रामवृक्ष यादव तो मोहरा था… जय गुरुदेव से लेकर, आसाराम तक और रामपाल से लेकर परमानंद और नित्यानंद तक की यही कहानी है….

Navin Kumar : रामवृक्ष यादव तो मोहरा था। किसी गुरुदेव, उसकी दौलत और राजनीति के गठजोड़ का। वह पहला भी नहीं था आखिरी भी नहीं है। जंगलों में धूनी रमाने वाले, कंदमूल पर जीने वाले अनासक्त बाबाओं को जब से रुपया कमाने की लत लगी, आलीशान आश्रम बनाने की लत लगी, टीवी के कैमरों पर चमकने की लत लगी, कारोबार करने की लत लगी तभी से ऐसे गठजोड़ बनने शुरू हुए। सुना था कि संत मृत्यु से नहीं डरते। लेकिन बाबा जब इतना डरपोक होगा कि एक्स वाई ज़ेड टाइप की सुरक्षा लिए बगैर चल ही न सके तो समझ लीजिए वह आध्यात्म के धरातल पर कहां खड़ा है।

आपने कल्पना की है कोई बाबा ध्यान में लीन हो और चारों तरफ बंदूकची खड़े हैं? मोक्ष की बात करने वाले जब खुलेआम फेशियल, क्रीम, साबुन आटा, तेल, घी का विज्ञापन करने लगेंगे तो आध्यात्म की इस उदार व्यवस्था में बंदूकची बुलाने नहीं पड़ते अपने आप घुस आते हैं। बाबाओं के सैकड़ों एकड़ में फैले हजारों करोड़ के साम्राज्य यूं ही नहीं खड़े होते। बाबागीरी का ये उबटन काला धन, गंदी राजनीति, अपराध और बर्रबरता की वनस्पतियों से तैयार होता है। वह बाबा कोई भी हो। रविशंकर जैसे बाबा पूरी बेशर्मी से भारत की अदालत को ठेंगा दिखाकर शान से ऐसे ही नहीं रहते। इसके पीछे बाबगीरी की सोहबत में चलने वाली राजनीति और रुपये की निराकार माया काम करती है।

जय गुरुदेव से लेकर, आसाराम तक और रामपाल से लेकर परमानंद और नित्यानंद तक यही कहानी है। जिन्होंने हथियार नहीं चमकाए हैं इसका मतलब ये नहीं है कि उनके तपोवन में हथियार या गुंडे हैं नहीं। इसका मतलब यह है कि अभी इसके बगैर उनका कारोबार निष्कंटक चल रहा है। नेता जब ऐसा बाबाओं के कदमों में गिरता है तो जनता का विश्वास भी उसकी कृपा पर छोड़ आता है। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपतियों, मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, सांसदों और विधायकों की बाबा दरबार में हाजिरी उन्हें महाराज से मवाली हो जाने की अनकही वैधता देती है। अकेले रामवृक्ष पर मत रोइए। रामवृक्षों की जमात हर कारोबारी बाबा के आश्रम में पल रही है।

न्यूज24 में कार्यरत पत्रकार और एंकर नवीन कुमार के फेसबुक वॉल से.

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