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चीन ने लखवी का समर्थन कर मोदी की हालिया चीनी विदेश नीति पर प्रश्न चिह्न लगा दिया

लश्करे-तइबा के सरगना ज़कीउररहमान लखवी के मामले में चीन ने पाकिस्तान का समर्थन कर दिया है। संयुक्तराष्ट्र संघ की 15 सदस्यी-कमेटी लखवी की गिरफ्तारी चाहती थी लेकिन सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य होने के नाते चीन ने अड़ंगा लगा दिया। चीन खुश हो रहा है कि उसने पाकिस्तान जैसे अभिन्न मित्र के साथ अपनी पक्की दोस्ती निभाई और पाकिस्तान का सीना फूल रहा है कि दुनिया में आखिरकार एक देश तो ऐसा है, जो बुरे वक्त में हमेशा उसके काम आता है।

लश्करे-तइबा के सरगना ज़कीउररहमान लखवी के मामले में चीन ने पाकिस्तान का समर्थन कर दिया है। संयुक्तराष्ट्र संघ की 15 सदस्यी-कमेटी लखवी की गिरफ्तारी चाहती थी लेकिन सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य होने के नाते चीन ने अड़ंगा लगा दिया। चीन खुश हो रहा है कि उसने पाकिस्तान जैसे अभिन्न मित्र के साथ अपनी पक्की दोस्ती निभाई और पाकिस्तान का सीना फूल रहा है कि दुनिया में आखिरकार एक देश तो ऐसा है, जो बुरे वक्त में हमेशा उसके काम आता है।

मैं समझता हूं कि दोनों ही देश गलती पर हैं। लखवी का पक्ष लेकर दोनों राष्ट्रों ने अपना नुकसान किया है। जहां तक पाकिस्तान का सवाल है, उसने अपने माथे पर बदनामी का काला टीका और लगवा लिया है। वह सारी दुनिया में पहले से बदनाम है, विश्व-आतंकवाद की सराय बनने के लिए लेकिन अब इस बात पर भी मुहर लग गई है कि पाकिस्तान की सरकार और अदालतें भी आतंकवादियों की रक्षा करती हैं। उनकी पीठ ठोकती हैं। जिस आतंक के सरगना को सं.रा. ने दोषी करार दिया है और 15 में से 14 राष्ट्र दंडित करना चाहते हैं,उसे बार-बार रिहा करने और जेल में सारी सुविधाएं देने का कोई कारण नहीं है। ऐसा करने के पीछे यदि कारण यह है कि लखवी का आतंकवाद भारत —विरोधी था तो इससे यह भी सिद्ध होता है कि पाकिस्तान सिर्फ उसी आतंकवाद का विरोधी है, जो उसके खिलाफ है। उसका विरोधी नहीं है, जो भारत और अफगानिस्तान के खिलाफ है। अंतरराष्ट्रीय समाज में पाकिस्तान की इज्जत तभी बनेगी, जब वह यह बताएगा कि उसके लिए सभी दहशतगर्द एक जैसे हैं।

चीन ने लखवी का समर्थन करके पाकिस्तान के साथ अपनी पक्की दोस्ती का सबूत तो दे दिया है लेकिन अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि खराब कर ली है। सं.रा. के बाकी देश उसके बारे में क्या सोचेंगे? परसों ही चीन के शहर काशगर में 18 लोग मारे गए हैं। उइगर आतंकवादियों के विरुद्ध अब चीन किस मुंह से मुहीम चलाएगा? अभी-अभी अफगानिस्तान की संसद पर हमला हुआ है। अफगान लोग क्या चीन के बारे में अच्छी राय बनाएंगे? चीन ने नरेंद्र मोदी की चीन-यात्रा के दौरान आतंकवाद के खिलाफ साझा मोर्चे की बात कही थी और यही बात उसने फरवरी में रुस, चीन, भारत संवाद में भी कही थी। अब चीन के बारे में क्या सोचा जाएगा? चीन के उक्त कदम ने मोदी की चीन-नीति पर भी प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। मोदी ने चीन फोन तो किया था लेकिन हमारी सरकार ने यह नहीं बताया कि लखवी के मामले में उधर से किसने बात की थी? चीनी राष्ट्रपति शी चिन फिंग ने कोई लिफ्ट भी दी या नहीं? पाकिस्तान को पटरी पर लाने के लिए इसको या उसको पटाने की बजाय सीधी बातचीत ज्यादा जरूरी है।

लेखक डॉ. वेदप्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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