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दुख-सुख

मीडिया को Regulate करने की मोदी सरकार की कोशिशों से हर कोई अचरज में है

Nadim S. Akhter : याकूब मेमन की फांसी के मामले में सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने तीन टीवी न्यूज चैनलों को जो शो-कॉज नोटिस जारी किया है, उसकी मैं कड़े शब्दों में निंदा और भर्त्सना करता हूं. हमारा लोकतंत्र अभी इतना कमजोर नहीं हुआ कि सरकार मीडिया को गाइड करने लगे, उसे दिशा-निर्देश देने लगे. एक जीवंत लोकतंत्र में हमेशा यही अच्छा होता है कि मीडिया खुद ऐसे मामलों में आत्मावलोकन करके भूल-सुधार कर ले (अगर कोई चूक हुई हो तो). सूचना प्रसारण मंत्रालय ने जिस तरह इस मामले को तूल देकर मीडिया पर शिकंजा कसने और उसे डराने-धमकाने की कोशिश की है, वह अच्छे संकेत नहीं हैं.

Nadim S. Akhter : याकूब मेमन की फांसी के मामले में सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने तीन टीवी न्यूज चैनलों को जो शो-कॉज नोटिस जारी किया है, उसकी मैं कड़े शब्दों में निंदा और भर्त्सना करता हूं. हमारा लोकतंत्र अभी इतना कमजोर नहीं हुआ कि सरकार मीडिया को गाइड करने लगे, उसे दिशा-निर्देश देने लगे. एक जीवंत लोकतंत्र में हमेशा यही अच्छा होता है कि मीडिया खुद ऐसे मामलों में आत्मावलोकन करके भूल-सुधार कर ले (अगर कोई चूक हुई हो तो). सूचना प्रसारण मंत्रालय ने जिस तरह इस मामले को तूल देकर मीडिया पर शिकंजा कसने और उसे डराने-धमकाने की कोशिश की है, वह अच्छे संकेत नहीं हैं.

बीजेपी वाली नरेंद्र मोदी सरकार को अभी साल भर ही हुए हैं और मीडिया को -Regulate- करने की उसकी इस कोशिश से हर कोई अचरज में है. ये वही पार्टी है ना, जिसके पुरोधा अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी, इंदिरा गांधी के समय़ वाली Emergency यानी आपातकाल को देश के इतिहास का काला काल कहते नहीं थकते थे और इस दौरान प्रेस यानी मीडिया का गला घोंटने की इंदिरा गांधी की कोशिशों की खूब आलोचना करते थे. तो बीजेपी को अब क्या हो गया??!!! अभी साल भर ठीक से केंद्र की सत्ता में गुजारे नहीं और मीडिया को हड़काने की कोशिश शुरू !!! सुनते हैं कि गुजरात का मीडिया मैनेज कर लिया था, दिल्ली का भी कुछ हद तक कर लिया लेकिन सबको मैनेज नहीं कर सके तो अब ये धृष्टता !!??

BEA यानी Broadcast Editors’ Association ने इस नोटिस के जवाब में सूचना प्रसारण मंत्री से मुलाकात की है और अपना पक्ष रखा है. लेकिन यह पूरी घटना ही दुर्भाग्यपूर्ण है. क्या केंद्र सरकार की मति मारी गई है, जो देश की असल समस्याओं को सुलझाने की बजाय वह मीडिया से भिड़ रही है, उसे काबू करने की कोशिश कर रही है??!!! ये किस चीज के संकेत हैं. क्या नरेंद्र मोदी सरकार के आने वाले चार साल मीडिया पर भारी पड़ने वाले हैं? केंद्र सरकार में नम्बर -2 यानी जिस अरुण जेटली को सबसे ज्यादा समझदार समझा जाता है (हालांकि वो लोकसभा का चुनाव हार गए थे, फिर भी सरकार में उनकी तूती बोलती है) क्या सूचना प्रसारण मंत्री होने के नाते अब वो भी मीडिया का गला दबाने की कोशिशों में साथ हैं?

अगर ऐसा है तो मैं कांग्रेस की अगुवाई वाली सोनिया गांधी की सरकार, माफ करिए मनमोहन सिंह की सरकार को लख-लख बधाई देता हूं, जिन्होंने 10 वर्षों तक इस देश पर राज किया, अन्ना के आंदोलन के समय केंद्र सरकार की चूलें हिल गईं, पर कभी उन्होंने मीडिया का गला दबाने की कोशिश नहीं की. एक बात और. मीडिया भी दूध की धुली हुई नहीं है और उसके अंदर आ रही खामियों को मीडिया के लोग ही आपस में मिल-बैठकर दूर करें तो अच्छा. इसमें सरकार या न्यायपालिका या अन्य किसी भी संस्था की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए. एक जिंदा लोकतंत्र के लिए ये बहुत जरूरी है.

