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भारत की वकालत करने वालों के सामने लगा इण्डिया-इण्डिया का नारा

क्रिकेट का महाकुंभ, विश्वकप समाप्त हुआ। चारों तरफ हो हल्ला मचा, क्योंकि इंडिया जो अपने ही देश में हार गया था। हारे इंडिया या जीते इंडिया। इससे हमको क्या मिला..कुछ नहीं। हारने के बाद भी मालामाल हुए खिलाड़ी और हार का शोक मनाने वाले लोगों को क्या मिला..कुछ नहीं।

हम समझ नहीं पाते कि, ऐसा क्या है क्रिकेट में जिसके जीतने पर हम हद से ज्यादा खुशी और हार जाने पर हद से ज्यादा दुख मनाते हैं। देश में और भी खेल हैं। उन खेलों में जीत या हार पर हम उत्साहित या हतोत्साहित नहीं होते हैं।

अब बात कर लेते हैं। इंडिया बनाम भारत की जंग पर। हाल के दिनों में इन शब्दों पर खूब बहस हुई है।लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि, हाल के दिनों में इस बहस को जिन लोगों ने जन्म दिया। विश्वकप के फाइनल मैच में उन्हीं लोगों के सामने इंडिया इंडिया का नारा लगा रहे थे स्टेडियम में मौजूद दर्शक। तो क्या उन दर्शकों को स्टेडियम से बाहर निकाल देना चाहिए था? शायद इतनी हिम्मत मैच देख रहे उन शक्तिशाली लोगों में नहीं था। जितना हम भारत से प्रेम करते हैं, उतना ही हम इंडिया से भी प्रेम करते हैं। और यह बात उन लोगों को समझना चाहिए, जो लोग विश्वकप का फाइनल मैच देखने गए थे।

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