क्या हम सभी राष्ट्रद्रोही हैं?

आज पूरे देश में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में ।ठटच् के पूर्वनियोजित बवंडर से उठे तूफान ने ‘‘ राष्ट्रभक्त ’’ और ‘‘ राष्ट्रद्रोही ’’ की परिभाषा को ही सवाल के घेरे में खड़ा कर दिया है। सोशल साइट्स व खाए-पीए अघाए लोगों में हर रोज ‘‘राष्ट्रभक्त ’’ और ‘‘ राष्ट्राद्रोही’’ की नई नवेली परिभाषा इस तरह से अवतरित हुई है कि सोते-जागते उन्हें सिर्फ यही दो शब्द दिख रहे है। जब पूरे देश में बवाल मचा हो तो ‘‘ बोल कि लव जिहाद है तेरे ’’ को ध्यान में रखते हुए और ‘‘ तेरे इस झूठ को नहीं मानता नहीं मानता ’’ कि राह पर चलते हुए इस आशंका व डर के साथ कि कहीं मैं भी कल राष्ट्रद्रोही घोषित न हो जाउं, इस पूरी घटना पर तफ्शीश से कुछ कहना चाहता हूं।

जेएनयू घटना की पृष्ठ भूमि-
9 फरवरी से शुरू हुए बहस व मिडिया ट्रायल, राष्ट्रभक्त व राष्ट्रद्रोही के लगते हुए नारों केे बीच अब तक आपलोग इतना तो जान ही गये होंगे कि जेएनयू देश का एकमात्र ऐसा विश्वविद्यालय है, जहां किसी भी सवाल पर जमकर बहस होती है। छात्र व बुद्धिजीवी खुलकर किसी भी सवाल पर अपनी राय रखते है, किसी भी नेता को अपना प्रवचन कैंपस में देने के बाद उसे छात्रों के ‘‘ अराजक ’’ सवालों से सामना करना पड़ता है आदि आदि। ठीक इसी तर्ज पर जब फरवरी 2013 संसद हमले के ‘‘ आरोपी ‘‘ अफजल गुरू को उनके परिवार व राष्ट्र को भी बिना किसी पूर्व सूचना के फांसी पर लटका दिया गया था तो इसके खिलाफ उस दिन भी पूरे देश में प्रगतिशील तबकों के साथ-साथ जेएनयू में भी रात में मशाल जुलूस हजारों छात्रों द्वारा निकाला गया था।

उस दिन के बाद प्रत्येक वर्ष 9 फरवरी को जेएनयू में अफजल गुरू के फांसी की बरसी पर कार्यक्रम होते रहें है, तो अब सवाल उठता है कि 9 फरवरी 2014 और 9 फरवरी 2015 के कार्यक्रम पर जेएनयू प्रशासन था तो फिर राष्ट्रभक्त ABVP द्वारा क्यों नहीं रोक लगाया गया। 2013 से शुरू हुए कार्यक्रम और इस 9 फरवरी के हुए कार्यक्रम में लगाये गये नारों पर मैं नहीं जाना चाहंगा  क्योंकि नारों के बारे में अभी भी उहापोह ही है। आप मोदी सरकार का बहाना भी नहीं बना सकते क्योंकि पिछले वर्ष भी मोदी सरकार ही थी। इसका कारण जहां तक मैं समझता हूं तो यह है कि सितंबर 2015 में जेएनयू में हुए छात्रसंघ चुनाव में सेंट्रल पैनल में ज्वाइंट सेक्रेटरी पद पर ABVP की जीत व इस चुनाव में उनकी दमदार उपस्थिति के कारण ही उन्हें जेएनयू में बवंडर लाने को प्रेरित किया। जेएनयू में इनकी मजबूत उपस्थिति कैसे हुइ, ये भी हमें सोचना होगा।

