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‘गेम चेंजर’ अरविंद केजरीवाल पर आईबीएन7 के आशुतोष का एक पठनीय विश्लेषण

: अब तक की भारतीय राजनीति के खेल के नियम क्या थे? कोई भी नेता या दल कभी किसी नेता के परिवार वालों को टारगेट नहीं करता था। अंडरवर्ल्ड में भी यही होता है। तमाम दुश्मनी के बावजूद कोई भी गैंग दूसरे के परिवार को निशाना नहीं बनाता। यह एक अलिखित नियम है। यह नियम भारतीय राजनीति पर भी लागू है। पर अरविंद केजरीवाल ने इस नियम को बदल दिया……  :
: अब तक की भारतीय राजनीति के खेल के नियम क्या थे? कोई भी नेता या दल कभी किसी नेता के परिवार वालों को टारगेट नहीं करता था। अंडरवर्ल्ड में भी यही होता है। तमाम दुश्मनी के बावजूद कोई भी गैंग दूसरे के परिवार को निशाना नहीं बनाता। यह एक अलिखित नियम है। यह नियम भारतीय राजनीति पर भी लागू है। पर अरविंद केजरीवाल ने इस नियम को बदल दिया……  :

 

अपनी किताब ‘अन्ना-क्रांति’ में मैंने लिखा था कि मुंबई अनशन के बाद अन्ना का आंदोलन एक चौराहे पर आकर ठिठक गया है। जिस रूप में आंदोलन अब तक चला था, उसे अब आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। उसे अपने को नए सिरे से परिभाषित करना होगा। नए मुहावरे गढ़ने होंगे। अरविंद केजरीवाल पर यह जिम्मेदारी थी, क्योंकि वही पूरे आंदोलन के सूत्रधार थे और सेनापति भी। अन्ना इस आंदोलन के चेहरा मात्र थे। जुलाई 2012 के अनशन के बाद अरविंद को दो काम करना था। एक, आंदोलन का नया स्वरूप तय करना और दूसरा, पूरे आंदोलन को उसके लिए तैयार करना।

अरविंद आंदोलन को चुनावी शक्ल देना चाहते थे, लेकिन आंदोलन का एक बड़ा धड़ा उनके साथ नहीं था। खुद अन्ना हजारे और किरण बेदी उनसे सहमत नहीं थे । 17 सितंबर को कांस्टीटय़ूशन क्लब में मीटिंग बुलाई गई। अन्ना ने साफ कह दिया कि अरविंद को राजनीतिक पार्टी का गठन करना है, तो करें, पर वह न तो पार्टी के साथ होंगे और न ही वह अपने नाम और चेहरे का इस्तेमाल करने देंगे। अन्ना के बिना आंदोलन और राजनीतिक दल? अन्ना ही आंदोलन थे और उसकी नैतिक ताकत भी। फिर भी अरविंद और उनके साथियों ने राजनीतिक दल बनाने का फैसला किया।

चुनाव लड़ने के लिए जिन चीजों की जरूरत थी, वह उनके पास नहीं थी। न तो अथाह धन था, न ही बाहुबल और न ही जाति व धर्म का वोट बैंक। संगठन भी पूरी तरह से नहीं खड़ा था। सिर्फ समर्थक थे। अरविंद और उनकी टीम से इस दौरान कई बार बातचीत हुई और हर बार मैंने यह सवाल किया कि चुनाव लड़ना बच्चों का खेल नहीं है। बड़े-बड़े दिग्गज आए और धराशायी हो गए। अरविंद ने एक मुलाकात में कहा,  अगर वह राजनीति और चुनाव के पुराने खेल को घिसे-पिटे नियमों से खेलेंगे, तो उनकी पार्टी का कोई भविष्य नहीं है। उन्हें खेल के नियम बदलने होंगे। वह बार-बार यह कहते रहे हैं कि 1967 ,1977 और 1989 के तरीके से ही चुनाव लड़ा जा सकता है। उनके मुताबिक तीनों बार तमाम चुनावी बाधाओं के बावजूद सत्ताधारी पार्टी यानी कांग्रेस को पटकनी दी जा सकी, क्योंकि तीनों बार खेल के नियम बदले।

