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उत्‍तराखंड में राजनीतिक अस्थिरता से भ्रष्‍ट नौकरशाह खुश

: सारा सरकारी काम ठप, आम आदमी परेशान : उत्तराखंड की राजनीतिक अस्थिरता भले ही राजनीतिक दलों के लिए सत्ता के लिए एक खेल मात्र हो पर पहाड़ की आम जनता करीब 70 फीसदी मतदान करने के बावजूद अपने आप को ठगा महसूस कर रही है. चुनाव की तैयारियों से लेकर आज तक करीब चार माह बीतने के बाद भी सरकारी काम काज ठप हैं. जहां पहाड़ का हर शुभचिन्तक इस अराजकता से चिंतित व परेशान है वहीं पहले से ही बेलगाम हो चुके उत्तराखंड के भ्रष्ट नौकरशाहों की बांछे खिली हुई है और वे अपनी मनमानी में  व्यस्त है. अभी मुझे पहाड़ के एक सरकारी अस्पताल में जाने का मौका मिला तो वहां के डाक्टर महाशय ने बताया कि उनके पास इलाज के लिए दवा सहित कुछ भी उपकरण नहीं है. आला भी टूटा हुआ है. हम मरीजों को साफ़-साफ़ कहते हैं कि भैया क्यों यहाँ बैठ कर जान गंवाना चाहते हो, किसी निजी अस्पताल की राह पकड़ो.

: सारा सरकारी काम ठप, आम आदमी परेशान : उत्तराखंड की राजनीतिक अस्थिरता भले ही राजनीतिक दलों के लिए सत्ता के लिए एक खेल मात्र हो पर पहाड़ की आम जनता करीब 70 फीसदी मतदान करने के बावजूद अपने आप को ठगा महसूस कर रही है. चुनाव की तैयारियों से लेकर आज तक करीब चार माह बीतने के बाद भी सरकारी काम काज ठप हैं. जहां पहाड़ का हर शुभचिन्तक इस अराजकता से चिंतित व परेशान है वहीं पहले से ही बेलगाम हो चुके उत्तराखंड के भ्रष्ट नौकरशाहों की बांछे खिली हुई है और वे अपनी मनमानी में  व्यस्त है. अभी मुझे पहाड़ के एक सरकारी अस्पताल में जाने का मौका मिला तो वहां के डाक्टर महाशय ने बताया कि उनके पास इलाज के लिए दवा सहित कुछ भी उपकरण नहीं है. आला भी टूटा हुआ है. हम मरीजों को साफ़-साफ़ कहते हैं कि भैया क्यों यहाँ बैठ कर जान गंवाना चाहते हो, किसी निजी अस्पताल की राह पकड़ो.

उत्तरकाशी के एक दूर दराज के गांव में एक आयुर्वेदिक अस्पताल का आयुर्वेदिक चिकित्सक सात माह के गायब है, पर वेतन उसे बदस्तूर मिल रहा है. गांव के प्रधान बड़े ही रोचक ढंग से डाक्टर की सच्ची कहानी सुनाते हैं. उनके अनुसार रुड़की क्षेत्र का रहने वाले इस चिकित्सक की नौकरी गाँव के अस्पताल में लगी तो आकर तीन दिन बाद ही चला गया और फिर दो माह बाद लौटा. दो दिन रूकने बाद फिर लौटने लगा. प्रधान जी ने उन्हें जाने का कारण पूछा तो वह बड़ी ही बेशर्मी से बोला कि मैंने ट्रेनिग में दस लाख तथा नौकरी पाने के लिए आठ लाख रुपये की खर्च किये हैं. इस जंगल में रहकर यह कैसे वसूल होंगे..? फिर अपने चपरासी की ओर मुखातिब होकर बोला.. बेटे! कोई मरीज आवे तो उसे ये हाजमोला और चटनी (आयुर्वेदिक दवाएं) बेधड़क दे देना..चिंता मत करना….इन दवाओं से न कोई मरता है और न ही ठीक होता है…!! इन्हें कहना कि वे इसे चटनी समझ कर खा लें. ग्राम प्रधान डाक्टर के ऐसे डायलाग सुनकर हतप्रभ था. उच्चाधिकारियों को भी लिखा पर कुछ नहीं हुआ.

जानकार सूत्रों के अनुसार, राज्य के ऐसे अधिकाँश जांबाज आयुर्वेदिक चिकित्सक राज्य के एक ऐसे आयुर्वेदिक कालेज के प्रोडक्ट हैं, जिस में राज्य के एक बड़े नेता का माल लगा है और पिछली सरकार में यहीं से निकले सबसे ज्यादा चिकित्सकों ने राज्य में मोटी तनख्वाहों पर नौकरियाँ पाई हैं..!! पहाड़ में थोड़ी खोज खबर कीजिये तो आपको राज्य की राजधानी देहरादून में बैठे राज्य के विभागीय उच्चाधिकारियों के प्रतिनिधि (दलाल) मिल जायेंगे, जो जनता से हर काम कराने का ठेका लेते हैं. इनकी राज्य सचिवालय में भी बेधड़क पहुँच है. क्षेत्र में ये दलाल आसानी से मिल जाते हैं और ये काम के बदले कई गरीबों से एडवांस भी ले लेते हैं. पहाड़ में राज्य के किसी सचिव व विभागाध्यक्ष के ख़ास आदमी (दलाल) की धमक किसी विधायक से कम नहीं होती है. खंडूड़ी के आने के बाद नौकरशाहों तथा इनके आदमियों ने थोड़ी बेचैनी जरूर महसूस की, पर दूसरी पारी में खंडूड़ी के ढीले तेवरों को देखते हुए वे फिर से अपने रंग में आ गए…..! और अब अस्थिर सरकार की खबरों से उनकी बांछें खिली हुई हैं. उत्तराखंड के सच्चे हितैषी इस पूरे घटनाचक्र से हैरान, परेशान व निराश है.

लेखक विजेंद्र रावत उत्‍तराखंड के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

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