पिछले छात्रसंघ के चुनाव के समय जब बिहार में सभी वामदल के महासचिव हाथों में हाथ डालकर एकता का इजहार कर रहे थे तो ठीक उसी वक्त देश के सबसे बौद्धिक माने जाने वाले कैंपस में इनके छात्र संगठन एक दूसरे को गरिया रहे थे। इनकी आपसी फूट ने इस कैंपस में ABVP को संजीवनी देने का काम किया। आपको लग रहा होगा कि मैं गड़े मुर्दे क्यों उखाड़ रहा हूं? तो मेरा कहना है कि किसी भी आंदोलन को आगे ले जाने के लिए आपकी अपने द्वारा इतिहास में की गई गलतियों से भी सबक लेना होगा।  खैर अब इस 9 फरवरी को क्या हुआ, इसके बारे में भी जानकारी जरूरी है। अफजल गुरू के फांसी की बरसी पर ‘‘ कल्याण नाइट के आंदोलन की घोषणा कुछ छात्रों ने 9 फरवरी के 4-5 दिन पहले ही की और इसे फेसबुक  व ट्वीटर पर भी पोस्ट किया।

ये तमाम आयोजक छात्र इस वक्त किसी भी छात्र संगठन से जुड़े हुए नहीं थे। इसलिए इन्होने आयोजक की जगह पर भी अपने नाम का प्रयोग किया लेकिन इन तमाम छात्रों का इतिहास वामपंथी ही रहा है। ये सभी छात्र पहले डीएसयू (डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन) के सदस्य थे जिन्होंने अक्टूबर 2015 में अपने संगठन से ‘‘महिला सवाल ’’ पर चले बहस में सामूहिक इस्तीफा दे दिया , जिनसे संबंधित खबरें इनके वाल पर अभी भी मौजूद है। कार्यक्रम की घोषणा के बाद 3-4 दिन तक कोई हलचल इन राष्ट्रभक्त के जरिये नहीं हुआ। यानि अचानक 9 फरवरी को इन्होने विश्वविद्यालय प्रशासन को कहकर इस कार्यक्रम के आदेश को निरस्त करा दिया। आखिर अचानक क्यों? आप सभी को याद होगा कि रोज इसी समय हैदराबाद विश्वविद्यालय के दलित छात्र रोहित वेउला की आत्महत्या या कहा जाए तो विश्वविद्य़ालय द्वारा उसकी की गयी हत्या के खिलाफ पूरे देश में छात्र आंदोलन तेज हो रहा था। और संघ परिवार और इनके लगुवे-भगुवे इनमें घिरते नजर आ रहे थे। और इस घेरा बंदी में वामपंथी छात्र की एक बड़ी भूमिका थी। आप समझ सकते है कि जेएनयू में वामपंथी छात्रों पर  ‘‘देशद्रोही’’ का लेबल चिपकाने से किनको फायदा हुआ ? रोहित वेउला का सवाल नेपथ्य में कैसे गया? डिफेंसिव नजर आ रही संघपरिवार अचानक एग्रेसिव मोड में कैसे आ गयी? इसी सवाल के जवाब में है जेएनयू की पूरी पृष्ठ भूमि।

‘‘ राष्ट्रभक्त’’ बनाम ‘‘ देशद्रोही ’’-
संघपरिवार हमेशा कम्युनिस्टों को विदेशी एजेंट व विदेशी विचारों का अनुयायी कहता रहा है। जेएनयू प्रकरण के तुरंत बाद मुख्यधारा की पूरी इलेक्ट्रोनिक मिडिया व प्रिंट मिडिया ने जिस तरह से पूरे जेएनयू को ‘‘राष्ट्रद्रोहियो’’ का अड्डा कहना शुरू किया और  जेएनयू के बारे में क ख  भी नहीं जानने वाले मोदी भक्तों ने सोशल साइट्स पर भी कोहराम मचाना शुरू किया, उसे क्या कहेंगें आप? क्या अभी भी आप मानते हैं कि हमारा मिडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है? अगर आप एक ही चैनल को दो दिनों तक लगातार देखते होगें तो समझे होगें कि किस तरह से एक ही एंकर की राय जेएनयू प्रकरण में लगातार बदल रही थी। इस न्यूज को देखने व पढ़ने के बाद जिनको भी जेएनयू व वामपंथ के बारे में थोड़ी सी भी जानकारी होगी क्या उनके पास अपना सर धुनने के अलावा कोई उपाय बचा होगा?