उनका कहना साफ था कि जब-जब देश में लहर पैदा हुई, कांग्रेस हारी। धन, जाति-धर्म और बाहुबल काम नहीं आया। लोगों ने इससे ऊपर उठकर वोट दिया। उन्हें भी चुनाव में कामयाबी पाने के लिए लहर पैदा करनी होगी।
दो अक्टूबर को उन्होंने अपने चुनावी मकसद का इजहार कर दिया। पार्टी का नाम लिए बगैर विजन-डॉक्यूमेंट जारी किया गया, लेकिन लहर पैदा करने का औजार अब भी गायब था। हां, यह जरूर कहा कि कुछ दिनों में दो बड़े नेताओं के भ्रष्टाचार का खुलासा होगा। इस बीच दिल्ली में बिजली के मसले को उठाने की कोशिश की गई। छह अक्तूबर का दिन भी आ गया। अरविंद और प्रशांत ने प्रेस कांफ्रेंस बुलाई। कांग्रेस अध्यक्ष के दामाद की जमीन के खरीद-फरोख्त के कागज प्रेस के सामने रख दिए गए। और सियासी खेल के नियम बदल गए। इस खुलासे से मचे हड़कंप से खुद खुलासा करने वाले हैरान थे। उन्हें उम्मीद थी कि हंगामा होगा, लेकिन इस कदर होगा और राजनीतिक गलियारे में इस कदर तूफान मचेगा, इसकी उन्हें भी उम्मीद नहीं थी। तीर निशाने पर था। और अखबारों ने लिखना शुरू कर दिया कि ‘अरविंद इज द गेम चेंजर।’

अब तक की भारतीय राजनीति के खेल के नियम क्या थे? कोई भी नेता या दल कभी किसी नेता के परिवार वालों को टारगेट नहीं करता था। अंडरवर्ल्ड में भी यही होता है। तमाम दुश्मनी के बावजूद कोई भी गैंग दूसरे के परिवार को निशाना नहीं बनाता। यह एक अलिखित नियम है। यह नियम भारतीय राजनीति पर भी लागू है। हकीकत में अंडरवर्ल्ड में परिवारों का कोई रोल नहीं होता। वे शांति से अपनी जिंदगी गुजारते हैं। लेकिन राजनीति में इस नियम की क्या जरूरत? यहां तो नेताओं का परिवार और रिश्तेदार उनके रसूख और ताकत की छांव में फलते-फूलते हैं। कश्मीर से कन्या कुमारी तक शायद ही कोई ऐसा राज्य होगा, जहां नेताओं के परिवार ने पूरी पार्टी पर कब्जा न जमा रखा हो।

तमाम नेताओं और पार्टियों के बीच भ्रष्टाचार के मसले पर एक और अघोषित समझौता है। सब भ्रष्टाचार में डूबे हैं। और एक नेता द्वारा दूसरे पर वार करने का अर्थ है कि बर्र के छत्ते में हाथ डालना। सब दूसरे के भ्रष्टाचार पर आंख मूंदे रहते हैं और इस अघोषित गठबंधन के तले लूट का साम्राज्य फैला रहता है। उदाहरण सामने है।

करीब डेढ़ साल पहले वाड्रा से संबंधित कागजात बीजेपी के पास थे। संसद में मामूली कवायद के बाद बीजेपी कुंडली मारकर बैठ गई। अब हाय-तौबा मचाई जा रही है कि अरविंद ने गलत किया। राजनीति के गलियारों में यह कानाफूसी जोरों पर है कि अब हर नेता का परिवार निशाने पर होगा और उनका जीना मुहाल हो जाएगा। सवाल यह है कि डरे कौन? वे, जो खुद भ्रष्ट हैं और फिर वे, जिनके परिवार वाले लूटने में लगे हैं। भारतीय कानून के मुताबिक, लुटेरा कोई हो, उसे लूट में रियायत नहीं दी जा सकती। इस खेल में नौकरशाही भी अब बढ़-चढ़कर शामिल हो गई है और कॉरपोरेट घराने भी।

नई आर्थिक नीति ने कारोबारी घराने के नाम का एक नया तबका पैदा कर दिया है, जो आर्थिक विकास के नाम पर कैसी भी नीति हो, कैसा भी कानून हो, उसे मन-मुताबिक तोड़ने में यकीन रखता है। ऐसा नहीं है कि ईमानदार औद्योगिक घराने और नौकरशाह नहीं हैं। पर बेईमानों की फौज इतनी बढ़ गई है कि ईमानदार उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। टू-जी और कोयला घोटाला इस बात की बानगी है कि कैसे नेता, नौकरशाह और बिजनेस हाउसेज के ऑक्टोपसी शिकंजे ने पूरे सिस्टम को बेबस कर दिया है और जो भी इस लूट को रोकने की कोशिश करता है, उसे या तो सिरफिरा करार दिया जाता है या फिर विदेशी साजिश का हिस्सा बता दिया जाता है। ऐसे में, अगर खेल के नियम बदलेंगे, तो सियासी मठाधीश बिलबिलाएंगे ही। एक सवाल अरविंद से भी है, क्या सिर्फ राजनीतिक-गुरिल्लावाद से राजनीतिक भ्रष्टाचारी खत्म होंगे? एनकाउंटर स्पेशलिस्टों ने मुंबई अंडरवर्ल्ड को कमजोर तो किया, लेकिन नए कॉन्ट्रैक्ट किलर भी पैदा कर दिए, जो सिस्टम के लिए आज खतरा बन गए हैं।

लेखक आशुतोषं आईबीएन7 न्यूज चैनल के मैनेजिंग एडीटर हैं.

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