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सरकार के गड़बड़झाले में दम तोड़ती नौजवानों की आकांक्षाएं

साढ़े तीन साल पहले उत्तर प्रदेश की गद्दी पर जब समाजवादी पार्टी के युवराज आसीन हुए थे, तब जनता के तमाम हिस्सों के अलावा नौजवानों को भी आस बंधी थी कि शायद उनके भी दिन अब बहुरें। समाजवादी पार्टी ने अपने घोषणापत्र में युवाओं के मुद्दों पर जो तत्परता दिखाई थी, उससे यह स्वाभाविक ही था कि नौजवान अखिलेश सरकार से अपनी आकांक्षाओं को पूरा होने की आस बांधते। लेकिन इतना वक्त बीत जाने के बाद उत्तर प्रदेश के मौजूदा हालात कुछ अलग कहानी ही बयां कर रहे हैं।

साढ़े तीन साल पहले उत्तर प्रदेश की गद्दी पर जब समाजवादी पार्टी के युवराज आसीन हुए थे, तब जनता के तमाम हिस्सों के अलावा नौजवानों को भी आस बंधी थी कि शायद उनके भी दिन अब बहुरें। समाजवादी पार्टी ने अपने घोषणापत्र में युवाओं के मुद्दों पर जो तत्परता दिखाई थी, उससे यह स्वाभाविक ही था कि नौजवान अखिलेश सरकार से अपनी आकांक्षाओं को पूरा होने की आस बांधते। लेकिन इतना वक्त बीत जाने के बाद उत्तर प्रदेश के मौजूदा हालात कुछ अलग कहानी ही बयां कर रहे हैं।

आज प्रदेश में कदाचार, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, बेलगाम बढ़ता अपराधों का ग्राफ, दलित-महिला-आदिवासी-अतिपिछड़े तबकों पर गुंडा-माफिया-पुलिस का बढ़ता हमला उत्तर प्रदेश की जीती-जागती मिसाल बन चुका है। महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार की घटनाएं, दलित नौजवानों की पुलिस हिरासत में पीट-पीट कर मार डालने की घटनाओं की खबरों से आए-दिन अखबार भरे रहते हैं। गुंडे, बलात्कारियों के हौंसले कितने बुलंद हैं, इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि बलात्कार के आरोपी मुकदमों में सजा से बचने के लिए पीड़ित महिलाओं की ही दिन-दहाड़े हत्या कर देते हैं और पुलिस-प्रशासन मूकदर्शक बन तमाशा देखता रहता है। कदाचार और भ्रष्टाचार का आलम यह है कि उच्च न्यायालय और देश का शीर्ष न्यायालय आए दिन प्रदेश सरकार को कठघरे में खड़ा करते रहते हैं। इसकी बानगी आप यादव सिंह के सीबीआई जांच से जुड़े प्रकरण में देख सकते हैं, जहां सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त लहजे में टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘‘अगर किसी के भ्रष्टाचार के खिलाफ सीबीआई जांच चल रही है, तो सरकार इतना परेशान क्यों है?’’ सच बात तो यह है कि पूरा प्रदेश ही एक परिवार की जागीर तक सिमट कर रह गया है।
 प्रदेश में रोजगार को लेकर युवाओं में भारी ललक और चाहत का अंदाजा अगस्त महीने में सचिवालय में 368 चपरासी के पदों की सीधी भर्ती के लिए आए आवेदनों की तादाद से लगाया जा सकता है। इस पद की न्यूनतम योग्यता कक्षा पांच उत्तीर्ण होना रखी गयी थी। देखते-देखते महज कुछ सौ पदों के लिए हैरतअंगेज तरीके से 23 लाख की तादाद में आवेदन आ गए। सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि आवेदन करने वालों में स्नातक, परास्नातक, बीटेक, एमटेक, पीएचडी जैसी ऊंची डिग्री रखनों वालों तक की तादाद भी लाखों में है। जानकारों का कहना है कि भर्ती की इस प्रक्रिया को पूरी होने में कम से कम 10-12 साल लग जाएंगे। अब नियुक्ति करने वाली एजेंसी के कर्ता-धर्ताओं को चयन प्रक्रिया कैसे पूरी होगी, इसका जवाब देते नहीं बन रहा है। बहरहाल, इतना तो तय है कि नौकरी तो मात्र 368 लोगों को ही मिलेगी, लेकिन आवेदन शुल्क के नाम पर सरकार ने करोड़ों रुपये नौजवानों से जरूर उगाह लिया।
