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दुख-सुख

उत्तर प्रदेश की हर दूसरी महिला और हर दूसरा बच्चा कुपोषित क्यों?

: एक प्रश्न जो आज भी यक्ष प्रश्न बनकर खड़ा है : उत्तर प्रदेश की आधी आबादी कुपोषण जैसी महामारी से जूझ रही है। व्यवस्थाएं इस कदर दुर्व्यवस्था की शिकार है कि इसे सुधारने के लिए बार-बार देश की न्यायपालिका तक को हस्तक्षेप करना पड़ता है। क्या यह चिन्तनीय नहीं है? और तो और, इस दुर्व्यवस्था रूपी कोढ़ में खाज तो तब उत्पन्न होता है जब व्यवस्था में सुधार करने के बजाय जिम्मेदार लोगों द्वारा न्यायालय को ही लक्ष्मण रेखा न लांघने की नसीहत दिया जाने लगता है और तब न्यायालय को कहना पड़ता है कि अगर सीता ने लक्ष्मण रेखा न लांघी होती तो रावण का वध नहीं हो पाता।

: एक प्रश्न जो आज भी यक्ष प्रश्न बनकर खड़ा है : उत्तर प्रदेश की आधी आबादी कुपोषण जैसी महामारी से जूझ रही है। व्यवस्थाएं इस कदर दुर्व्यवस्था की शिकार है कि इसे सुधारने के लिए बार-बार देश की न्यायपालिका तक को हस्तक्षेप करना पड़ता है। क्या यह चिन्तनीय नहीं है? और तो और, इस दुर्व्यवस्था रूपी कोढ़ में खाज तो तब उत्पन्न होता है जब व्यवस्था में सुधार करने के बजाय जिम्मेदार लोगों द्वारा न्यायालय को ही लक्ष्मण रेखा न लांघने की नसीहत दिया जाने लगता है और तब न्यायालय को कहना पड़ता है कि अगर सीता ने लक्ष्मण रेखा न लांघी होती तो रावण का वध नहीं हो पाता।

अभी हाल ही में प्रदेश के बच्चों के हितार्थ उच्च न्यायालय इलाहाबाद को इस आशय का आदेश करना पड़ा कि ’’सरकारी खजानों से वेतन या सुविधा ले रहे बड़े लोगों के बच्चें जब तक सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ेंगे तब तक उनकी दशा में सुधार नहीं होगा। इसके लिए जनप्रतिनिधि, नौकरशाह व न्यायिक अधिकारियों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ना अनिवार्य करे सरकार।” आपको याद होगा कि इसके पूर्व भी सन 2006 में बाल अधिकारों के मसले पर देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रदेश के न्यायिक अधिकारियों से पाठशालाओं एवं बच्चों के स्वास्थ्य व स्कूल पूर्व शिक्षा के लिए स्थापित आगंनबाड़ी केन्द्रों का आकस्मिक निरीक्षण कराया गया। इस क्रम में तत्कालीन सी.जे.एम. गाजीपुर द्वारा गाजीपुर जिले में की गई जांच का निष्कर्ष यहां उल्लेखनीय है- ”मेरे द्वारा जिले के विभिन्न आंगनबाड़ी केन्द्रों का आकस्मिक निरीक्षण के आधार पर मेरा निष्कर्ष है कि समेकित बाल विकास परियोजना के अन्तर्गत स्थापित आंगनबाड़ी केन्द्र असफल है और आई.सी.डी.एस. योजना के उददेश्य को पूर्ण करने में विफल है।” इस योजना के पूर्णतः विफलता के निष्कर्ष के बावजूद न हम चेते न सरकार।

अब 2015 में प्रदेश के मुख्य सचिव बता रहे है- ”प्रदेश में वर्तमान में अल्प वजन के आधार पर कुपोषित कुल बच्चों की संख्या 42 प्रतिशत है। वर्ष 1998 से 2006 के मध्य तीन वर्ष से कम आयु के बच्चों में अल्प वजन के माप में 01 प्रतिशत बिन्दु से भी कम की कमी आयी है, जो अत्यन्त चिन्तनीय है।” दिनांक 30.04.2015 को मुख्यमंत्री प्रदेश के ग्राम प्रधानों को इस आशय का भावपूर्ण पत्र जारी करते हैं- ”आपको यह जानकर खुशी होगी कि उत्तर प्रदेश सरकार ने कुपोषण पर लगाम कसने के लिए राज्य पोषण मिशन की स्थापना की है। मिशन का लक्ष्य है प्रदेश के हर बच्चों और मां को सही पोषण का अधिकार मिलें और प्रदेश में कुपोषण की व्यापकता में कमी आये। आज हमारे प्रदेश में हर दूसरी महिला खून की कमी का शिकार है और हर दूसरा बच्चा कुपोषण से ग्रस्त है… ।”

