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25 साल बाद फिर गड़गड़ाई बोफोर्स की तोप

बोफोर्स की तोप 25 साल बाद फिर गड़गड़ाने लगी है। अब से 25 साल पहले चित्रा सुब्रह्यमण्यम ने बोफोर्स की दलाली का भांडाफोड़ किया था। चित्रा की खबरों का सबसे बड़ा स्त्रोत था – ‘डीप थ्रोट’ याने ‘गहरा गला’। यह ‘गहरा गला’ फर्जी नाम था। ‘गहरा गला’ नामक इन सज्जन का असली नाम है -स्टेन लिंडस्ट्रॉम। ये स्वीडन की खोजी पुलिस के मुखिया थे। इन्होंने अब 25 साल बाद चित्रा को उजागर भेंटवार्ता दी है, जिसमें फिर से कई लोगों की पोल खुली है। लिंडस्ट्रॉम ने माना है कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बोफोर्स की दलाली मिली हो, इसके ठोस प्रमाण उनके पास कभी नहीं जुट पाए लेकिन उनके बॉस मार्टिन आर्डबो ने लिखित में उन्हें चेताया था कि ”अरूण नेहरू का नाम प्रकट हो जाए तो ज्यादा चिंता नहीं है लेकिन (दलाली में) ओत्ताविया कत्तरोच्ची का नाम किसी भी हालत में प्रकट नहीं होना चाहिए, क्योंकि वह ‘आर’ (राजीव गांधी) के बहुत करीब है।” राजीव गांधी को दिल्ली की अदालत ने भी बरी कर दिया था लेकिन राजीव गांधी को भारत की जनता ने नहीं बख्शा!

बोफोर्स की तोप 25 साल बाद फिर गड़गड़ाने लगी है। अब से 25 साल पहले चित्रा सुब्रह्यमण्यम ने बोफोर्स की दलाली का भांडाफोड़ किया था। चित्रा की खबरों का सबसे बड़ा स्त्रोत था – ‘डीप थ्रोट’ याने ‘गहरा गला’। यह ‘गहरा गला’ फर्जी नाम था। ‘गहरा गला’ नामक इन सज्जन का असली नाम है -स्टेन लिंडस्ट्रॉम। ये स्वीडन की खोजी पुलिस के मुखिया थे। इन्होंने अब 25 साल बाद चित्रा को उजागर भेंटवार्ता दी है, जिसमें फिर से कई लोगों की पोल खुली है। लिंडस्ट्रॉम ने माना है कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बोफोर्स की दलाली मिली हो, इसके ठोस प्रमाण उनके पास कभी नहीं जुट पाए लेकिन उनके बॉस मार्टिन आर्डबो ने लिखित में उन्हें चेताया था कि ”अरूण नेहरू का नाम प्रकट हो जाए तो ज्यादा चिंता नहीं है लेकिन (दलाली में) ओत्ताविया कत्तरोच्ची का नाम किसी भी हालत में प्रकट नहीं होना चाहिए, क्योंकि वह ‘आर’ (राजीव गांधी) के बहुत करीब है।” राजीव गांधी को दिल्ली की अदालत ने भी बरी कर दिया था लेकिन राजीव गांधी को भारत की जनता ने नहीं बख्शा!

मुख्य सवाल यह है कि आज तक बोफोर्स की सच्चाई का पता क्यों नहीं चल पाया? लिंडस्ट्रॉम का कहना है कि भारतीय जॉचकर्ताओं ने कभी ठीक से जांच की ही नहीं। उन्होंने अमिताभ बच्चन को झूठमूठ में फंसाने की कोशिश की| कत्तरोच्ची को भी पकड़ा जा सकता था। उसके खाते भी जब्त किए जा सकते थे लेकिन भारत सरकार की मिलीभगत से वह मजे कर रहा है। लिंडस्ट्रॉम ने यह भी कहा है कि वह दलाली व्यापारिक नहीं थी। वह राजनीतिक भुगतान था। उसे छिपाने में स्वीडन के तत्कालीन प्रधानमंत्री ओलफ पाल्मे का भी हाथ था। चित्रा सुब्रह्यमण्यम के इस रहस्योदघाटन से भी क्या होगा? लाखों-करोड़ की लूट के आगे 64 करोड़ तो ऊँट के मुंह में जीरा भी नहीं है। फर्क इतना ही है कि पहले सर्वोच्च पद पर बैठे लोग छोटा-मोटा हाथ मार लेते थे, अब वे इतने पाक-साफ हैं कि वे कहते है कि हमें तो कुछ लेना-देना ही नहीं, हां तुम लूट सको तो लूटो। भारत तो लुटा जा रहा है। अभी-अभी मालूम पड़ा है कि एक इतालवी कंपनी से खरीदे गए हेलिकॉप्टरों में 350 करोड़ रुपये की दलाली खाई गई है। 25 साल पहले जो बीज बोए गए थे, वे अब वृट-वृक्ष बनकर उभर रहे हैं।

लेखक वेद प्रताप वैदिक पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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