9 फरवरी के बाद कॉरपोरेट मिडिया की रिपोर्टींग, सोशल साइट्स पर चल रही बहसों ,पटियाला कोर्ट के वकीलों की ‘‘राष्ट्रभक्ति’’ भाजपा विधायक ओपी शर्मा की रंगदारी प्रधानमंत्री, गृहमंत्री हरियाणा के ओएसी, संघ परिवार के बुद्धिखोरों , विद्यार्थी परिषद् के अंधभक्तों के बयान व एक्शनों का यदि विश्लेषण किया जाए तो एक बात तो स्पस्ट हो ही जाती है कि हमारे सामने हमारा दुश्मन विकराल रूप से सामने आ रहा है। अपने ‘राष्ट्रभक्त’ चेहरों के साथ ये वही चेहरे है जिनका अंग्रेंजो के खिलाफ भारतीय जनता की लडा़ई में कोई योगदान नहीं रहा है। जो हिटलर को अपना आदर्श मानते है,जो स्वदेशी की माला जपते नहीं थकते लेकिन विदेशी ंपूंजी निवेश पर इन्हें कोई एतराज नहीं, जो हर चुनाव में राम मंदिर और हिंदू राष्ट्र का नारा उछालते हैं, जो हर विरोध को ‘‘राष्ट्रद्रोह’’ करार देते हैं। इसलिए आज तिरंगा थामकर अपनी ‘‘देशभक्ति’’ का सबूत देने वाले दोस्तों से मैं सिर्फ यही कहना चाहता हूं कि राष्ट्र किसका है? इस बात पर हमें बहस को केंद्रित करना चाहिए। हमें इस बहस को सोशल साइट्स व शहरों की चकमकाती दुनिया से बाहर निकाल कर गांवों-कस्बों में ले जाना होगा। हमें इस बहस को कर्ज के बोझ तले दबे किसानों के बीच, जल-जंगल-जमीन को बचाने की लडा़ई लड़ रहे आदिवासियों के बीच, जी तोड़ मेहनत करने के बाद भी भर पेट खाना न खा पाने वाले मजदूरों के बीच ,बलात्कार व यौन उत्पीड़न झेल रही महिलाओं के बीच व अपने असुरक्षित भविष्य की चिंता में डूबे छात्र-युवाओं के बीच ले जाना होगा। यही बताएगें कि असली ‘‘देशभक्त’’ कौन है और कौन है ‘‘देशद्रोही ’’।

अगर प्रतिदिन तिरंगे को सलामी देना ही राष्ट्रभक्ति है तो फिर सभी कार्यालयों के बाबुओं, मंत्रियों-संत्रियों के टेबल पर रखे तिरंगे के सामने घोटाले की पटकथा रचने वालों को क्या कहेगें आप? हिंदू राष्ट्र का नारा देने वालों को क्या कहेगें आप? शस्त्र पूजा करने वाले कौन हैं? राष्ट्रपिता कहलानेवाले गांधी के हत्यारे गोडसे को पूजनेवाले कौन है? अगर ये सब ‘‘राष्ट्रभक्त’’ है तो इसके खिलाफत करनेवालों को ‘‘राष्ट्रद्रोही’’ तो कहा ही जाएगा और हमें इस लेबल का स्वागत करना चाहिए।

Rupesh Kumar
kumar185.rupesh@gmail.com

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