 प्रशासनिक लापरवाही के ऐसे नमूने आपको तकरीबन हर विभाग में देखने को मिल जाएंगे। किसी भी नियुक्ति की प्रक्रिया में विज्ञापन जारी करने से लेकर चयन तक प्रशासनिक स्तर पर इतनी गड़बडि़यां व खामियां छोड़ दी जाती हैं कि नियुक्तियां खुद-ब-खुद, चाहे वह अदालती वजहों से या किन्हीं और वजहों से अधर में लटककर रह जाती हैं और साल-दर-साल यह प्रक्रिया घिसट-घिसटकर चलती रहती है। उच्च प्राथमिक विद्यालयों में विज्ञान एवं गणित शिक्षकों की नियुक्तियां पिछले तीन सालों से इसी तरह से लटकी हुई हैं। इसका खामियाजा बेरोजगारों युवाओं को तो उठाना पड़ता ही है, आम जनता भी इससे अछूती नहीं रहती है। आप खुद ही समझ सकते हैं कि तीन सालों के दौरान इन शिक्षकों की कमी से कितने बच्चों की स्कूली पढ़ाई का नुकसान हुआ होगा? इस तरह तमाम विभागों में ऐसी लटकी हुई नियुक्तियों की वजह से आखिर जनता के कितने काम प्रभावित होते होंगे, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
कमोवेश, यही हाल पूरे प्रदेश का है। प्रदेश में अभी तक चयन के जो मानक तय थे उसमें लिखित परीक्षा व साक्षात्कार का जो अनुपात था, उसमें लिखित परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करने की स्थिति में परीक्षार्थी के चयन के आसार काफी बढ़ जाते थे। लेकिन अखिलेश राज में लिखित परीक्षा का अनुपात कम कर दिया गया। इसका सीधा-सीधा नतीजा यह होगा कि सरकार के चहेतों की इन पदों पर नियुक्तियां कराना आसान हो जाएगा और भारी तादाद में पैसों के खेल को बढ़ावा मिलेगा। इस सारी कवायद का मकसद बड़े स्तर पर कदाचार और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देना है। प्रदेश में सबसे चर्चित नियुक्तियां शिक्षा विभाग से सम्बंधित हैं। यहां नियम-कानूनों को किस तरह दरकिनार कर मनमानी की जाती है यह माध्यमिक स्तर पर शिक्षकों एवं प्रधानाचार्यों की नियुक्तियों के संदर्भ में भलीभांति रूप से देखा जा सकता है। प्रधानाचार्य पद की नियुक्ति के लिए जो चयन पैनल बनाया गया उसमें माध्यमिक स्तर पर पढ़ाने वाले एक शिक्षक महोदय शामिल थे। मामला जब न्यायालय में गया तो न्यायालय ने टिप्पणी की कि ‘‘यहां प्रधानाचार्य का चयन शिक्षक कर रहे हैं।’’ इस परिप्रेक्ष्य में जिन्होंने सबसे ज्यादा नाम कमाया है, वह राज्य लोक सेवा आयोग के पद पर आसीन इसके चेयरमैन साहब हैं। इनकी तारीफ यह है कि इन पर गुंडा एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज है और आयोग में इनके द्वारा की गयीं तमाम नियुक्तियां संदेह के घेरे में हैं।
नियमों को ताक पर रखकर सरकार कैसे काम करती है, यह प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों के 72 हजार पदों को भरने में साफ-साफ देखा जा सकता है। मायावती सरकार के दौरान 2011 के अंत में प्राथमिक शिक्षकों की भर्ती के लिए 72 हजार पदों का विज्ञापन जारी हुआ था। लेकिन कानूनी अड़चनों तथा कुछ ही महीनों के बाद विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाने के कारण भर्ती को उस समय रोक देना पड़ा। यहां यह उल्लेखनीय है कि इस भर्ती के चयन का आधार टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) में प्राप्त अंकों की मेरिट थी। उत्तर प्रदेश में राज्यस्तर पर नवंबर, 2011 में पहली बार टीईटी की परीक्षा करवाई गयी और 15 दिनों के अंदर ही उसका परिणाम भी घोषित कर दिया गया। यह परीक्षा गड़बडि़यों से बच नहीं सकी और भारी पैमाने पर परीक्षा में धांधली हुयी, इसके साथ ही इसके परिणाम को भी कई-कई बार संशोधित किया गया। धांधली के स्तर का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि परीक्षा कराने वाली संस्था के निदेशक संजय मोहन