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जिंदा आतंकी पकड़े जाने के बाद उसका “exclusive” इंटरव्यू मीडिया को उपलब्ध कराए जाने को लेकर नीचे लिखी गई गई मेरी पोस्ट पर मित्र संकेत पाठक ने कहा है कि आतंकवादी को मीडिया के सामने परोसा नहीं गया था, वहां मौजूद दो स्ट्रिंगरों ने अपने मोबाइल फोन से तत्काल उनका इंटरव्यू कर लिया था और साथ में जम्मू पुलिस के सिर्फ दो कॉन्स्टेबल थे. संकेत सही कह रहे हैं. खबरों की दुनिया को अंदर से समझने वाला हर आदमी जानता है कि कई बार मीडिया पुलिस आदि को ठेंगा दिखाकर कई खतरनाक आतंकवादी-डाकू आदि तक पहुंच जाता है और उनका इंटरव्यू ले आता है. लेकिन इस बार मामला पेचीदा है. पाकिस्तान से आया जिंदा आतंकवादी पुलिस की गिरफ्त में हो और जम्मू पुलिस मामले को इतने –हल्के– ढंग से ले रही हो कि आनन-फानन में वहां पहुंचा-मौजूद स्ट्रिंगर (पत्रकार) उसका इंटरव्यू ले ले, तो बात हजम नहीं होती.

क्या रोज आतंकवाद ले लड़ रही जम्मू-पुलिस को ये ट्रेनिंग नहीं दी गई है कि अगर कोई आतंकवादी जिंदा हाथ आ जाए तो वैसी स्थिति में पुलिस का action plan क्या होगा!!! बात गंभीर इसलिए है कि पुलिस और खुफिया अधिकारियों के अलावा अगर कोई अन्य व्यक्ति उस आतंकवादी के इतने करीब पहुंच जाता है तो ऐसी स्थिति में आतंकवादी की जान को गंभीर खतरा हो सकता है. कौन जाने पत्रकार का रूप धर के वहां आए लोग आतंकवादी गैंग के ही हों, जो पुलिस की गिरफ्त में आए अपने साथी को मारने आए हों!!! ऐसे कई सवाल हैं, जिनके जवाब मिलने अभी बाकी हैं. बहरहाल, संकेत की टिप्पणी का मैंने जो जवाब दिया है, उसे नीचे कॉपी-पेस्ट कर रहा हूं-

”मैं भी बिलकुल वही बात कह रहा हूं. क्या ये हैरतअंगेज नहीं है कि बरसों से आतंकवाद का सामना कर रही जम्मू-कश्मीर पुलिस अभी तक जिंदा पकड़े गए आतंकवादियों को कैसे हैंडल किया जाए, ये अभी तक सीख नहीं पाई है. इतने सेंसिटिव मामले में इतनी लापरवाही!!! क्या जम्मू पुलिस के अफसरों ने इतने बड़े मामले में आतंकवादी को सिर्फ दो कांस्टेबल के हवाले कर दिया था, उनको कोई निर्देश नहीं दिया था??!!! क्या उन दोनों कांस्टेबल को ये पता नहीं था कि मीडिया के स्टिंगर (पत्रकार) अगर उनका इंटरव्यू ले लेंगे तो क्या-क्या हो सकता है. कौन जाने, पत्रकार यानी स्टिंगर बनके वहां गया आदमी हो सकता है कि आतंकवादियों के गुट का ही हो, और पकड़ा गया आतंकवादी कोई राज ना उगल दे, इस गरज से आतंकवादी को इंटरव्यू के बहाने मार दे.!!! कुछ भी हो सकता था उस दौरान. इस मामले में जो घोर लापरवाही हुई है, और जिस तरह जम्मू पुलिस ने पकड़े गए आतंकवादी तक मीडिया को पहंच जाने दिया, उसकी जांच होनी चाहिए और दोषी अफसरों-कॉन्सटेबल के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए. गृह मंत्रालय को मामले का संज्ञान लेना चाहिए. पूरे घटनाक्रम से तो यही लग रहा है कि या तो जम्मू-कश्मीर पुलिस बहुत भोली या अनाड़ी है या फिर मामला कुछ और है. सच्चाई सामने आनी चाहिए.”

पत्रकार और शिक्षक नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

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