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समग्र रणनीतिक-आर्थिक बदलाव का संकेत यूएई दौरा

यह सत्य है कि समय का अपना महत्व है और उस दृष्टि से राजनीतिक वातावरण हमेशा अनुकूल नहीं रहता। 1981 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पश्चिम एशिया खासकर खाड़ी देशों से अच्छे संबंध बनाने के उद्देश्य से यात्रा कीं थीं। तब सऊदी अरब में सरकारी महिला प्रमुखों ने न तो उनका स्वागत किया और न ही कोई खास तवज्जो दी गई। हालांकि, श्रीमती गांधी ने तब भी पश्चिम एशियाई देशों के साथ संबंध बढ़ाने को लेकर प्रयास किए थे। यात्रा के दौरान आर्थिक और तकनीकी मसलों पर एक संयुक्त आयोग बनाने को लेकर समझौता किया गया। लेकिन 1980 का पूरा दशक मात्र एक-दो बैठकों में सिमट कर रह गया।

यह सत्य है कि समय का अपना महत्व है और उस दृष्टि से राजनीतिक वातावरण हमेशा अनुकूल नहीं रहता। 1981 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पश्चिम एशिया खासकर खाड़ी देशों से अच्छे संबंध बनाने के उद्देश्य से यात्रा कीं थीं। तब सऊदी अरब में सरकारी महिला प्रमुखों ने न तो उनका स्वागत किया और न ही कोई खास तवज्जो दी गई। हालांकि, श्रीमती गांधी ने तब भी पश्चिम एशियाई देशों के साथ संबंध बढ़ाने को लेकर प्रयास किए थे। यात्रा के दौरान आर्थिक और तकनीकी मसलों पर एक संयुक्त आयोग बनाने को लेकर समझौता किया गया। लेकिन 1980 का पूरा दशक मात्र एक-दो बैठकों में सिमट कर रह गया।

इस दौर में संयुक्त आयोग की नीतियां न तो परवान चढ़ सकी और न ही कूटनीतिक-राजनीतिक दृष्टि से दोनों देशों के बीच तेजी से काम आगे बढ़ा। उस दौर में सऊदी अरबिया पश्चिम एशिया के नीतिगत-निर्णायक देश के रूप में अहम था। उसके पास तेल का सबसे अधिक जखीरा था और वह जब चाहे, जितना चाहे तेल का उत्पादन बढ़ा-घटा सकता था। साथ ही, भारत के हित भी उससे बहुतायत रूप से जुड़े हुए थे। भारत में कुल तेल का एक तिहाई आपूर्ति यहीं से था। वहां पर खनिज-तेल और अन्य सेवा क्षेत्र में करीब 6 लाख भारतीय काम कर रहे थे। उनके द्वारा भेजी गई विदेशी मुद्रा से भारत के विदेशी मुद्रा भंडार की कमी भी दूर हो रही थी। साथ ही, इस्लामिक सम्मेलन संगठन (ओ.आई.सी.) का मुख्यालय भी जेद्दा में था और उसके संचालन का खर्च और नीतिगत मामलों में सऊदी अरबिया का जोर था। हालांकि, 2006 में सउदी अरब के शासक अब्दुल्ला ने पहले चीन और बाद में भारत की यात्रा की। यात्रा के दौरान संयुक्त बयान में संयुक्त अरब ने भारत को विश्वास दिलाया कि उनका देश भारत के लिए तेल आपूर्ति का स्त्रोत बना रहेगा। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सउदी अरब के व्यापारिक प्रतिष्ठानों को भारत में ऊर्जा, टेलाकॉम, हवाई अड्डे, रेलवे आदि क्षेत्रों में पूंजी निवेश के लिए आमंत्रित किया था।

कमोवेश, यही हाल संयुक्त अरब अमीरात के साथ रहा। भारत के संबंध में यूएई का एक महत्वपूर्ण कदम यह भी रहा है कि वह कश्मीर पर पाकिस्तान परस्त अपनी नीति को थोड़ा लचीला और शिथिल बनाया। वह प्रयास करता रहा कि उस मामले में उसकी नीति उस तरह न दिखाई दे, जिन्हें भारत विरोध के रूप में देखा जाए। यद्यपि 1990 के दशक में खाड़ी संघर्ष को लेकर भारत और यूएई का दृष्टिकोण एक जैसा नहीं था, फिर भी यूएई ने भारत के संदर्भ में यह स्पष्ट कर दिया था कि उसे अतीत की ओर नहीं, भविष्य की ओर देखना है। इसी भावना को लेकर यूएई के राष्ट्रपति शेख ज़ायदे बिन अल नाहायन ने अप्रैल 1992 के अंत में भारत की यात्रा की। 1993 तक दोनों देशों के बीच एक बिलियन डॉलर तक भारत का निर्यात बढ़ गया। यूएई ने 1993 में ही भारत में प्रत्यक्ष पूंजी निवेश के मामले में पांचवां स्थान हासिल कर लिया। 1995-96 तक भारत का निर्यात बढ़कर 4766 करोड़ रुपए हो गया। हालांकि, पूरे 90 के दशक में भारत और यूएई के बीच संबंधों की घनिष्ठता और उंचाई पर जा सकती थी। निजी क्षेत्रों में आर्थिक संबंध और प्रगाढ़ करने की आवश्यकता थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

