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ये अंधेरे की तस्वीर खींचते फोटोग्राफर की कविताएं हैं… देवी प्रसाद मिश्र की कविताओं पर मंगलेश डबराल का वक्तव्य

नई दिल्ली । ‘‘देवी की कविताएं अंधेरे की तस्वीर खींचते एक फोटोग्राफर की है, यह उसका केंद्रीय प्रभाव है जो उनकी सारी कविताओं में फैला हुआ है, अपनी सारी विविधताओं और शैलियों के साथ। न सिर्फ कथ्य के स्तर पर बल्कि शिल्प, भाषा और उसके बर्ताव के स्तर पर भी।’’ यह बात वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने ‘अन्वेषा’ द्वारा आयोजित कार्यक्रम में देवी प्रसाद मिश्र की रचनाओं पर अपने विचार रखते हुए कही। ‘अन्वेषा’ की ओर से कल शाम गांधी शान्ति प्रतिष्ठान में देवीप्रसाद मिश्र के रचनापाठ और उनके सृजनकर्म पर बातचीत का आयोजन किया गया जिसमें शहर के कई गणमान्य साहित्यकार और सुधी श्रोता उपस्थित रहे। देवी प्रसाद मिश्र की कविताओं पर वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल और कात्यायनी ने विस्तार से अपने विचार रखे।

नई दिल्ली । ‘‘देवी की कविताएं अंधेरे की तस्वीर खींचते एक फोटोग्राफर की है, यह उसका केंद्रीय प्रभाव है जो उनकी सारी कविताओं में फैला हुआ है, अपनी सारी विविधताओं और शैलियों के साथ। न सिर्फ कथ्य के स्तर पर बल्कि शिल्प, भाषा और उसके बर्ताव के स्तर पर भी।’’ यह बात वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने ‘अन्वेषा’ द्वारा आयोजित कार्यक्रम में देवी प्रसाद मिश्र की रचनाओं पर अपने विचार रखते हुए कही। ‘अन्वेषा’ की ओर से कल शाम गांधी शान्ति प्रतिष्ठान में देवीप्रसाद मिश्र के रचनापाठ और उनके सृजनकर्म पर बातचीत का आयोजन किया गया जिसमें शहर के कई गणमान्य साहित्यकार और सुधी श्रोता उपस्थित रहे। देवी प्रसाद मिश्र की कविताओं पर वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल और कात्यायनी ने विस्तार से अपने विचार रखे।

मंगलेश डबराल ने कहा कि ”जाहिर है कि देवीप्रसाद मिश्र की कविताओं में एक सुस्पष्ट प्रतिबद्धता है। राजनीतिक प्रतिबद्धता के बिना इक्कीसवीं सदी में किसी समकालीन कवि या किसी कविता का होना संभव ही नहीं है। इनकी कविताओं में जो खास और गौर करने वाली बात है कि उनका पूरा विधान सिनेमाई है। वे सतत गतिशील हैं और जहां जा नहीं पा रहे हैं, वहां जाने के लिए यात्रा कर रहे हैं। मुझे लगता है कि यह गतिशीलता, यह डायनेमिक्स हिंदी कविता में उनकी कविता का अनोखा गुण है।’’

मंगलेश डबराल ने कहा कि ‘‘देवी की कई कविताएं समकालीन राजनीतिक धरातल पर खड़े होकर की गई रिपोर्ट सदृश है। उन्होंने गद्य और छंदों में नए प्रयोग किए हैं। मुझे लगता है कि कविता के अस्तित्व को बचाने के लिए तोड़-फोड़ बहुत जरूरी है; तोड़-फोड़ अवांगार्द हुए बिना संभव नहीं है और यह अवांगार्द देवी की कविताओं में बहुत मजबूत रूप में दिखाई देता है।”

उन्होंने कहा कि ”देवी पर उत्तर आधुनिक मुहावरे की बहुत अधिक और बहुत अच्छी छाया है, लेकिन उनका पोस्ट-माॅडर्न पोस्ट-पोलिटिकल नहीं है, वो बहुत राजनीतिक है। उन्होंने कहा कि देवी की भाषा बहुत दृश्यात्मक है। सिनेमाई है और मेरे लिए यह बहुत सुकून देने वाली बात है। उनकी अनेकानेक कविताएं संवाद करती हैं और यह भी पहली बार है हमारे समकालीन कवियों में।” उन्होंने कहा कि ”देवी की कविताएं अविधा के रूप में नहीं देखी जानी चाहिए अन्यथा ये हमें निराश करेंगी। देवी उन कवियों में से हैं जिनके बारे में जानने की उत्सुकता रहती है कि वे क्या लिख रहे होंगे।’’

