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मोदी के कथित ‘गुजरात विकास मॉडल’ को ‘पटेल बम’ ने ध्वस्त कर दिया है…

Vishnu Nagar : गुजरात में हार्दिक पटेल नामक एक 22 साल के युवा के नेतृत्व में हिंसक रूप ले चुके आंदोलन के बाद कुछ चीजें स्पष्ट हुई हैंः 1. सांप्रदायिक हिंसा प्रायोजित करके सत्ता का लाभ उठानेवाली पार्टी पिछले पंद्रह वर्षों से बड़े पूँजीपतियों के समर्थन से सांप्रदायिक नफरत और वैचारिक दिवालियापन को संस्थागत रूप देकर गुजरात में राज कर रही थी और निश्चिंत थी कि यह सब चलता रहेगा अनंत काल तक मगर पार्टी को उसीके हथियारों का इस्तेमाल कर पटेल समुदाय उसे कटघरे में खड़ा कर दिया है, आमने-सामने ला दिया है। पटेलों के 22 साल के युवा नेता हार्दिक पटेल भी हिंसा में, हिंदू सांप्रदायिकता में विश्वास करता है, धमकियों की भाषा में बात करता है। उसके आदर्श वही बाल ठाकरे हैं, जिन्होंने महाराष्ट्र में जातिवाद, भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता को बढ़ाते हुए भाजपा से सहयोग किया है। हार्दिक की निकटता नरेंद्र मोदी के भीतरी हिंदुत्ववादी शत्रु प्रवीण तोगड़िया से है, वह कुख्यात नरोदा पाटिया हत्याकांड के आरोपी बाबू बजरंगी के नजदीक आने को भी उत्सुक है, हिंदू समाज की रक्षा के संघी विचार से भी वह प्रभावित है। इसलिए एक पतित विचार उससे भी पतित विचार का जन्मदाता बन जाता है और उसे ही तगड़ी चुनौती देने लगता है।

Vishnu Nagar : गुजरात में हार्दिक पटेल नामक एक 22 साल के युवा के नेतृत्व में हिंसक रूप ले चुके आंदोलन के बाद कुछ चीजें स्पष्ट हुई हैंः 1. सांप्रदायिक हिंसा प्रायोजित करके सत्ता का लाभ उठानेवाली पार्टी पिछले पंद्रह वर्षों से बड़े पूँजीपतियों के समर्थन से सांप्रदायिक नफरत और वैचारिक दिवालियापन को संस्थागत रूप देकर गुजरात में राज कर रही थी और निश्चिंत थी कि यह सब चलता रहेगा अनंत काल तक मगर पार्टी को उसीके हथियारों का इस्तेमाल कर पटेल समुदाय उसे कटघरे में खड़ा कर दिया है, आमने-सामने ला दिया है। पटेलों के 22 साल के युवा नेता हार्दिक पटेल भी हिंसा में, हिंदू सांप्रदायिकता में विश्वास करता है, धमकियों की भाषा में बात करता है। उसके आदर्श वही बाल ठाकरे हैं, जिन्होंने महाराष्ट्र में जातिवाद, भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता को बढ़ाते हुए भाजपा से सहयोग किया है। हार्दिक की निकटता नरेंद्र मोदी के भीतरी हिंदुत्ववादी शत्रु प्रवीण तोगड़िया से है, वह कुख्यात नरोदा पाटिया हत्याकांड के आरोपी बाबू बजरंगी के नजदीक आने को भी उत्सुक है, हिंदू समाज की रक्षा के संघी विचार से भी वह प्रभावित है। इसलिए एक पतित विचार उससे भी पतित विचार का जन्मदाता बन जाता है और उसे ही तगड़ी चुनौती देने लगता है।

2. पटेल आंदोलन नरेंद्र मोदी के उस प्रचार की अच्छी तरह पोल खोल देता है जिसे भुनाकर उन्होंने लोकसभा चुनाव जीता था। प्रचार यह था कि देश में अगर कहीं ककिसी एक राज्य में प्रगति हुई है तो वह सिर्फ गुजरात है और उनके मॉडल की वजह से हुई है। यह मॉडल पूरे देश में लागू करने पर देश बहुत आगे चला जाएगा। सारा देश गुजरात की तरह विकसित हो जाएगा। झूठ पर आधारित यह मॉडल भ्रष्टाचार, पूँजी के खुले खेल, मुसलिम विरोधी भावनाओं को भड़कानें मुसलमानो को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने, आदिवासी अस्मिता को खत्म कर उसे हिंदूवादी अस्मिता बनाने पर टिका हुआ था। इसे देश के बड़े पूँजीपतियों को अंधाधुंध सुविधाएँ देकर खड़ा किया गया था। यह मॉडल मोदीजी के प्रधानमंत्री बनने के 15 महीने बाद ही भरभराता लग रहा है जो पटेल जैसे गुजरात के समृद्धतम तबके के युवाओं की आकांक्षाओं पर भी खरा नहीं उतर पा रहा है।

3. हर राज्य की ताकतवर जातियाँ एकजुट होकर अनुसूचित जातियों,आदिवासियों तथा पिछड़ों को आरक्षण छीनने या उस पोल में खुद भी घुसकर इस पूरे विचार को खत्म करने पर आमादा हैं। गुजरात के पटेल, महाराष्ट्र के मराठा, राजस्थान के गूजर, हरियाणा के जाट इसी विचार की प्रतिनिधि ताकतें हैं। ये अब चुप नहीं बैठनेवाली और कमजोर वर्गों का हिस्सा मारने के लिए मैदान में आ चुकी हैं। यह स्थिति एक विकट संकट को जन्म दे सकती है जिसकी काट भाजपा के पास तो नहीं है।

4. क्या इस पटेल आंदोलन का कोई असर बिहार चुनाव पर नहीं पड़ेगा?

वरिष्ठ पत्रकार और कवि विष्णु नागर के फेसबुक वॉल से.

Akhilesh Prabhakar : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कथित ‘गुजरात विकास मॉडल’ को ‘पटेल बम’ ने ध्वस्त कर दिया है. गुजरात इस वक्त अशांति और अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है. पटेल समाज गुजरात के व्यापार और राजनीति दोनों में अच्छी खासी दखल रखता आया है. मौजूदा सरकार की मुख्यमंत्री स्वयं पटेल समाज से हैं और कई मंत्री-विधायक भी इसी समाज से हैं. इसके बाबजूद; पटेल समाज का बहुसंख्यक हिस्सा मोदी के तथाकथित विकास मॉडल में हाशिए पर क्यों खड़ा है? हालाँकि, विभिन्न सरकारी, गैर-सरकारी आंकड़े गुजरात में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, और लोगों के जीवनस्तर आदि के बारे में मोदी के “छद्म विकास” की पोल पहले ही खोल कर रख दिया था. बहरहाल, आरएसएस की हिंदुत्व साम्प्रदायिक प्रयोगशाला में “छद्म विकास” को “हिंदुत्व-उग्रवाद” के पांव तले दबा दिया गया. अलबत्ता, गुजरात से बाहर गुजरात माडल का मिथ इतनी मजबूती से गढ़ा गया कि उसे आसानी से तोड़ पाना किसी के लिए मुमकिन नहीं रहा.

अखिलेश पराशर के फेसबुक वॉल से.

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