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दुख-सुख

चार हफ्तों से अनशन पर बैठे थे गांधीवादी छाबड़ाजी लेकिन दिल्ली के अखबारों और चैनलों पर कोई खबर नहीं थी

जयपुर में श्री गुरुशरण छाबड़ा का अनशन सचमुच आमरण सिद्ध हुआ। अनशन करते-करते उन्होंने प्राण-त्याग दिए। उनके परिजन ने उनके शरीर का दाह-संस्कार भी नहीं किया। उन्होंने अस्पताल को उनका शरीर-दान कर दिया। देश में इतनी बड़ी घटना हो गई लेकिन कोई हलचल नहीं है। इससे क्या सिद्ध होता है? हमारे अखबारवाले और टीवी चैनलवालों को सिर्फ वे ही खबरें, खबरें मालूम पड़ती हैं, जो उत्तेजना पैदा करें, लोगों की भावनाएं भड़काएं या जबर्दस्ती के विवाद खड़े करें। छाबड़ाजी चार हफ्तों से अनशन पर बैठे थे लेकिन दिल्ली के अखबारों और चैनलों पर कोई खबर नहीं थी।

<p>जयपुर में श्री गुरुशरण छाबड़ा का अनशन सचमुच आमरण सिद्ध हुआ। अनशन करते-करते उन्होंने प्राण-त्याग दिए। उनके परिजन ने उनके शरीर का दाह-संस्कार भी नहीं किया। उन्होंने अस्पताल को उनका शरीर-दान कर दिया। देश में इतनी बड़ी घटना हो गई लेकिन कोई हलचल नहीं है। इससे क्या सिद्ध होता है? हमारे अखबारवाले और टीवी चैनलवालों को सिर्फ वे ही खबरें, खबरें मालूम पड़ती हैं, जो उत्तेजना पैदा करें, लोगों की भावनाएं भड़काएं या जबर्दस्ती के विवाद खड़े करें। छाबड़ाजी चार हफ्तों से अनशन पर बैठे थे लेकिन दिल्ली के अखबारों और चैनलों पर कोई खबर नहीं थी।</p>

जयपुर में श्री गुरुशरण छाबड़ा का अनशन सचमुच आमरण सिद्ध हुआ। अनशन करते-करते उन्होंने प्राण-त्याग दिए। उनके परिजन ने उनके शरीर का दाह-संस्कार भी नहीं किया। उन्होंने अस्पताल को उनका शरीर-दान कर दिया। देश में इतनी बड़ी घटना हो गई लेकिन कोई हलचल नहीं है। इससे क्या सिद्ध होता है? हमारे अखबारवाले और टीवी चैनलवालों को सिर्फ वे ही खबरें, खबरें मालूम पड़ती हैं, जो उत्तेजना पैदा करें, लोगों की भावनाएं भड़काएं या जबर्दस्ती के विवाद खड़े करें। छाबड़ाजी चार हफ्तों से अनशन पर बैठे थे लेकिन दिल्ली के अखबारों और चैनलों पर कोई खबर नहीं थी।

वे अनशन पर क्यों बैठे थे? उनकी सिर्फ दो मांगे थीं। एक तो राजस्थान में शराबबंदी हो और दूसरी मुख्यमंत्री भी लोकपाल के क्षेत्राधिकार में हो। ये दोनों मांगें सार्वजनिक हित में थीं। इनमें व्यक्तिगत हित या स्वार्थ की कोई बात दूर-दूर तक नहीं थी। छाबड़ाजी सक्रिय राजनीति से भी अलग हो चुके थे। वे भाजपा में थे। उसके पहले वे जनता दल के विधायक (1977-80) रह चुके थे। वे मूलतः गांधीवादी थे। सर्वोदयी थे। वे जब भी दिल्ली आते थे, उनसे बात होती थी। हमारे हर आंदोलन में वे उत्साहपूर्वक साथ देते थे। पिछली बार उन्होंने अनशन किया था तो उनसे दो-तीन  बार फोन पर बात भी हुई थी। वे सर्वहितकारी व्यक्ति थे।
 
हो सकता है कि नेता लोग उनकी दोनों मांगों से असहमत हों लेकिन आश्चर्य है कि उन्होंने उनको मर जाने दिया। नेताओं की यह निष्ठुरता कितनी शर्मनाक है? यदि छाबड़ाजी किसी दल-विशेष में होते तो आज सरकार को लेने के देने पड़ जाते। हमारे लेखकों, कलाकारों और पत्रकारों को भी इस मौत से कुछ लेना-देना नहीं है। मैं उनसे और नेताओं से पूछता हूं कि क्या सचमुच यह मौत थी? तो फिर हत्या किसे कहते हैं? अनशन करनेवाले छाबड़ाजी पहले व्यक्ति नहीं हैं। महात्मा गांधी से लेकर अब तक हजारों लोग अनशन कर चुके हैं लेकिन क्या उनके प्रति हमारे नेताओं और जनता ने इतनी बेरहमी दिखाई है?
 
इस घटना से हम क्या नतीजा निकालें? क्या यह कि शुद्ध अहिंसक प्रतिरोध के दिन लद गए? क्या अब सिर्फ नौटंकीबाज़ और बंदूकधारियों का ही ज़माना है? कोई बात सामाजिक हित की है, यह सिद्ध करने के लिए क्या किसी आक्रामक गिरोह का सहारा लेना जरुरी हो गया है? छाबड़ाजी को भी यह देख लेना था कि यह ज़माना कैसे लोगों का है? उन्हें मेरी विनम्र श्रद्धांजलि!

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.


मूल खबर…

राजस्थान में 31 दिन से अनशन कर रहे चर्चित गांधीवादी नेता गुरुशरण की मौत, राजस्थान सरकार की हो रही थूथू

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