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कांग्रेस क्‍यों हारी और समाजवादी पार्टी क्‍यों जीती?

पांच राज्यों में चुनाव हुए जिसमे गोवा, मणिपुर की तरफ किसी का ध्यान ही नहीं था सिवाय उन प्रदेशों के लोगों के, लेकिन उत्तर प्रदेश में कांग्रेस किसी चमत्कार की उम्मीद कर रही थी या कम से कम ये तो मान ही रही थी कि दलितों के घर रुकने और खाना खाने से राहुल गाँधी बहुजन समाज पार्टी के प्रति उनके जातिगत रुझान को बदल देंगे। शायद ये भी उम्मीद थी कि केवल राहुल गाँधी की शक्ल पर सरकार बनाने के लिए जरूरी संख्या बन जाएगी। उत्तराखंड और पंजाब के बारे में भी आश्वस्त थी कि हर पांच साल बाद सरकार बदलने वाला फार्मूला जारी रहेगा और कई नेता अपनी पीठ ठोंक सकेंगे। पर पंजाब ने जहाँ नए तरीके से सोचा वहीं उत्तराखंड ने भी कांग्रेस पर पूरा भरोसा नहीं दिखाया या अपनी पुरानी परंपरा को मजबूती से पकडे़ हुए कांग्रेसी नेताओं ने एक दूसरे को हराने के लिए पूरी शिद्दत के साथ काम किया और अपने नेता और पार्टी के प्रति पूरी वफ़ादारी का परिचय दिया। ले देकर खुश होने को एक उत्तराखंड मिला था पर तथाकथित हाई कमान और योग्य पर्यवेक्षकों के कारण, किसी सचमुच जमीनी नेता को न पनपने देने की परंपरा और आसमान से आदेश और नेता देने की परम्परा ने खुश होने और अपनी पीठ ठोंकने का मौका ही नहीं दिया।

पांच राज्यों में चुनाव हुए जिसमे गोवा, मणिपुर की तरफ किसी का ध्यान ही नहीं था सिवाय उन प्रदेशों के लोगों के, लेकिन उत्तर प्रदेश में कांग्रेस किसी चमत्कार की उम्मीद कर रही थी या कम से कम ये तो मान ही रही थी कि दलितों के घर रुकने और खाना खाने से राहुल गाँधी बहुजन समाज पार्टी के प्रति उनके जातिगत रुझान को बदल देंगे। शायद ये भी उम्मीद थी कि केवल राहुल गाँधी की शक्ल पर सरकार बनाने के लिए जरूरी संख्या बन जाएगी। उत्तराखंड और पंजाब के बारे में भी आश्वस्त थी कि हर पांच साल बाद सरकार बदलने वाला फार्मूला जारी रहेगा और कई नेता अपनी पीठ ठोंक सकेंगे। पर पंजाब ने जहाँ नए तरीके से सोचा वहीं उत्तराखंड ने भी कांग्रेस पर पूरा भरोसा नहीं दिखाया या अपनी पुरानी परंपरा को मजबूती से पकडे़ हुए कांग्रेसी नेताओं ने एक दूसरे को हराने के लिए पूरी शिद्दत के साथ काम किया और अपने नेता और पार्टी के प्रति पूरी वफ़ादारी का परिचय दिया। ले देकर खुश होने को एक उत्तराखंड मिला था पर तथाकथित हाई कमान और योग्य पर्यवेक्षकों के कारण, किसी सचमुच जमीनी नेता को न पनपने देने की परंपरा और आसमान से आदेश और नेता देने की परम्परा ने खुश होने और अपनी पीठ ठोंकने का मौका ही नहीं दिया।

ये अलग बात है कि जमीनी नेता का जमीर विद्रोह तक जाने को तैयार नहीं हुआ और सरकार बन गयी। पर बहुत दिनों बाद एक नेता ने हाई कमान और पर्यवेक्षकों को आईना दिखाने का काम कर दिखाया। पर मैं उत्तर प्रदेश पर सीमित करना चाहता हूँ जो भारत का हृदय प्रदेश है और जो रोगग्रस्त हो गया है। इस प्रदेश में मायावती जी की सरकार पार्कों और प्रतिमाओं में दलित विमर्श ढूंढती रह गयी, दलितों की झोपड़ियों में अँधेरा ही रह गया, उसका बच्चा स्कूल भी नहीं जा पाया और दवा से भी वंचित रह गया। गरीबों की बस्तियां और गाँव विकास के उजाले को तरसते ही रह गए, पर वाह रे जाति के गौरव का जुनून, पूरी ताकत से फिर भी जातियां कड़ी रह गयी अपने को छलने वालों के साथ पर निर्णय केवल एक जाति नहीं करती है बल्कि तठस्थ लोग करते हैं, जो लगातार अच्छे की तलाश में हैं। बहन जी बेईमान अधिकारियों की कठपुतली बन कर रह गयीं। अधिकारियों ने बर्खास्त हुए यादव सिपाहियों के डर का ऐसा हौव्‍वा दिखाया कि मुख्यमंत्री परछाइयों से भी डरने लगीं और कल्पना लोक में विचरण, किसी तानशाह की तरह की सनक और नवाबों-राजाओं की तरह जीने और भव्यता दिखाने इच्छा ने उन्हें जनमानस से दूर कर दिया। ये तो पूरी तरह तय हो गया था कि वो जा रही हैं और सौ का आंकड़ा नहीं छू पायेंगी।

