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संसद के ठप रहने की सबसे ज्‍यादा चिंता उद्योगपतियों को है… जानिए क्यों है!

Abhishek Srivastava : देश की संसद किसके लिए काम करती है? इसका जवाब जानने के लिए बस इतना पता कर लीजिए कि संसद के ठप रहने की सबसे ज्‍यादा चिंता किसको है। कुल 41,000 लोगों ने संसद के ठप रहने पर चिंता जताते हुए जिस ऑनलाइन याचिका पर अब तक दस्‍तखत किए हैं, उसकी शुरुआत सीआइआइ यानी भारतीय उद्योग परिसंघ ने की है। याचिका का लिंक खोलकर दस्‍तखत करने वाले नामों की सूची बस देख लीजिए और खुद से पूछिए कि किस उद्योगपति का नाम छूट गया है! ज़रा पूछिए, इन धनकुबेरों की चिंता क्‍या है? याचिका कहती है, ” Recent events have been disheartening.They have the potential of eroding popular faith in Parliament”. किसकी आस्‍था? ”पॉपुलर” आस्‍था। लोगों की आस्‍था। यदि लोगों की आस्‍था संसद में कम होगी तो उससे उद्योगपतियों का क्‍या लेना-देना? लोगों ने ही सांसदों को चुना है, आस्‍था घटी तो अगली बार नहीं चुनेंगे। बीच में सीआइआइ कहां से आ गया भाई?

Abhishek Srivastava : देश की संसद किसके लिए काम करती है? इसका जवाब जानने के लिए बस इतना पता कर लीजिए कि संसद के ठप रहने की सबसे ज्‍यादा चिंता किसको है। कुल 41,000 लोगों ने संसद के ठप रहने पर चिंता जताते हुए जिस ऑनलाइन याचिका पर अब तक दस्‍तखत किए हैं, उसकी शुरुआत सीआइआइ यानी भारतीय उद्योग परिसंघ ने की है। याचिका का लिंक खोलकर दस्‍तखत करने वाले नामों की सूची बस देख लीजिए और खुद से पूछिए कि किस उद्योगपति का नाम छूट गया है! ज़रा पूछिए, इन धनकुबेरों की चिंता क्‍या है? याचिका कहती है, ” Recent events have been disheartening.They have the potential of eroding popular faith in Parliament”. किसकी आस्‍था? ”पॉपुलर” आस्‍था। लोगों की आस्‍था। यदि लोगों की आस्‍था संसद में कम होगी तो उससे उद्योगपतियों का क्‍या लेना-देना? लोगों ने ही सांसदों को चुना है, आस्‍था घटी तो अगली बार नहीं चुनेंगे। बीच में सीआइआइ कहां से आ गया भाई?

सीधा सा मतलब है कि संसद का कुल लेना-देना इस देश के उद्योगपतियों के साथ है। वह इन्‍हीं के लिए काम करती है। इसीलिए सीआइआइ को मिर्ची लग रही है। मान लेते हैं कि इस याचिका पर बहुत से बहुत एक लाख लोग दस्‍तखत करेंगे। इसका मोटा मतलब हुआ कि सवा अरब की आबादी में एक लाख लोगों का हित संसद के काम करने से जुड़ा है जबकि इन एक लाख लोगों को संसद में सवा अरब लोगों की आस्‍था के घटने की चिंता है। साफ़ है कि एक लाख लोग इस देश के बाकी लोगों को संसद के नाम पर चरा रहे हैं। इसका मतलब यह भी हुआ सवा अरब लोगों की आस्‍था को एक लाख लोग मैनिपुलेट कर रहे हैं और उन्‍हें लोकतंत्र का सब्‍ज़बाग दिखाकर अपनी मलाई काट रहे हैं।

हमारे लिए इसका मतलब क्‍या होना चाहिए? पहला, संसदीय लोकतंत्र उद्योगपतियों के लिए बना है, आम लोगों के लिए नहीं। दूसरा, जब-जब लोकतंत्र और संसद पर खतरे की बात उछाली जाए, समझ जाओ कि पूंजीपतियों को घाटा हो रहा है। तीसरा, चुनाव कराकर सांसदों को संसद में भेजना और इस तरह संसदीय प्रणाली को बनाए रखना जनता को मूर्ख बनाने और बझाए रखने का एक कारोबारी धंधा है। चौथा और आखिरी, संसद के बारे में चिंतित होना अपना खून चूसने वाले दुश्‍मन का भला सोचना है। अगली बार कोई चिंता में कहे कि भाई साहब, संसद ठप पड़ी है तो उसको जवाब देना- मैनू की? पलट कर अगर वो पूछे कि क्‍या आपकी संसद में आस्‍था नहीं है, तो जवाब देना- तैनू की?

पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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