पक्ष, विपक्ष और जनता

चुनाव होते हैं, कोई राजनीतिक दल जीत जाता है,कोई हार जाता है। विजयी दल का नेता इसे जनता की जीत बताता है और वायदा करता है कि उनका दल महंगाई पर काबू पायेगा, भ्रष्टाचार पर रोक लगाएगा और साफ-सुथरा प्रशासन देगा। इसी तरह पराजित दल का नेता जनता की इच्छा को विनम्रता से स्वीकार करने की बात कहते हुए रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाने का आश्वासन देता है। दरअसल, दोनों ही नेता झूठ बोल रहे होते हैं।

विजयी दल के नेता के पास महंगाई घटाने का कोई फार्मूला नहीं होता और भ्रष्टाचार पर रोक लगाने की तो इच्छा भी नहीं होती। यही हाल विपक्षी दल का भी है। जनता की इच्छा को स्वीकार करने के अलावा उनके पास चारा भी क्या है? और रचनात्मक विपक्ष की अवधारणा से भी उनका दूर का रिश्ता नहीं है। आइये, जरा इस बात पर गौर करें कि रचनात्मक विपक्ष की भूमिका क्या है, उसमें क्या अड़चनें हैं और उन्हें दूर करने के लिए क्या किया जा सकता है।

सबसे पहले तो हमें यह समझना होगा कि रचनात्मक विपक्ष की भूमिका में खुद हमारा संविधान एक बहुत बड़ी अड़चन है। सत्ताधारी दल सत्ता में इसीलिए आया क्योंकि उसके पास बहुमत था। हमारे संविधान में यह प्रावधान है कि केंद्र सरकार की मंत्रिपरिषद् में किसी व्यक्ति को तभी शामिल किया जा सकता है अगर वह संसद के किसी सदन का सदस्य हो, या फिर उसे छ: माह के अंदर चुनाव जीत कर किसी एक सदन का सदस्य बनना होगा। हम जानते हैं कि सरकार के तीनों अंगों यानी, विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कार्य और शक्तियां अलग-अलग हैं। विधायिका, यानी संसद, देश के लिए नये कानून बनाती है, आवश्यक होने पर पुराने कानूनों की समीक्षा करके उनमें संशोधन करती है या उन्हें रद्द करती है। संसद के बनाए कानूनों को कार्यपालिका, यानी, सरकार लागू करती है, और न्यायपालिका देश में प्रचलित कानूनों की व्याख्या करती है, विवादों का निपटारा करती है और न्याय देती है।

दिखने में तीनों अंग स्वतंत्र हैं लेकिन व्यवहार में बड़ा फर्क है क्योंकि कार्यपालिका में शामिल लोगों का संसद के किसी सदन, यानी विधायिका का सदस्य होना आवश्यक है। इसका परिणाम यह है कि कार्यपालिका कानून बनाती भी है, उन्हें लागू भी करती है और शासन भी चलाती है। कार्यपालिका, यानी सरकार, के पास सिर्फ कानून बनाने और शासन करने की दोहरी शक्तियां ही नहीं हैं, बल्कि व्यवहार में ये शक्तियां लगभग असीमित हैं। संसद में विपक्ष का लाया कोई बिल पास नहीं होता अत: संसद के आधे सदस्य तो विधायिका में होते हुए भी कोई विधायी कार्य नहीं करते और व्यवहारमें अप्रासंगिक हो जाते हैं। सरकार को संसद में किसी परेशानी का सामना न करना पड़े इसके लिए सत्तारूढ़ दल अथवा गठबंधन अपने सांसदों को ह्विप जारी करता है।

दलबदल कानून के कारण सांसद अपने दल की नीति के अनुसार बिल के पक्ष या विरोध में वोट देने के लिए विवश है, चाहे वे उस बिल से सहमत हों या नहीं। संख्या बल न होने के कारण विपक्ष का विरोध धरा रह जाता है, सरकार की मनमानी चलती है और हर सरकारी बिल पास हो जाता है। यानी दरअसल, कानून बनाने का काम संसद नहीं बल्कि सरकार करती है, इससे संसद की शक्तियां सिमट कर सरकार के हाथ में आ जाती हैं। यही नहीं, यदि विपक्ष चुनाव के लिए तैयार न हो तो विपक्षी सांसद, अल्पसंख्यक सत्तासीन दल को बचाने के लिए वोटिंग के समय किसी न किसी बहाने से वाकआउट कर जाते हैं ताकि सरकार न गिरे और वे दोबारा चुनाव की जहमत से बच सकें। सन् 1991 में सत्ता में आई नरसिंह राव की अल्पमत सरकार इसी प्रकार पूरे पांच साल चल सकी क्योंकि बिलों पर वोटिंग के समय अक्सर विपक्ष वाकआउट कर जाता था। इसके अलावा, चूंकि प्रधानमंत्री सदन का कार्यकाल समाप्त होने से पहले भी सदन को भंग करवा सकते हैं अत: सदन सरकार के नियंत्रण में रहता है।

सब जानते हैं कि सरकार चलाने का असली काम दल के दो-तीन बड़े नेता ही करते हैं। अब ज़रा इसको दोबारा से समझते हैं। हमने देख लिया है कि कानून संसद नहीं बनाती, सरकार बनाती है, और सरकार को पूरा मंत्रिमंडल नहीं चलाता बल्कि प्रधानमंत्री और उनके विश्वसनीय दो-तीन साथी चलाते हैं। इसका अर्थ यह है कि तीन-चार लोगों का छोटा-सा गुट पूरे संसद को नियंत्रित करता है। इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में भी यही स्थिति थी और अब नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से भी वही स्थिति दोबारा आ गई है।