मायावती भी उसी सिद्धांत का शिकार हो चुकी थी कि किसी नेता या दल का एक चेहरा और पहचान होती है और उससे थोड़ा बहुत विचलन तो कार्यकर्ता और समर्थक तथा तठस्थ लोग पचा लेते हैं पर १८० डिग्री पर उनका बदल जाना कभी भी नहीं पचा है और किसी का नहीं पचा है, वो चाहे कांग्रेस हो, भाजपा हो या सपा, सभी ने इसका खामियाजा भुगता है और इस बार मायावती की बारी थी। नेता सत्ता पाते ही पता नहीं क्यों भूल जाते है कि राजनीति पहाड़ की चढ़ाई है जो झुक कर चढ़ी जाती है, चढ़ने के बाद पैर जमा कर ही पहाड़ पर टिका जा सकता है वर्ना फिर बर्फ की फिसलन है, जिसे कोई नारा कोई सहारा खाई में जाने से रोक नहीं सकता और बर्फ की फिसलन का शिकार नेता होते रहते हैं। अपने अपने कारणों से, पर सबक से दूरी बना कर रखना उनकी फितरत है। मुझे लगता है कि केवल मायावती और उनके कुछ अधिकारियों को छोड़ कर कोई ऐसा नहीं था जो ये नहीं जानता हो कि जनता में उनकी सरकार के खिलाफ जबरदस्त अंडर करेंट है, ये अलग बात है कि कांग्रेस के कुछ हवाई नेता बसपा नामक डूबते हुए जहाज की सवारी करने की बात कर राहुल गाँधी के मिशन को पलीता लगा रहे थे।

सवाल ये है कि कुछ साल पहले जिस सपा को जनता ने बुरी तरह हरा कर हटाया था, उसी को भारी बहुमत से जिताया क्यों और नयी छवि और नयी राजनीति की बात करने वाले राहुल गाँधी की पार्टी कांग्रेस को हराया क्यों? ये भी देखना होगा की भाजपा का तमाम हथकंडों के बाद भी और कुशवाहा वोटों के लालच में बाबूराम कुशवाहा को गले लगाने और फिर से राम मंदिर को मुद्दा बनाने, उमा भारती को आयात करने के बाद भी पहले से भी बुरा हाल क्यों हुआ? जब ये सवाल चिंतन के धरातल पर खड़े होते है तो कोई शोध करने की जरूरत महसूस नहीं होती बल्कि सब कुछ किसी गाँव में बैठे हुए आदमी को भी साफ़ दिख रहा होता है, दिल्ली में बैठे लोगों को दिखे या नहीं और वे आंकड़ों में कारण ढूंढते रहे। कांग्रेस ने एक दो नहीं कई गलतियाँ की और कई लोगों के स्तर पर गलतियाँ हुयीं। सबसे पहले जिनके जिम्मे संगठन बनाने का काम था वे जीतने के लिए संगठन बनाने के स्थान पर पूरा संगठन या तो बेच रहे थे या अपने पैर दबाने वाले, दरबान गिरी करने वाले जैसे तत्वों को भर रहे थे। वे प्रधानमंत्री पद त्यागने वाली सोनिया गाँधी का खुद को सिपाही कह रहे थे पर जमीन और जमीर दोनों लगातार बेच भी रहे थे। वे राहुल के सिपाही थे पर उनके कुर्ते पर लगी धूल का सौदा कर अपने खजाने को भरना चाह रहे थे।