21वीं सदी के प्रथम दशक में खाड़ी देशों के राजनीतिक-आर्थिक स्वरुप में बदलाव आया है खासकर, 9/11 की घटना के बाद से। जहां एक ओर मध्य-पूर्व एशियाई देशों में प्रतिस्पर्धी विचारधाराओं के साथ क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता को बढ़ावा मिला है वहीं, आधारभूत-सरंचनात्मक आर्थिक गतिविधियों के कारण तरक्की के नए मिशाल भी कायम हुए हैं। भारत के लिए ध्यान देने वाली बात है कि इस क्षेत्र में चीन की आर्थिक, राजनीतिक और कूटनीतिक दिलचस्पी बहुत तेजी से बढ़ रही है। पिछले दिनों चीन के व्यापार मंत्रालय ने कहा है कि चीन और अरब देशों के बीच का कारोबार बढ़कर 222 अरब डॉलर सालाना तक जा पहुंचा है। 2002 की तुलना में यह करीब 12 गुना ज्यादा है। इसने 2011 में अमेरिका और मध्यपूर्व के बीच हुए सलाना 193 अरब डॉलर के कारोबार को भी पीछे छोड़ दिया है।

सैन्य गतिविधियों के रूप में देखें तो चीन हिंद महासागर में पाइरेसी के खिलाफ टास्क फोर्स के रूप में तीन युद्धपोतों को रखने के अलावा मौका पड़ने पर भूमध्य सागर में भी अपने जहाज भेज रहा है। उसने लेबनान में संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिक भी तैनात किए हैं। अमेरिकी या यूरोपीय मिसाइल सिस्टम को छोड़, 3.4 अरब डॉलर खर्च कर चीन के एफडी-2000 मिसाइल सिस्टम को खरीदने का तुर्की का फैसला आने वाले दिनों का स्पष्ट संकेत है। अमेरिकी सरकार में काम कर चुकीं और अब स्कूल ऑफ एडवांस्ड इंटरनेशनल स्टडीज से जुड़ी क्रिस्टीना लिन का कहना है, “यह चेतावनी की घंटी है। चीन मध्य-पूर्व में और ज्यादा शामिल होने की ताक में है और बड़ी तेजी से उसे वहां स्वीकार किया जाना लगा है।” पाकिस्तान के नौसैनिक बंदरगाह गवाहर को विकसित करना चीन के मध्य-पूर्व रणनीति का ही हिस्सा है। भारत किसी भी प्रकार से इन गतिविधियों पर आंखें बंद नहीं कर सकता।

खाड़ी देशों से भारत का हित चोली-दामन की तरह है। इन क्षेत्रों में 70 मिलियन भारतीय रहते हैं और प्रतिवर्ष 40 विलियन अमेरिकी डॉलर से ज्यादा का योगदान करते हैं। 2013-14 के आकड़ों के अनुसार भारत की आर्थिक-वाणिज्यिक भागीदारी 186 विलियन अमेरिकी डॉलर प्रतिवर्ष का है। 60 फीसद से ज्यादा तेल-गैस यही से प्राप्त होता है। यह क्षेत्र भारत के लिए फॉस्फेट और उर्वरक का प्रमुख स्त्रोत है। संपर्क का आलम यह है कि केवल भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच ही प्रति सप्ताह 700 उड़ानें हैं। अर्थात्, यह क्षेत्र भारत का सबसे बड़ा क्षेत्रीय व्यापार ब्लॉक है। इसकी सतत् रक्षा और परस्पर विकास को लेकर भारत सरकार को रणनीतिक तौर कार्य करना होगा। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूएई के अपने दौरे के दौरान कहा कि 34 साल बाद यात्रा शर्मिंदगी भरा है। और भरोसा दिया कि आगे ऐसा नहीं होगा। उन्होंने जल्द ही वाणिज्य मंत्री को यूएई भेजने की बात भी कही। वर्तमान में किसी भी देश या क्षेत्र के बीच प्रगाढ़ आर्थिक संबंध ही रणनीतिक और सामरिक भरोसे का सूत्र है। किसी भी हाल में हम इसे अनदेखा नहीं कर सकते। वैश्वीकृत व्यवस्था के प्रायोजन काल में भारत और यूएई के बीच राजनीतिक संबंधों में गुणात्मक वृद्धि संभव थी लेकिन भारत के प्रधानमंत्री को वहां जाने में 34 वर्ष लग गए। फिर भी, ‘देर आये-दुरुस्त आए’ की तर्ज पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यूएई दौरा समग्र रूप से आर्थिक-राजनीतिक क्षेत्र में मिल का पत्थर साबित होगा।

लेखक डॉ. मनोज कुमार तिवारी वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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