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पत्रकारों के लिए दुनिया के चौथे सबसे खतरनाक देश भारत की असलियत जानिए

बरेली के स्वतंत्र पत्रकार जगेंद्र सिंह का ही मामला लें, उत्तर प्रदेश के डेयरी विकास मंत्री राम मूर्ति सिंह वर्मा ने उन्हें कथित तौर पर जिंदा जला दिया। क्या थी सिंह की गलती? उन्होंने मंत्री पर उत्तरी भारत में अवैध खनन और भूमि हथियाने में लिप्त होने का आरोप लगाया था। कुछ दिनों बाद, मध्य प्रदेश में ‘दैनिक क्रांति’ नामक अखबार के मालिक संदीप कोठारी को ज़िंदा जला दिया गया। बताया जा रहा है कि एक स्थानीय गिरोह के साथ कथित तौर पर उनकी व्यक्तिगत दुश्मनी थी। एक राष्ट्रीय दैनिक के साथ काम कर रहे अशोक कुमार नामदेव नाम के एक और पत्रकार पर बदमाशों के एक गिरोह ने कातिनाला हमला किया था। यह गिरोह उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले में अवैध खनन में शामिल बताया जाता है।

बरेली के स्वतंत्र पत्रकार जगेंद्र सिंह का ही मामला लें, उत्तर प्रदेश के डेयरी विकास मंत्री राम मूर्ति सिंह वर्मा ने उन्हें कथित तौर पर जिंदा जला दिया। क्या थी सिंह की गलती? उन्होंने मंत्री पर उत्तरी भारत में अवैध खनन और भूमि हथियाने में लिप्त होने का आरोप लगाया था। कुछ दिनों बाद, मध्य प्रदेश में ‘दैनिक क्रांति’ नामक अखबार के मालिक संदीप कोठारी को ज़िंदा जला दिया गया। बताया जा रहा है कि एक स्थानीय गिरोह के साथ कथित तौर पर उनकी व्यक्तिगत दुश्मनी थी। एक राष्ट्रीय दैनिक के साथ काम कर रहे अशोक कुमार नामदेव नाम के एक और पत्रकार पर बदमाशों के एक गिरोह ने कातिनाला हमला किया था। यह गिरोह उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले में अवैध खनन में शामिल बताया जाता है।

 

भारत में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, खासकर छोटे शहरों में पत्रकारों के खिलाफ इस तरह के अपराध देश भर में बढ़ गए हैं। देश भर में पत्रकारों द्वारा इस तरह के कृत्यों की निंदा हो रही है पर असली सवाल यह है कि पत्रकार क्यों इस तरह के अपराधों का शिकार हो रहे हैं और क्या हिंदी बेल्ट में एक अनैतिक अपराधी-राजनेता गठजोड़ द्वारा नियंत्रित किया जा रहा है।  इंडिया टुडे ग्रुप के सलाहकार संपादक राजदीप सरदेसाई के अनुसार, “देश भर में राजनीति का अपराधीकरण हो चुका है। देश के कुछ भागों में पत्रकारों को शायद ज़्यादा संरक्षण मिलता है क्योंकि कानून को अमल में लाने वाली मशीनरी वहां मज़बूत है और कुछ भागों में यह काफी कमज़ोर है।” इससे पहले, कई पत्रकारों को मौत की धमकी मिला करती थे जब वे रेत, कोयला या अन्य ऐसे माफियाओं से जुड़े मामलों की जांच करते थे। लग रहा है कि इन माफियाओं का हौसला कमज़ोर कानूनी मशीनरी के कारण बढ़ गया है। इसके अलावा, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में राजनीतिक माहौल का पहले से ही अपराधीकरण हुआ रखा है और जिससे इस तरह की गतिविधियों की संख्या बढ़ी है। जगेंद्र सिंह पर तब हमला किया गया, जब उन्होंने अवैध खनन और भूमि हथियाने में लिप्त होने का आरोप मंत्री पर लगाते हुए एक स्थानीय हिन्दी अखबार में एक लेख लिखा था। बाद में इस पत्रकार ने फेसबुक पर इस मामले का ब्यौरा पोस्ट किया था। इसके बाद छह लोगों के एक समूह ने जिसमें सादी वर्दी में दो पुलिस अधिकारी भी थे, उसकी पिटाई शुरू की। उस पर पेट्रोल डाला और जला दिया।

