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ये दुनिया

व्‍यवस्‍था निर्माण बनाम व्‍यक्ति निर्माण

उथल-पुथल भरे इस संक्रांति बेला पर जन-मानस में नव-निर्माण के लिए एक व्यापक सहमति है। लेकिन दुर्भाग्य से नवीन समाज के निर्माण के लिए मात्र व्यवस्था-निर्माण को ही पूर्ण निमित्त बना दिया गया है, मान लिया गया है। जबकि व्यक्ति-निर्माण के बिना व्यवस्था-निर्माण की सारी कोशिश बेकार जाती है, जाती रही है, और जानी ही है। व्यक्ति ने व्यवस्था को बनाया है, व्यवस्था ने व्यक्ति को नहीं। व्यवस्था व्यक्ति पर बस प्रभाव डाल सकती है वो भी अत्यल्प सा- क्षण भर का। इतिहास में अच्छे व्यवस्था में बुरे व्यक्तियों के मिलने के कई उदाहरण मिल सकते है, लेकिन अच्छे व्यक्तियों की बनायी कोई व्यवस्था बुरी साबित हुई हो इसका उदाहरण नहीं मिलेगा। ऐसी व्यवस्था यदि ध्वस्त हुई भी है तो उसका कारण कालांतर में वैसे ही अच्छे व्यक्तियों का उस व्यवस्था को नहीं मिल पाना रहा है। व्यक्ति ही किसी भी व्यवस्था की मौलिक और मूलभूत इकाई (फंडामेंटल यूनिट) है। ऐसा कैसे संभव हैं की व्यवस्था के इकाई में कोई बदलाव न हो, उसके गुण-धर्मों में कोई परिवर्तन न हो और व्यवस्था का गुण-धर्म बदल जाये? और दिक्कत ये है कि इस संक्रांति-बेला के क्रांति के जो अग्र-दूत हैं वो व्यवस्था के गुण-धर्म को उसके मूल-भूत इकाई में परिवर्तन के बिना ही बदल देना चाह रहें हैं।  सर्व-प्रथम तो इससे व्यवस्था में कोई बदलाव आ नहीं पायेगा और अगर कोई क्षणिक बदलाव आया भी तो वो वृहद मानवता और देश हित को साधने में सफल नहीं हो पायेगा।

उथल-पुथल भरे इस संक्रांति बेला पर जन-मानस में नव-निर्माण के लिए एक व्यापक सहमति है। लेकिन दुर्भाग्य से नवीन समाज के निर्माण के लिए मात्र व्यवस्था-निर्माण को ही पूर्ण निमित्त बना दिया गया है, मान लिया गया है। जबकि व्यक्ति-निर्माण के बिना व्यवस्था-निर्माण की सारी कोशिश बेकार जाती है, जाती रही है, और जानी ही है। व्यक्ति ने व्यवस्था को बनाया है, व्यवस्था ने व्यक्ति को नहीं। व्यवस्था व्यक्ति पर बस प्रभाव डाल सकती है वो भी अत्यल्प सा- क्षण भर का। इतिहास में अच्छे व्यवस्था में बुरे व्यक्तियों के मिलने के कई उदाहरण मिल सकते है, लेकिन अच्छे व्यक्तियों की बनायी कोई व्यवस्था बुरी साबित हुई हो इसका उदाहरण नहीं मिलेगा। ऐसी व्यवस्था यदि ध्वस्त हुई भी है तो उसका कारण कालांतर में वैसे ही अच्छे व्यक्तियों का उस व्यवस्था को नहीं मिल पाना रहा है। व्यक्ति ही किसी भी व्यवस्था की मौलिक और मूलभूत इकाई (फंडामेंटल यूनिट) है। ऐसा कैसे संभव हैं की व्यवस्था के इकाई में कोई बदलाव न हो, उसके गुण-धर्मों में कोई परिवर्तन न हो और व्यवस्था का गुण-धर्म बदल जाये? और दिक्कत ये है कि इस संक्रांति-बेला के क्रांति के जो अग्र-दूत हैं वो व्यवस्था के गुण-धर्म को उसके मूल-भूत इकाई में परिवर्तन के बिना ही बदल देना चाह रहें हैं।  सर्व-प्रथम तो इससे व्यवस्था में कोई बदलाव आ नहीं पायेगा और अगर कोई क्षणिक बदलाव आया भी तो वो वृहद मानवता और देश हित को साधने में सफल नहीं हो पायेगा।

