शहीदों के मज़ारों पर जुड़ेंगे हर बरस मेले, वतन पे मरने वालों का यही बाक़ी निशां होगा। शहीद अशफ़ाक उल्लाह ख़ां की एक कविता की ये पंक्तियां काफी प्रसिद्ध हैं। जब भी कभी कहीं शहीदों की चर्चा होती है तो प्रायः ये पंक्तियां दोहराई जाती हैं, मगर अफसोस यह है कि इन पंक्तियों को दोहराते समय मज़ारों के स्थान पर चिता कर दिया जाता है और जुड़ेंगे के स्थान पर लगेंगे कर दिया जाता है। शहीद अशफ़ाक उल्लाह ख़ां को 19 दिसम्बर 1927 को फैजाबाद जेल में फांसी हुई थी। अशफाक उल्लाह खां एक अच्छे शायर भी थे। 16 दिसम्बर 1927 को उन्होंने देश वासियों के नाम एक खत लिखा था, जिस में उन्होंने अपने विचार व्यक्त किए थे। बाद में पता नहीं कब किसने इस कविता में संशोधन कर दिया। पंडित बनारसी दास चतुर्वेदी द्वारा सम्पादित अशफाक उल्लाह खां की जीवनी में उन्होंने लिखा है- किसी मनचले हिन्दी प्रेमी ने मजार की जगह चिता बना दी, बिना यह ख्याल किए कि चिताओं पर मेले नही जुड़ा करते।
मगर जब ध्यान देते हैं तो यह किसी मनचले हिन्दी प्रेमी की हरकत नहीं लगती बल्कि एक सोची समझी योजना के चलते मजार के स्थान पर चिता किया गया है। अगर किसी एक की हरकत होती तो इस का सरकारी एवं गैर सरकारी स्तर पर इतने व्यापक पैमाने पर प्रचार नहीं होता कि हर व्यक्ति की जबान पर चिता शब्द चढ़ जाता। हद तो यह है कि कई सरकारी अभिलेखों में भी चिता लिखा जा रहा है तथा विभिन्न शहरों में लगी शहीदों की प्रतिमाओं पर भी चिता ही लिखा जा रहा है। गाजियाबाद में घंटाघर पर शहीद भगत सिंह की प्रतिमा लगी है उस पर भी चिता शब्द ही लिखा हैं। यह सब देख कर कहा जा सकता है कि इस कविता में मजार के स्थान पर चिता शब्द का प्रयोग संगठित तरीके से किया गया है।
भारत में एक वर्ग ऐसा है जो हर मामले को हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से देखता है। मजार के स्थान पर चिता करना इसी वर्ग की कारस्तानी लगती है चूंकि मजार शब्द से शहीद के मुसलमान होने का आभास होता है और चिता से हिंदू होने का, अतः इस वर्ग ने अपनी अलगाववादी मानसिकता के चलते शहीदों को हिंदू-मुसलमान बना दिया। चिता के बारे में सब जानते हैं कि उस पर अंतिम संस्कार के बाद अस्थियां चुनने की एक क्रिया होती है, उस के बाद चिता स्थल पर कोई नहीं जाता। हिंदी में मजार के लिए समाधि का प्रयोग किया जा सकता है, स्मारक भी चल सकता है, मगर स्मारक और समाधि से हिंदू-मुसलमान दोनों का आभास होता है। अतः सोची समझी योजना के अनुसार जानबूझ कर चिता का प्रयोग किया गया लगता है। ऐसा भी होता है कि जहां चिता जलती है उसी के आस पास समधि भी बना दी जाती है। राज घाट, शांतिवन, किसान घाट आदि ऐसे ही स्थल हैं, मगर यह आवश्यक नहीं।
कई मामलों में ऐसा भी होता है कि चिता कहीं और जलती है और समाधि या स्मारक कहीं और बनाया जाता है। उदाहरण स्वरुप स्व. जगजीवन राम का चिता पर अंतिम संस्कार सासाराम (बिहार) में किया गया था और उनका स्मारक दिल्ली में समता स्थल के नाम से बनाया गया है। उनके चिता स्थल पर अंतिम संस्कार के बाद कोई नहीं गया होगा मगर उन की जन्म तिथि और पुण्य तिथि पर हर साल लोग उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करने समता स्थल पर जाते हैं। इस प्रकार मेला चिता पर न लग कर उन की समाधि पर ही लगता है। यहां एक खेदजनक स्थिति यह है कि आज अनेक बुद्धिजीवी, लेखक और पत्रकार मजार के स्थान पर बिना सोचे समझे चिता का ही प्रयाग करते हैं। क्या यह उस शहीद का अपमान नहीं जिस ने यह कविता लिखी थी?
शहीद अशफ़ाक उल्लाह द्वारा लिखित पूरी कविता
उरुजे कामयाबी पर कभी हिंदोस्तां होगा
रिहा सैयाद के हाथों अपना आशियां होगा
चखाएंगे मजा़ बरबादी-ए-गुलशन का गुलचीं को
बहार आएगी उस दिन जब अपना बाग़बां होगा
जुदा मत हो मिरे पहलू से ऐ दर्दे वतन हरगिज
न जाने बादे मुरदन मैं कहां और तू कहां होगा?
वतन की आबरु का पास देखें कौन करता है?
सुना है आज मक़तल में हमारा इम्तेहां होगा।
ये आये दिन की छेड़ अच्छी नही ऐ ख़ंजरे क़ातिल
बता कब फैसला उनके हमारे दरमियां होगा।
शहीदों की मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही बाक़ी निशां होगा।
लेखक महीर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार हैं तथा कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. इनसे संपर्क [email protected] या 09312076949 के जरिए किया जा सकता है.