प्रदेश में महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा 30-35 वर्षो से संचालित इस दीर्घ अवधि की योजना से एक आस जगी थी कि प्रदेश के बच्चों को इस भयावह कुपोषण से मुक्ति मिलेगी। योजना का लक्ष्य भारत के भविष्य माने जाने वाले नौनिहालों को ऐसा पोषक तत्व देना कि बचपन से वह शरीर व मन दोनों से स्वस्थ्य व संतुलित रहें। साथ ही किशोरियों एवं गर्भवती महिलाओं को स्वस्थ्य पोषण की व्यवस्था की गई। वर्तमान में दिख रही योजना की विफलता से जाहिर है कि अब तक नेतत्व व प्रशासन जनहित भूलाकर अपने-अपने हितों के हिसाब से कार्य करते रहे वह भी तब जब उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बारम्बार चेताया गया हो इसलिए यह बात बिल्कुल मानने लायक नहीं कि निगरानी तंत्र इसमें व्याप्त विसंगतियों से अनभिज्ञ रहा हो। सच तो यह है कि जहां निगरानी तंत्र कमजोर या भ्रष्ट हो वहीं सारे मानक ध्वस्त हो जाते हैं। यहां स्पष्ट है कि किस प्रकार निगरानी तंत्र और समन्वय अब तक पूरी तरह नाकाम रहा है। इनको इनके प्रशासनिक क्षमता में हुई इतनी बड़ी चूक के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, किन्तु अभी तक इस पर किसी स्तर पर कोई कार्यवाही का न होना घोर आश्चर्यजनक है।

भारतीय लोक प्रशासन से बेहतर प्रबन्धकीय सेवाओं की अपेक्षा की जाती है। खासकर उन मामलों में जिन सार्वजनिक नीतियों से भारतीय नागरिक प्रभावित होते हैं। मसलन अनिवार्य प्राथमिक सेवा, सबके स्वास्थ्य अथवा पोषाहार सेवा आदि। जिनकी इन महत्तवपूर्ण सेवाओं में अहम भूमिका होती है उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए और इतनी गम्भीर चूकों के लिए दण्डित भी किया जाना चाहिए। अन्यथा की स्थिती में जो संदेश जनता मे जायेगा वह आगामी चुनावो के दृष्टिगत राजनितिज्ञों के लिए आत्मघाती होगा।

वैसे भी राजनैतिक नेतृत्व का यह दायित्व है कि साफ और सक्षम लोक प्रशासन प्रदान करें और जनता का अधिकार है कि वह यह जाने कि प्रदेश में विगत 35 वर्षो से हजारो करोड़ प्रतिवर्ष खर्च करने के बावजूद आधी आबादी कुपोषण जैसी भयावह स्थिति में जीने को अभिशप्त क्यों? इस बात को भावी इतिहास और पीढ़ियां पूछेंगी और हमें जवाबदेही स्वीकार करनी पड़ेगी। इसलिए बिना किसी लांछन आक्षेप आरोप के हम एक नागरिक जानकारी का अधिकार मांगते है। अभी समय है कि जनता साहस के साथ यह पूछे कि कौन है सत्ता में बैठे हुए लोग जो संस्थाये सृजित करते हैं, योजनाये बनाते हैं और उन्हीं के खिलाफ खड़े हो जाते हैं। क्या हम समाज में नैतिकता का एक नया वातावरण नहीं तैयार कर सकते ताकि कोई योजना भष्टाचार की भेंट न चढ़ सके। 

लेखक शिवेंद्र पाठक गाजीपुर के वरिष्ठ चिंतक, टिप्पणीकार और पत्रकार हैं.

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