इसके पूर्व देवी प्रसाद मिश्र ने अपनी कुछ कहानियों और कविताओं का पाठ किया। कहानियों में उन्होंने मुख्य रूप से ‘कला’, ‘चेंज’, ‘अगवानी’, ‘विस्मित’, ‘वृतांत’, ‘प्रकाश’ आदि पढ़ीं, और ‘मैं वेमूला हूं’, ‘एक फासिस्ट को हम किस तरह देखें’, ‘फासिस्ट’, ‘बहुत हुआ तो मैं 20 साल बाद मर जाऊंगा’, ‘बेहतर मनुष्य के लिए दवाएं’, ‘तू मेरा साथ दे या न दे चार बजे’, ‘हमारा गम हुआ कि हम पर वार करते हो’, ‘मैं भी क्यों इस तरह लिखना चाहूं, मैं भी क्यों इस तरह कहना चाहूं’, ‘जैसा कि अमूमन संस्मरणों के दौरान हुआ करता है’ आदि कविताओं का पाठ किया।

देवी प्रसाद के सृजन-कर्म पर अपने विचार रखते हुए कात्यायनी ने कहा कि ‘‘देवी प्रसाद मिश्र अपनी पीढ़ी के उन विरल कवियों में शायद सबसे आगे हैं जिन्होंने तर्क की उपस्थिति में स्वप्न देखने की कोशिशें नहीं छोड़ी हैं। यही उनकी निष्कपट, साहसिक और अकुण्ठ प्रतिबद्धता का केंद्रीय तंतु है। उनके पास उम्मीदों के बने-बनाए फार्मूले और माॅडल नहीं हैं। इसीलिए उनकी कविताएं, विशेषकर पिछले लगभग पंद्रह वर्षों की सापेक्षतः प्रौढ़ कविताएं एक ‘फिनिश्ड प्राॅडक्ट’ के रूप में नहीं, बल्कि एक जारी प्रक्रिया के रूप में हमारे सामने आती हैं। जीवन-दृष्टि उनके लिए जड़-सूत्र नहीं है, बल्कि निरंतर जारी एक खोजी प्रक्रिया है।

उनकी कविताओं में उज्ज्वल, निर्भ्रान्त, ‘‘निष्पाप’’ आशावाद नहीं है, बल्कि संदेह और विश्वास का अविराम संघात है, नाउम्मीदियों और उम्मीदों के बीच निरंतर द्वंद्व है। उन्होंने कहा कि रूप और शिल्प के स्तर पर जितनी तोड़-फोड़ देवी ने मचाई है, उतनी शायद किसी अन्य ने नहीं। कविता के रूप और शिल्प के स्तर पर तोड़-फोड़, खोज और आविष्कार करने वाले तमाम कवियों में मुक्तिबोध के बाद वाली पीढ़ी में विष्णु खरे मुझे सबसे आगे दीखते हैं, और उनके बाद जो एकमात्र नाम मैं लेना चाहूंगी, वह देवी प्रसाद मिश्र का होगा।’’

कात्यायनी ने कहा कि ‘‘हाल के वर्षों में देवी ने जो छोटी-छोटी कहानियों की अनूठी और नई विधा आविष्कृत की है, वह हिंदी भाषा और साहित्य की एक उपलब्धि है, जिन पर विस्तृत बातचीत करके ही उनके साथ न्याय किया जा सकता है। भारतीय उपमहाद्वीप के जीवन की ऐतिहासिक त्रासदियों-विडंबनाओं और आत्मिक जीवन के चित्रों को प्रामाणिक ढंग से उपस्थित करने के लिए देवी प्रसाद मिश्र ने एकदम मौलिक और एकदम अलग ढंग से छोटी कहानियों की विधा का पुनराविष्कार किया है। इस शैली में हिंदी में पहले कभी कुछ नहीं लिखा गया और ऐसा भी नहीं कि देवी ने ऐसा करते हुए एदुआर्दो गालिआनो की लीक पकड़ी हो। उन्होंने अपनी लीक स्वयं बनाई है और अपने आप में यह बड़ा काम है और यह बड़ी उपलब्धि है।’’

कार्यक्रम के प्रारंभ में अन्वेषा की संयोजक कविता कृष्णपल्लवी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए अपने संक्षिप्त वक्तव्य में कहा कि देवी प्रसाद मिश्र शायद सबसे अधिक हमारे समय के प्रवक्ता और समालोचक कवि हैं। वे हमारे समय के मध्यवर्ग के अंतःकरण के आयतन को मापने वाले सबसे प्रमुख कवि हैं। उनकी रचनाएं अपने ढंग से कठिन यंत्रणादायी आत्मसंघर्ष और आत्मसिद्धि की कविताएं हैं। कविता ने कहा कि उनकी कविताएं इतिहास के उस उजाड़ का काव्यात्मक आख्यान है जिसमें हम और आप जी रहे हैं।

अन्वेषा के इस आयोजन में कवि इब्बार रब्बी, दिनेश कुमार शुक्ल, कृष्ण कल्पित, आर. चेतनक्रांति, अविनाश मिश्र, नित्यानंद गायेन आदि के अलावा छात्रों, युवाओं की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। आयोजन स्थ पर आकर्षक कविता पोस्टर प्रदर्शनी व पुस्तक प्रदर्शनी भी लगाई गई थी, जिसे लोगों ने काफी पसंद किया।

‘अन्वेषा’ की मुख्य संयोजक कविता की रिपोर्ट. कार्यक्रम की कुछ तस्वीरें देखने के लिए यहां क्लिक करें : Pics

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