आम आदमी को मारने पर अमादा केंद्र सरकार

सुनील यह पहले से ही पता था कि निर्यात की अनुमति देते ही चीनी के दाम बढ़ जाएंगे, बावजूद इसके केन्द्र सरकार ने चीनी निर्यात पर लगी रोक पिछले सप्ताह हटा ली और तत्काल ही खुदरा बाजार में चीनी के दाम में चार रुपया प्रति किलो की वृद्धि हो गयी। व्यापारियों को कालाबाजार सरीखा लाभ पहुँचाने वाले वायदा कारोबार पर भी गत वर्ष तब रोक लगा दी गई थी जब चीनी का दाम 50 रुपये प्रतिकिलो तक पहुँच गया था, लेकिन इधर वह भी खोल दिया गया है। इसके साथ ही पेट्रो पदार्थों की मूल्य वृद्धि ने भी वही काम किया है जिसकी अपेक्षा थी। उधर योजना आयोग के उपाध्यक्ष जनाब मोंटेक सिंह आहलूवालिया हैं,  जिन्होंने गत दिनों देशवासियों को अपना अर्थशास्त्र बताया है कि पेट्रो मूल्यों में वृद्धि से मॅहगाई घटेगी। यहाँ यह जानना दिलचस्प होगा कि स्कूटर-मोटरसायकिल के पेट्रोल के मुकाबले हवाई जहाज का पेट्रोल (यानी एटीएफ.) लगभग 15 रुपया प्रति लीटर सस्ता है।

जुनून के साथ जीता एक ‘साइकिल टीचर’

सुनील अमरकहावत है कि वह जुनून क्या जो सिर चढ़कर न बोले! ऐसा ही एक जूनून सिर पर सवार है लखनऊ के आदित्य कुमार के। आदित्य लोगों को अंग्रेजी में निपुण करना चाहते हैं वह भी फ्री में। वे चाहते हैं कि आज के छात्रों व युवाओं को कम से कम इतनी अंग्रेजी जरुर आये कि वे अपनी रोजमर्रा की आवश्यकताओं को बेहिचक पूरी कर सकें। आदित्य साधनहीन हैं लेकिन यह साधनहीनता उनके उत्साह को कम नहीं कर सकी है। अपनी आजीविका के लिए वे ट्यूशन पढ़ाते हैं लेकिन समाज निर्माण का जज़्बा ऐसा है कि बड़े-बड़े साधन सम्पन्नों को उनके सामने शर्म करनी चाहिए। एक पुरानी सी बाइसिकिल पर अपना साजो-सामान बॉंधकर आदित्य सड़क-सड़क, गली-गली और झुग्गी-झोपड़ियों में घूम-टहल कर जरुरतमंदों को अंग्रेजी भाषा का निःशुल्क प्रशिक्षण देते हैं।

बाजार के निशाने पर अब गांव

सुनील अमरदेश के गॉंव इन दिनों कई तरह से बाजार के फोकस पर हैं। घरेलू उपयोग की वस्तुएं बनाने वाली बड़ी-बड़ी कम्पनियों को अगर वहॉं अपनी बाजारु संभावनाएं दिख रही हैं, तो बिल्कुल शहरी व्यवसाय माने जाने वाले बी.पी.ओ. क्षेत्र ने भी अब गॉवों की तरफ रुख कर लिया है। सरकार अगर देश के प्रत्येक गॉंव में बैंक शाखाएं खोलने की अपनी प्रतिबद्धता जाहिर कर चुकी है तो निजी क्षेत्र की दिग्गज कम्पनी हीरो समूह अब गॉवों में साप्ताहिक किश्त के कर्ज पर  बाइसकिल बेचने का ऐलान कर रही है, और उधर, आई.टी. सेक्टर ने भी घोषणा की है कि गॉंवों के इलेक्ट्रानिकीकरण बगैर देश का त्वरित विकास संभव नहीं है।

सच सच बतलाना निगमानंद..

सुनील अमर प्रिय निगमानंद, पैंतीस साल की उम्र कुछ कम तो नहीं होती! खासकर उस मुल्क में जहाँ के बच्चे इन दिनों पैदा होने के बाद 35 महीने में ही जवान हो जाते हों, तुम बच्चे ही बने रहे? साधु के साधु ही रह गये तुम और उसी निगाह से इस मुल्क के निजाम को भी देखते रहे? क्या तुम्हें वास्तव में यह नहीं पता था कि अब बच्चे तोतली आवाज में ”मैया, मैं तो चन्द्र खिलौना लैहौं”  न गाकर ”माई नेम इज शीला, शीला की जवानी”  और ”मुन्नी बदनाम हुई”  मार्का गाना गाने लगे हैं? इस तरक्कीशुदा देश में बच्चे तक इच्छाधारी होने लगे हैं निगमानंद लेकिन तुम…?