जब चुनाव के लिए टिकेट देने का सवाल आया तब फिर यही कहानी दोहराई गयी, फिर टिकट या तो बेचे गए या चम्‍मचों को बांटे गए। बेनी प्रसाद वर्मा जैसे लोग, जो कांग्रेस में आने के पहले विधान सभा चुनाव में जमानत जब्त करा चुके थे और किसी तरह कांग्रेस के टिकट पर लोक सभा चुनाव जीत गए थे, गाँधी परिवार सहित कुछ नेताओं को बहकाने में कामयाब हो गए कि वो चुनाव जिताऊ काम कर सकते हैं और हर तरह का फायदा उठाने में कामयाब रहे। परिणाम सबके सामने आ गया कांग्रेस में ही चर्चा होने लगी कि बेनी बाबू बेईमान भी हैं और जनाधार विहीन भी। ऐसा ही काम अन्य नेताओ ने भी किया और खूब फायद उठाया। चुनाव के या संगठन बनाने के तीन नियम होते हैं कि १- जहां आप चुनाव में जा रहे हैं वहा हर स्तर के दर्द का पता होना चाहिए और उनको ध्यान में रख कर ही दोनों काम हो सकते है। २-जिनके मुकाबले में आप को जाना है उनके सभी कमजोर पहलू पता भी होना चाहिए और उनपर केंद्रित पूरा फैसलाकुन हमला होना चाहिये। ३-अगर आपके पास वहां के लोगों को हर स्तर पर दिखाने के लिए कसौटी पर कसे हुए सपने नहीं हैं तो भी आप सफल नहीं हो सकते और इसी के साथ जरूरी ये भी है कि आप वहा कि मिट्टी की सुगंध में रचे-बसे दिखें और वहां के लोगों की भाषा में बात करते हुए दिखें।                                       

इन सभी मोर्चों पर कांग्रेस और भाजपा फिसड्डी दिखाई पड़ी, जहां अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं के अभाव में हवा हवाई बन गयी भाजापा २० साल पुराने मुद्दों और तरीकों के साथ आत्मविश्वास के आभाव से जूझती दिखलाई पड़ी और नेता, नीति और सिद्धांतों पर बंटी हुयी दिखलाई पड़ी, वहीं कांग्रेस के रणनीतिकार भी द्वंद्व, अविश्वाश और एक दूसरे को पटखनी देने के लिए जूझते दिखलाई पड़े। उनका जबरदस्त अहंकार, आत्मप्रलाप, मुद्दाविहीन और चिंतनविहीन सोच, अंग्रेजी भाषा और विचार तथा दिल्ली के एसी कमरों की शेख चिल्‍ली सोच, इवेंट मैनेजमेंट और कार्यकर्ताओं के बजाय किराये के लोगों और पैसे से चुनाव जीतने या हर वक्त कुछ कमा लेने की चिंता में दुबले होते लोग ही कांग्रेस के सेनापति थे। जहां सबसे बड़े नेता ने खुद को दांव पर लगा दिया पर ये हिम्मत नहीं कर पाए कि सीधे दांव पर लगते और कह देते कि चुनाव जिताओ तो मैं खुद मुख्यमंत्री बनूँगा ये बुरा भी नहीं था कि इतने बड़े प्रदेश का मुख्यमंत्री पद सम्हाल कर फिर कुछ अनुभव के साथ दिल्ली जाते, पर समझाने वालों ने समझा दिया होगा कि छोटे हो जायेंगे। उनको भाषण की राय देने वाले उन्हें पूरे चुनाव में केवल इंडिया शाइनिंग के आसपास और अडवाणी जी के पीछे घुमाते रहे और उन्हें फिल्मों का एंग्री यंग मैन बनाते रहे जो फिल्मों में चलता है असल जिंदगी में नहीं। जहां वो जनता से कुछ साफ़ साफ़ कहने के बजाय चीखते रहे और कागज फाड़ते रहे, वहीं अखिलेश यादव ने केवल इतना कहा कि पहले बाहें चढ़ाई, फिर कागज फाड़ा, देखना अगली बार कही मंच से न कूद जाये और उन्हें बहुत बौना कर दिया और खुद को उनसे बड़ा बना दिया।