इसी तरह, 44 वर्षीय संदीप कोठारी अचानक मध्य प्रदेश के बालाघाट ज़िले के अपने घर से गायब हो गए। उनके परिवार ने उनके लापता होने की शिकायत दर्ज कराई। तब पुलिस ने तीन लोगों को गिरफ्तार किया तो उन्होंने इस भयावह घटना की जानकारी दी कि कैसे कोठारी को जला दिया गया और महाराष्ट्र के नागपुर ज़िले में एक जंगल में दफन कर दिया गया था। ऐसा ही हमला अशोक कुमार नामदेव नाम के पत्रकार पर हुआ, जबकि उनका मोबाइल व कैमरा छीन लिया गया और उसकी मोटरसाइकिल को तोड़फोड़ दिया गया। उत्तर प्रदेश के एक गांव, शेरपुर कलां में रहनेवाले एक न्यूज़ चैनल के स्ट्रिंगर हैदर खान को कुछ लोगों ने बांध दिया और एक मोटरसाइकिल के पीछे बांधकर उसे तब तक घसीटते रहे, जब तक वह बेहोश नहीं हो गया। यह टीवी पत्रकार उस इलाके में हुए भूमि गबन के एक मामले पर रिपोर्टिंग कर रहा था।

इन कृत्यों की निंदा करते हुए मी मराठी के सलाहकार संपादक निखिल वागले कहते हैं, “सभी इलाकों के माफिया – खनन, तेल या राजनीतिक हों, ढीठ हो गए हैं। पुलिस और सरकारी मशीनरी बेकार हो गई है। राजनीतिक दलों का इन माफियाओं के साथ जाने में निहित स्वार्थ है तो कौन उन्हें गिरफ्तार करेगा? वे और अधिक पत्रकारों पर हमला करेंगे। यह नहीं है कि हमें पहले धमकियां नहीं मिल रही थीं। महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में काम कर रहे कई पत्रकारों को धमकी मिलती है। जब मैं आईबीएन लोकमत का संपादक था को मेरे दो संवाददाताओं को रेत माफिया से धमकी मिली थी। धमकियां मिलना बहुत सामान्य है, लेकिन पत्रकारों पर घातक हमले चिंता की बात है।” पत्रकारों की सुरक्षा के मामले में उन्हें नियमित रूप से उत्पीड़न, धमकी और मौत की धमकियां मिलती रहती हैं। इस मामले में भारत की प्रतिष्ठा संदिग्ध है। छोटी जगहों और ग्रामीण क्षेत्रों में काम कर रहे पत्रकारों को अधिकतम परेशानी का सामना करना पड़ता है। शहर के पत्रकारों के विपरीत, इन मीडिया कर्मियों को काम की कोई सुनिश्चतता नहीं मिलती, कोई निश्चित वेतन, कोई बड़ा और शक्तिशाली नेटवर्क और कोई संस्थागत समर्थन नहीं मिलता है। तेज़ी से बढ़ते सोशल मीडिया ने पत्रकारों की एक नई नस्ल को जन्म दिया है। वे आक्रामक रूप से स्वयं स्वतंत्र पत्रकारिता करने के लिए फेसबुक, ट्विटर और ब्लॉग जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हैं। कभी कभी इन एक्टीविस्ट पत्रकारों की इस नई नस्ल को प्रिंट और टीवी जैसे पारंपरिक मीडिया की तुलना में सत्ता में बैठे लोगों के क्रोध का सामना करना पड़ता है। महज दो सप्ताह के अंतराल के भीतर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में दो पत्रकारों को जिस तरह से जलाया गया है उससे भारत में पत्रकारों की सुरक्षा पर ध्यान गया है। जम्मू-कश्मीर, उत्तर-पूर्व और नक्सल प्रभावित राज्यों में, पत्रकारों को सरकार और आतंकवादियों या विद्रोहियों दोनों से खतरे का सामना करना पड़ता है।

