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दुख-सुख

ये आज़ादी झूठी है दोस्तों!

दोस्तों, आज जबकि करोड़ों लोग बेरोज़गार हैं, फिर क्या वजह है कि अधिकांश कल-कारखानों, सेवा संस्थानों, एवं शॉपिंग प्रतिष्ठानों में मजदूरों से 12-14 घंटे हाड़-तोड़ मेहनत करायी जाती है? उस पर भी इन मजदूरों को कोई साप्ताहिक छुट्टी नहीं मिलती है, अर्थात इनकी ज़िंदगी में कोई ‘संडे’ (फुर्सत का समय) नहीं होता है। इसका जवाब मुझे सत्ता के नुमाइंदों एवं पूँजीपति अर्थशास्त्रियों से चाहिए। लगातार काम करते रहने से मजदूर की उत्पादकता घट जाती है, इस वैज्ञानिक तथ्य के बावजूद किसी मज़दूर से 12-14 घंटे हाड़-तोड़ मेहनत क्यों करवाई जाती है? यह तो अमानवीयता है, दोस्तों।

दोस्तों, आज जबकि करोड़ों लोग बेरोज़गार हैं, फिर क्या वजह है कि अधिकांश कल-कारखानों, सेवा संस्थानों, एवं शॉपिंग प्रतिष्ठानों में मजदूरों से 12-14 घंटे हाड़-तोड़ मेहनत करायी जाती है? उस पर भी इन मजदूरों को कोई साप्ताहिक छुट्टी नहीं मिलती है, अर्थात इनकी ज़िंदगी में कोई ‘संडे’ (फुर्सत का समय) नहीं होता है। इसका जवाब मुझे सत्ता के नुमाइंदों एवं पूँजीपति अर्थशास्त्रियों से चाहिए। लगातार काम करते रहने से मजदूर की उत्पादकता घट जाती है, इस वैज्ञानिक तथ्य के बावजूद किसी मज़दूर से 12-14 घंटे हाड़-तोड़ मेहनत क्यों करवाई जाती है? यह तो अमानवीयता है, दोस्तों।

ऊपर से सितम ये कि मोदी सरकार मजदूरों के अधिकारों की आधी-अधूरी पैरवी करने वाले श्रम काऩूनों में और ज्यादा कांट-छाट (कटौती) करके पूँजीपतियों को उपकृत करने पर आमादा है, ताकि ये पूँजीपति कल-कारख़ाना मालिक इन मज़दूरों का ज्यादा से ज्यादा तेल निकालकर मोटा मुनाफ़ा बना सकें। मजदूरों की पेराई का काम और अधिक सुगमतापूर्वक हो सके, इसके लिए मोदी सरकार ‘लेबर इंस्पेक्टर’ का पद खत्म करने की भी घोषणा कर चुकी है।

विडंबना देखिए कि इसी सत्तारत पार्टी की मजदूर इकाई ‘भारतीय मज़दूर संघ’ जो कि तथाकथित रूप से एक करोड़ मजदूर सदस्यों वाली संस्था होने का दावा करती है, वो मोदी सरकार के इन मजदूर विरोधी फैसलों के विरुद्ध 2 सितम्बर 2015 को देशव्यापी बंद करने जा रही है, जो दरअसल सत्ता प्रायोजित एक तमाशा है और उसके इस तमाशे में कांग्रेस पार्टी की मजदूर इकाई ‘इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ (INTUC ) और सीपीआई की मजदूर इकाई ‘ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन’ भी साझेदारी कर रही हैं।

दोस्तों क्या सरकारी तौर पर 8 घंटे की तयशुदा कार्यसमय सीमा सरकार द्वारा तय नहीं की जानी चाहिए जिससे कि मज़दूर भी 8 घंटे काम कर करने के बाद 8 घंटे सो सकें और 8 घंटे में मनोरंजन व अन्य पारिवारिक गतिविधियों का हिस्सा बन सकें। क्या सरकार व पूँजीपति, मज़दूर को इंसान नहीं मान सकते? इस पर विचार कीजिए, मंथन कीजिए और हो सके तो इनके ह़क में आवाज़ उठाइये।

किसान एवं मज़दूर जब तक आत्महत्या करने को विवश है, या उन्हें इंसान नही माना जाता, तब तक क्या हम आज़ादी मनाने के लायक हैं? ये आज़ादी, ये 15 अगस्त झूठी है दोस्तों। आज़ादी तो सिर्फ सत्ता में बैठे लोगों, एवं उनका चुनावी खर्च उठाने वाले पूँजीपतियों की है, ये मनाये आज़ादी का जश्न; हम नहीं।

पवन पांडेय के एफबी वाल से

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