जहाँ कांग्रेस के नेता किसे समर्थन देंगे, किसकी सरकार बनवायेंगे या राष्ट्रपति शासन लगवाएंगे में उलझे रहे वहीं मुलायम सिंह और अखिलेश यादव केंद्र के घोटालों, मंहगाई और उत्तर प्रदेश की सरकार के भ्रष्‍टाचार पर कुछ शब्द बोल कर बाकी पूरे समय जनता के दर्द को सहलाते और फिर समाज के किस वर्ग के लिए क्या करेंगे ये सधे शब्दों में बताते रहे। उन्हें जीतना ही था। जहां कांग्रेस इवेंट मैनेजमेंट की तरह काम करती रही और हर चीज को हल्के से लेती रही वहीं मुलायम सिंह अपने अनुभव और तमाम लोगों की राय को महत्व देते हुए तत्काल फैसले लेते रहे और अपने कार्यकर्ताओं को उत्‍साहित कर रहे थे। जहां कांग्रेस में कोई किसी से बात करने में हेठी समझता है वहीं मुलायम सिंह दूर हो गए साथियों सहित सभी काम के लोगों को जोड़ रहे थे। किसी भी तरह अपने सबसे मजबूत साथी रहे आज़म खान को वापस लाने का उन्होंने जो प्रयास किया वो रंग भी लाया और आज़म की घर वापसी के साथ ही समाजवादी पार्टी एक बार फिर सत्ता के करीब दिखाने लगी थी और परिणामों ने उनकी उपयोगिता सिद्ध भी कर दिया। जहां कांग्रेस एक के बाद एक पर्यवेक्षक भेज रिपोर्ट मंगाना, फिर कई तरह की कमेटियों में कई हफ़्तों कसरत करती रही (जिससे अच्छा टिकट वितरण शायद तब हो जाता जब कांग्रेस हर सीट के उम्मीदवारों की पर्ची किसी डिब्बे में डाल कर एक-एक निकाल कर टिकट बाँट देती) मुलायम सिंह यादव अपने ज्ञान से लखनऊ में बैठे-बैठे संगठन और टिकट बांटना दोनों काम करते रहे क्योंकि वो हर जिले और शहर में कई दर्जन लोगों को सीधे नाम और काम से जानते हैं, जबकि कांग्रेस में नेता कोटरी से बाहर निकलना ही नहीं चाहते और स्वयं को सर्वज्ञानी समझ बैठे हैं। मुझे तो लगता है कि यदि कांग्रेस बदली नहीं, बड़े लोग अपने बाड़े से बाहर नहीं निकले और बेनी, रीता जैसे सैकड़ों लोगों को ऊपर से नीचे तक बाहर कर नए सिरे से संगठन, संगठन की तरह नहीं बनाया गया, पर्यवेक्षक प्रणाली के बजाय सीधे जिलों को जानने और कार्यकर्ताओं को जानने और उनसे सीधे संपर्क रखने की व्यवस्था नहीं बनाई गयी तो कांग्रेस का लगातार पतन होना तय है और मृदुभाषी अखिलेश हों या नीतीश कुमार उनके नेतृत्व में उनके दल बढ़ते जायेंगे। अगले लोक सभा चुनाव में मेरी बात सही साबित हो जाएगी। चाहे तो बदल जाये नहीं तो जनता बदल जाने को मजबूर कर देगी पर तब तक बहुत कुछ ख़त्म हो चुका होगा।

पिछले चुनावों ने कुछ बातें साफ़ कर दिया है कि १- जनता अब किसी एक को पूर्ण बहुमत देना चाहती है, २- जनता नेता की छवि और भाषा तथा भूषा को ध्यान से देख रही है, ३- जनता नेता और उसकी छवि को देख रही है जो मुलायम सिंह ने अखिलेश को आगे कर के दिखाया, ४- जनता किसी से चमत्कार की उम्मीद नहीं करती पर ये जरूर चाहती है कि नेता या दल जो कहें वो करते दिखलाई दे और प्रयास करते दिखें कि वो करना चाहते हैं, ये विश्वास मुलायम सिंह ने जीता है, ५- जनता घमंड, अहंकार को बर्दाश्त नहीं करती है बल्कि कोई राजनीति में रहना चाहता है तो उसको सौम्य और विनम्र होना ही पड़ेगा, 6- कुछ नया कहना है या करना है तो चुनाव से ठीक पहले कहने और करने पर विश्वास नहीं होता, कुछ पहले कहे और करें। क्या कांग्रेस और कांग्रेसी नेता ये समझ पाएंगे? क्या अखिलेश अपनी विनम्रता और सौम्यता को बरक़रार रख पाएंगे? क्या पहले दिन शपथ लेते ही सभी का एक बड़े व्यवसायी के यहाँ चले जाना क्या पुरानी छवि बदल पाएंगे? क्या खुद को नया उत्तर प्रदेश बनाने वाला सिद्ध कर पाएंगे? क्या समाजवादी पार्टी को पुराने तरीकों से निकाल पाएंगे? ऐसे पहाड़ जैसे सवाल मुंह बांये हुए खड़े हैं, जिनका उत्तर समय देगा और अखिलेश तथा उनकी पार्टी को भी देना पड़ेगा। बहुमत नशा न बन जाये इसके लिए हर वक्त चौकन्ना भी रहना होगा और हर वक्त कुछ करने, नया करने के लिए चैतन्य भी रहना होगा चाहे इसके लिए कुछ टोकने वालों को बर्दाश्त क्यों न करना पड़े। वर्ना पहली बार ही छवि बिगड़ गयी तो… राजनीति और वक्त सबका हिसाब करते हैं।

डा. सीपी राय राजैनतिक चिंतक और स्‍तंभकार हैं.

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