोर्ड की भी नहीं चलती :1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो तय किया गया कि टेलीविज़न और रेडियो की खबरों के प्रसारण से सरकारी कंट्रोल ख़त्म कर दिया जाएगा. क्योंकि 77 के चुनाव के पहले और 1975 में इमरजेंसी लगने के बाद दूरदर्शन और रेडियो ने उस वक़्त की इंदिरा-संजय सरकार के लिए ढिंढोरची का काम किया था और ख़बरों के नाम पर झूठ का एक तामझाम खड़ा किया था. जिन सरकारी अफसरों से उम्मीद थी कि वे राष्ट्रहित और संविधान के हित में अपना काम करेगें, वे फेल हो गए थे. उस वक़्त के सूचनामंत्री विद्याचरण शुक्ल संजय गांधी के हुक्म के गुलाम थे. उन्होंने सरकारी अफसरों को झुकने के लिए कहा था और यह संविधान पालन करने की शपथ खाकर आईएएस में शामिल हुए अफसर रेंगने लगे थे. ऐसी हालत दुबारा न हो, यह सबकी चिंता का विषय था और उसी काम के लिए उस वक़्त की सरकार ने दूरदर्शन और रेडियो को सरकारी कंट्रोल से मुक्त करने की बात की थी.

रांची में मधु कोड़ा के वारिस की ताजपोशी!

शेष नारायण सिंह: गडकरी के करीबी तीन व्‍यापारी शामिल हैं इस पूरे खेल में : झारखंड के खादानों पर है कई लोगों की नजर : झारखण्ड में अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री बनाया जा रहा है. उनकी ताजपोशी की जो खबरें आ रही हैं, वे दिल दहला देने वाली हैं. समझ में नहीं आता, कभी साफ़ छवि के नेता रहे अर्जुन मुंडा इस तरह के खेल में शामिल कैसे हो रहे हैं. जहां तक नैतिकता वगैरह का सवाल है, आज की ज़्यादातर राजनीतिक पार्टियों से उसकी उम्मीद करने का कोई मतलब नहीं है. यह कह कर कि झारखण्ड चुनावों के दौरान बीजेपी ने झारखण्ड मुक्ति मोर्चा और शिबू सोरेन के भ्रष्टाचार से जनता को मुक्ति दिलाने का वायदा किया था, वक़्त बर्बाद करने जैसा है. बीजेपी जैसी पार्टी से किसी नैतिकता की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए, लेकिन जिस तरह की लूट की योजना बनाकर नितिन गडकरी ने अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री बनाने की साज़िश रची है, उससे तो भ्रष्ट से भ्रष्ट आदमी भी शर्म से पानी पानी हो जाएगा. पता चला है कि खदानों के धंधे में शामिल कुछ लोगों के पैसे के बल पर विधायकों की खरीद फरोख्त हुई है, और सब कुछ नितिन गडकरी के निजी हस्तक्षेप की वजह से संभव हो सका है.

‘पद के लिए जज ने सुनाया था मेरे खिलाफ यह फैसला’

शेष नारायण सिंह: फासिस्ट नेता ने लगाया सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज पर गंभीर आरोप : फासिज्म अपेक्षाकृत एक नयी राजनीतिक विचारधारा है लेकिन यूरोप में इसका कई बार सत्ता हथियाने और चलाने में इस्तेमाल हो चुका है. मोटे तौर पर नीत्शे के दर्शन पर आधारित फासिस्ट राजनीति के नारे कमज़ोर दिमाग और कमज़ोर मनोबल के लोगों को खासे लुभावने लगते हैं. नीत्शे खुद ही शारीरिक रूप से बहुत कमज़ोर थे लेकिन ताक़त के बल पर राज करने के दर्शन को राजनीतिक विचारधारा बनाने में सफल रहे. उनके सबसे काबिल अनुयायी, हिटलर भी बहुत ही मामूली ताक़त के इंसान थे, और अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए धौंसपट्टी का सहारा लेते थे. जब उन्हें राजनीतिक सत्ता मिली तो अपनी उसी कमजोरी को उन्होंने राज करने का तरीका बनाया और हिटलर बन गए.

हार मानने को मजबूर हुए आरएसएस वाले

[caption id="attachment_2202" align="alignleft"]शेष नारायण सिंहशेष नारायण सिंह[/caption]राजनीतिक एकजुटता और जन जागरण में सांस्कृतिक हस्तक्षेप की भूमिका : 21 साल पहले सफ़दर हाशमी को दिल्ली के पास एक औद्योगिक इलाके में मार डाला गया था. वे मार्क्सवादी कमुनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता थे. उनको मारने वाला एक मुकामी गुंडा था और किसी लोकल चुनाव में कांग्रेसी उम्मीदवार था. अपनी मौत के समय सफ़दर एक नाटक प्रस्तुत कर रहे थे. सफ़दर हाशमी ने अपनी मौत के कुछ साल पहले से राजनीतिक लामबंदी के लिए सांस्कृतिक हस्तक्षेप की तरकीब पर काम करना शुरू किया था. कला, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में काम करने वाले बहुत सारे बड़े लोगों को एक मंच पर लाने की कोशिश कर रहे थे वे. सफ़दर की मौत के बाद दिल्ली और फिर पूरे देश में ग़म और गुस्से की एक लहर फूट पड़ी थी. जो काम सफ़दर करना चाहते थे और उन्हें कई साल लगते. पर एकाएक उनकी मौत के बाद वह काम स्वतः स्फूर्त तरीके से बहुत जल्दी हो गया.