अगर इस संग्राम को हम अच्छाई और बुराई के द्वंद्व के रूप में भी लें तो भी हमें ये ध्यान रखना होगा की अच्छाई और बुराई का संग्राम प्रतीकों और व्यक्तियों के बीच नहीं, अच्छी और बुरी प्रवृत्तियों के बीच होता है। इतिहास में कई मौके ऐसे आयें हैं जब बुरा व्यक्ति हार जाता है और बुरी शक्ति जीत जाती हैं, बुरी प्रवृत्ति जीत जाती है। अभी हाल के मिस्र और सीरिया के उदहारण ऐसे ही हैं। व्यक्ति के नैतिक उत्थान के बिना, व्यवस्था का नैतिक उत्थान नहीं हो सकता। हाल में लोगों के बीच परिवर्तन एक शब्द के रूप में बहुत प्रसिद्ध हुआ है। होना भी चाहिए। सृष्टि में यदि कोई एक मात्र नियत वस्तु है तो वो परिवर्तन ही है। लेकिन “परिवर्तन” शब्द एक बहु-आयामी भाव है- उर्ध्वा-गामी () भी और अधोगामी भी। परिवर्तन तो अवश्यम्भावी है- लेकिन सनातन सभ्यता के वर्तमान पीढ़ी के रूप में हमारी ये जिम्मेदारी है कि हम अपने काल में परिवर्तन के भाव को उर्ध्वगामी रखे। 

हालाँकि कभी कभी बुरी प्रवृत्तियों का इसके प्रतीक में इस तरह आरोपण हो जाता है कि प्रतीक ही प्रवृत्तियों का पर्याय हो जाता है। बुरी प्रवृत्तियां तो यद्धपि समाज को हमेशा अधोगति की तरफ ही ले जाने का प्रयास करती रहती हैं लेकिन वो तब तक मनुष्यता का कोई व्यापक अहित नहीं कर पाती या घातक नहीं सिद्ध हो पाती जबतक किसी प्रतीक के माध्यम से शक्ति -संपन्न न हो जाये। ऐसे ही हालातों में बुरी प्रवृत्तियों का इसके प्रतीक में इस तरह आरोपण हो जाता है की प्रतीक ही प्रवृत्तियों का पर्याय बन जाते है। ऐसी परिस्थितियों में प्राथमिकता अवश्यम्भावी रूप से प्रतीक को नष्ट कर देने की रहती है ताकि बुरी प्रवृत्तियां माध्यम के नष्ट हो जाने के कारण शक्ति-हीनता को प्राप्त हो, कमज़ोर पड़ जाएँ। वर्तमान राष्ट्रीय परिदृश्य में भी हालत कुछ ऐसे ही हैं। कुछ लोग और संस्थाएं ऐसे ही प्रतीक बन गए हैं। इनका नष्ट होना जरुरी है। इनके नष्ट होने से भी समाज और देश को फौरी तौर पर राहत मिलेगा हालाँकि खतरा ये कायम रहेगा कि एक प्रतीक के पतन के बाद बुरी प्रवृत्तियां दूसरा प्रतीक ढूंढ़ लें। इसलिए श्रेयस्कर यही है कि इस संग्राम में बुरे प्रतीकों और शक्तियों के साथ-साथ, व्यक्तित्व निर्माण के माध्यम से बुरी प्रवृत्तियों का भी पतन सुनिश्चित किया जा सकें। अन्यथा हम व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर व्यवस्था का चित्र तो बदल देंगे लेकिन चरित्र वही रहेगा।

लेखक अभिनव शंकर प्रोद्योगिकी में स्नातक हैं और फिलहाल एक स्विस बहु-राष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं.

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