हिंदी विश्‍वविद्यालय : नए सत्र से कई रोजगार परक पाठ्यक्रम शुरू

पहले हिंदी माध्यम से पढ़ाई करने पर उच्च वेतनमान पर नौकरी पाना बहुत आसान नहीं था, खासकर प्रबंधन व आईटी क्षेत्रों में। गरीब लोग अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा न प्राप्त कर पाने के कारण निजी संस्थानों में उच्च वेतनमान पर रोज़गार पाने में असमर्थ हो जाते थे, लेकिन अब कम्प्यूटर और आईटी क्षेत्र में भी कैरियर बनाना हिंदी भाषी लोगों के लिए बिल्कुल आसान होने जा रहा है। अंग्रेजी में कमजोर होने के कारण निराश विद्यार्थी अब हिंदी के बूते इस क्षेत्र में अपना लक्ष्य पूरा कर सकेंगे क्योंकि हिंदी भाषा को ज्ञान-विज्ञान की भाषा के रूप में संमृद्ध करने तथा रोजगारोन्मुख बनाने के उद्देश्य से स्थापित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा ने पहली बार हिंदी माध्यम से एमबीए, बीबीए, एमए इन कंप्यूटर लिंग्विस्टिक्स, मास्टर ऑफ इन्फारमेटिक्स एण्ड लैंग्वेज इंजीनियरिंग, पीएचडी इन इन्फारमेटिक्स एण्ड लैंग्वेज इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम शुरू किया है।

संत परंपरा ही संचार का आदिस्रोत है : माता प्रसाद

: वर्धा में ‘संत परंपरा और प्रभावी संचार’ विषयक गोष्‍ठी आयोजित : कबीर के समकालीन संत रविदास की भक्ति निर्लोभ और छलरहित है। वे सामाजिक एकता और सौहार्द के प्रतीक थे यही संत परंपरा ही संचार का आदिश्रोत है। उक्त उद्भोधन अरूणाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल डॉ. माताप्रसाद ने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग द्वारा संत रविदास की 634वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित विशेष मीडिया संवाद कार्यक्रम के अंतर्गत ‘‘संत परंपरा और प्रभावी संचार’’ विशेषयक संगोष्ठी में कहा। संचार की वाचिक परंपरा को एक प्रभावी संचार माध्यम बताते हुए उन्होंने कहा कि भक्ति काल में इसी संचार का प्रयोग होता था और मेरा मानना है कि आज की तकनीकी संचार माध्यमों की अपेक्षा ज्यादा प्रभावी साबित हुआ। कबीर दास जी ने कहा था, ‘‘जात पात पूछे न कोई हरि को भजे सो हरि का होई’’ इस कथन को संत रविदास ने चरितार्थ किया। अपने मानवतावादी सोच और विचारों को घूम-घूम कर और गाकर आम लोगों तक पहुंचाया जो सचमुच वाचिक परंपरा का अनोखा उदाहरण प्रस्तुत करता है।

एक दशक में बदली पत्रकारिता और मिशन का राग

अनंत बेहद सर्द सुबह थी, कोहरा इतना घना था कि हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। मैं बात कर रहा हूं जनवरी के पहले हफ्ते की जब अचानक से दिल्ली में सर्दी कम हुई थी और कोहरा घना हो गया था। मुझे वर्धा जाना था और उसके लिए नागपुर तक की प्लाइट लेनी थी जो दिल्ली एयरपोर्ट से सुबह सवा पांच बजे उड़ती थी। जाहिर तौर पर मुझे घर से तड़के साढ़े तीन बजे निकलना था। टैक्सी लेकर घर से निकला तो कार की लाइट और कोहरे के बीच संघर्ष में कोहरा जीतता नजर आ रहा था। इंदिरापुरम का इलाका कुछ खुला होने की नजह से कोहरा और भी ज्यादा था। एक जगह तो हमारी गाड़ी डिवाइडर से टकराते -टकराते बची। सामने कुछ दिख नहीं रहा था अंदाज से गाड़ी चल रही थी। लेकिन वर्धा के गांधी आश्रम को और महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय को देखने की इच्छा मन में इतनी ज्यादा थी कि वो कोहरे पर भारी पड़ रही थी।