वागले ने कहा, “पिछले साल 1000 से अधिक पत्रकार दुनिया भर में मारे गए थे – कुछ युद्ध की वजह से तो कुछ आतंकवाद के कारण, लेकिन भारत में वे माफिया की वजह से मरे। कर्नाटक में खनन माफिया ने पत्रकारों के बहुत धमकियां दी हैं। दक्षिण में, कई चैनल राजनीतिक दलों द्वारा चलाए जा रहे हैं और वे इस भयावह स्थिति को उजागर नहीं करते। लेकिन स्वतंत्र पत्रकार जो ईमानदारी से काम करना चाहते हैं उन पर ज़रूर हमला होगा। यही खतरा है।” साल 2012 में भारत को कामकाजी पत्रकारों के लिए दूसरा सबसे खतरनाक देश करार दिया गया था। 2014 में भारत थोड़ा उठकर चौथे स्थान पर आ गया। फिर भी इसे पत्रकारों के लिए बहुत ही खतरनाक जगह माना जाता है। कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट की वेबसाइट के अनुसार भारत में 1992 से 35 पत्रकारों की खास मकसद से हत्या की गई, 22 अन्य लोगों की हत्या अपुष्ट मकसद से हुई। यह डेटा 8 जून 2015 तक का है। 19 जून को मध्य प्रदेश के संदीप कोठारी को शामिल कर यह आंकड़ा 58 तक पहुंच जाता है। मौखिक, शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न का सामना कर रहे पत्रकारों की संख्या भारत में बहुत ज़्यादा है।

सरदेसाई कहते हैं, “मैं देश के सभी भागों में जो पत्रकार दबाव में हैं उनको जानता हूं। ईमानदार और बेईमान पत्रकारिता के बीच अंतर करना होगा। ईमानदार पत्रकारों को लक्षित किया जा रहा है जबकि बेईमान पत्रकार मज़े करते हैं। कुछ बेईमान पत्रकार आज मिनी राजनेता बन गए हैं। कुछ अखबारों और न्यूज़ चैनलों को ब्लैकमेल के लिए इस्तेमाल किया गया है। इसका नतीजा ईमानदार पत्रकार को झेलना पड़ रहा है। उन्होंने कहा, “पत्रकारिता की आड़ में कुछ लोग ब्लैकमेलर या राजनेता बन गए हैं, यही असली चिंता है। राजनीतिक वर्ग चाहता है कि हर पत्रकार उनके इशारे पर नाचे और जब एक पत्रकार उनके अधिकार को चुनौती देता है या सवाल करता है तो वह उनका शिकार बन जाता है।” वागले ने कहा, “उद्योग को इस तरह के अपराधों से लड़ने के लिए एक साथ आने की ज़रूरत है और हम सभी को इस तरह के कृत्यों की निंदा करनी चाहिए और हमारे दोस्तों की रक्षा के लिए एकजुट होना चाहिए। सरकार और पुलिस को सतर्क रहना चाहिए और पत्रकार बिरादरी को इन अपराधों को रोकने के लिए सरकार पर दबाव बनाना चाहिए।” हालांकि, सरदेसाई कुछ और ही बात कहते हैं। किसी आम समस्या के लिए पत्रकारों को एक साथ लाना आसान नहीं होगा क्योंकि वे आपस में एक दूसरे से लड़ने में व्यस्त हैं। उन्होंने कहा, “सबसे पहले, पत्रकारों को एक साथ मिल कर काम करना होगा। एक दूसरे के साथ लड़ने के बजाए हमें इन ताकतों के खिलाफ लड़ना चाहिए। लेकिन हम एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करने में इतने व्यस्त हैं, एक दूसरे की क्षमताओं को कम आंकने में लगे रहते हैं कि जनता के लिए आसान लक्ष्य बन गए हैं। यह बीस साल पहले हुआ होता तो लोग पत्रकारों के सहज समर्थन में अपने-आप आ जाते। आज, वे कहते हैं कि अच्छा है उन्हें एक सबक सिखाया जाना चाहिए। आज हम कमज़ोर हैं क्योंकि लोग हमारी विश्वसनीयता पर हमला कर रहे हैं और पत्रकार एकजुट होने के बजाए विभाजित हैं।” 

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