जब किसी एक व्यक्ति या गुट के हाथ में सारी शक्तियां आ जाएं तो उस व्यक्ति या गुट की तानाशाही चलती है। इस प्रकार लोकतांत्रिक ढंग से चुना गया व्यक्ति भी प्रधानमंत्री बनने के बाद तानाशाह की तरह व्यवहार करने लगता है। एक मजबूत प्रधानमंत्री कैबिनेट की सहमति के बिना भी शासन चला सकता है, अध्यादेशों के सहारे शासन चला सकता है और संसद को बाईपास कर सकता है। ऐसे में यह धारणा कि संसद कानून बनाती है, असल में गलत है। सच्चाई यह है कि सरकार ही कानून बनाती है और सरकार ही कानून लागू भी करती है। चूंकि संसद में विपक्ष की कोई सार्थक भूमिका नहीं है, इसलिए मीडिया और जनता का ध्यान आकर्षित करने के लिए विपक्ष वाकआउट करता है, सदन में शोर मचाता है और अव्यवस्था पैदा करता है। लेकिन क्या विपक्ष का यह व्यवहार सही है? क्या विपक्ष की भूमिका इतनी सी ही है?

सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों ही खूब नारे लगाते हैं लेकिन जनता को असल में कुछ नहीं देते। विपक्ष के पास रचनात्मक विपक्ष की भूमिका को लेकर कोई “विज़न” नहीं है। यदि कहीं दंगा हो जाए तो विपक्ष के नेता सहानुभूति जताने के लिए वहां पहुंच जाते हैं लेकिन क्या वे ऐसी कोई कोशिश करते हैं कि भविष्य में वहां दंगा न हो? यदि जनता किसी समस्या से दो-चार हो रही हो तो विपक्ष सरकार की आलोचना तो करता है, लेकिन क्या वह खुद आगे बढक़र समस्या के समाधान के लिए कुछ नहीं कर सकता? क्या केवल सरकारी मशीनरी ही सब कुछ कर सकती है? किसी प्राकृतिक आपदा के समय क्या विपक्ष कुछ नहीं कर सकता? फसल नष्ट हो जाने की स्थिति में क्या विपक्ष किसी सामाजिक सहायता का जुगाड़ नहीं कर सकता? क्या विपक्ष कोई ऐसा सहायता केंद्र नहीं खोल सकता जहां कुछ विशेषज्ञ जनता की समस्याओं के समाधान के लिए उपलब्ध हों? क्या सामाजिक संस्थाओं के साथ मिलकर अथवा अपने ही तौर पर विपक्ष जनहित का कोई कार्यक्रम नहीं चला सकता?

सरकार जब बजट पेश करती है तो विपक्ष उसे जनविरोधी बताता है लेकिन क्या ऐसा संभव नहीं है कि जनता की अदालत में विपक्ष अपनी ओर से वैकल्पिक बजट पेश करे और कहे कि यदि वह सत्ता में होता तो वह ऐसा बजट पेश करता? विपक्ष यदि किसी कानून में संशोधन चाहता है तो वह बदले हुए प्रारूप को जनता के सामने लाए और सेमिनारों के द्वारा तथा मीडिया की सहायता से जनमत बदले। यदि विपक्ष ऐसा करे तो वह सरकार को अपनी और जनता की बात सुनने के लिए विवश कर सकता है। इसके लिए उसे संसद में शोर मचाने या अव्यवस्था पैदा करने की आवश्यकता नहीं है।

आलोचना करना, शोर मचाना, अव्यवस्था पैदा करना, अभद्र बयान देना आदि ऐसे साधन हैं जिनसे जनता का ध्यान बंटता है और मूल मुद्दे गौण हो जाते हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों का हित इसी में है कि मूल मुद्दों से जनता का ध्यान हटा रहे और उनकी नौटंकी चलती रहे। यह कोई रहस्य नहीं है कि संसद अथवा मीडिया बहस में आपस में कुत्ते-बिल्ली की तरह लडऩे वाले अधिकांश सांसद व्यक्तिगत जीवन में गहरे मित्र हो सकते हैं। सदन में और मीडिया के सामने लड़ाई का यह नाटक एक बड़ा षड्यंत्र है। खेद है कि मीडिया इस बारे में चुप है और जनता इस षड्यंत्र की शिकार है।

आवश्यकता इस बात की है कि मतदाता के रूप में हम राजनीतिज्ञों के इस षड्यंत्र को पहचानें और सभी दलों के राजनीतिज्ञों को विवश करें कि वे अपनी असली ज़िम्मेदारी निभायें और जनता की अपेक्षाओं पर खरे उतरें अन्यथा उन्हें वोट नहीं मिलेंगे। जनता के सशक्तिकरण का यही उपाय है, और खुद जनता को इसी नीति पर चलना होगा, तभी देश का भविष्य सुधरेगा।

(लेखक पी. के. खुराना हैं. खुराना दो दशक तक इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी और दिव्य हिमाचल जैसे कई मीडिया घरानों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. वे फिलहाल अपनी पीआर फर्म चला रहे हैं.)