के घर से ढेरों परीक्षार्थियों के रोल नंबर व आंसर शीट बरामद हुई। परिणामस्वरूप संजय मोहन को धांधली के आरोपों में जेल जाना पड़ा, और अभी भी वह जेल में ही हैं। विधानसभा चुनावों के बाद मायावती सरकार की जगह समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। इंसाफ का तकाजा यह था कि टीईटी परीक्षा के मद्देनजर पूरी परीक्षा की उच्चस्तरीय जांच कराकर उसे निर्णायक मुकाम तक पहुंचाया जाता और जरूरत पड़ने पर पूरी परीक्षा को रद्द कर दोबारा धांधलीमुक्त परीक्षा करवायी जाती। लेकिन अखिलेश सरकार ने इसके बजाए शिक्षक भर्ती के मापदंड को ही बदल दिया और टीईटी में प्राप्त अंकों की जगह एकैडमिक रिकार्ड को भर्ती का मापदंड बना दिया। इसके लिए हर अभ्यर्थी से एक जिले में आवेदन करने के लिए 500 रु. शुल्क लिया गया। नौकरी की आस में एक-एक आवेदनकर्ता ने पांच-छह दर्जन से अधिक जिलों में आवेदन करते हुए 35 से 40 हजार रु. तक इसमें लगा दिए। एकैडमिक आधार पर चयन करने का टीईटी मेरिटधारियों की तरफ से विरोध किया गया, मगर अखिलेश सरकार अपनी जिद पर अड़ी रही। जिसके खिलाफ टीईटी मेरिटधारियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक में अखिलेश सरकार की एक नहीं चली और उसे मुंह की खानी पड़ी तथा पुराने मापदंड यानी टीईटी की मेरिट के आधार पर ही सरकार को भर्ती करने के लिए मजबूर होना पड़ा। 72 हजार शिक्षकों की भर्ती की प्रक्रिया अभी तक चल रही है, उसमें भी धांधली की जानकारियां जब तब मिलती रहती हैं। लेकिन एकैडमिक रिकार्ड के नाम पर होने वाली भर्ती के लिए जिन आवेदनकर्ताओं ने 35 से लेकर 40 हजार रुपया खर्च किया था, उनको नौकरी तो नहीं ही मिली, लेकिन उनके खून-पसीने की कमाई का हजारों रुपया भी अखिलेश सरकार अभी तक दबा कर बैठी हुई है।
शिक्षामित्रों के समायोजन की प्रक्रिया तो और भी जटिलताओं से भरी हुई है। शिक्षामित्र जो दसियों साल से संविदा के आधार पर प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षण कार्य कर रहे थे, की लंबे समय से यह मांग थी कि उन्हें स्थायी किया जाए। इसके लिए उन्होंने निरंतर आंदोलन चलाया और अंततः सरकार इस बात के लिए राजी हुई कि उनकी नियुक्ति को स्थायी किया जाए। 2011 के चुनावी साल में मायावती की सरकार ने नियमानुसार उन्हें प्रशिक्षित करने की प्रक्रिया की शुरुआत की। प्रशिक्षण और नियुक्ति का कार्यक्रम दो चरणों में संपन्न्न किया जाना था। लेकिन तब से आज तक जो प्रक्रिया अपनायी गयी, वह इतनी खामियों से भरी थी कि जैसा पहले से ही अंदेशा था, उच्च न्यायालय ने इसे अवैध ठहरा दिया। आज शिक्षामित्र अपने भविष्य को लेकर सहमे हुए हैं। सरकार की कमियों का खामियाजा आज शिक्षामित्रों को उठाना पड़ रहा है। उनके द्वारा खुदकशी के रास्ते से लेकर गहरी हताशा में जाने की घटनाएं रोज सुनायी पड़ रही हैं। यहां यही कहावत सच साबित हो रही है कि ‘करे कोई और भरे कोई’।
अब आइए, उन बहुप्रचारित योजनाओं की खबर लेते हैं, जिनका बड़ा ढिंढोरा पीटा गया, यानी बेरोजगारी भत्ता व लैपटाप वितरण योजना। शुरू-शुरू में जो बेकारी भत्ता देने की घोषणा की गयी तो उसमें इतनी शर्तें मढ़ दी गयीं कि बहुत कम तादाद में ही बेरोजगार उसके पात्र रह गए। अब तो उसे बाकायदा बंद ही कर दिया गया है। यही हाल लैपटाप वितरण योजना का है। इस योजना में पहले ऐलान हुआ था कि इंटर पास सभी नौजवानों को लैपटाप दिया जाएगा। लेकिन अब उसे भी घटाकर सिर्फ उन्हीं छात्रों तक सीमित कर दिया गया है, जिनके इंटर की परीक्षा में काफी अच्छे नंबर होंगे। इस तरह छात्रों की एक बड़ी तादाद लैपटाप पाने से वंचित रह जाएगी।
आज उत्तर प्रदेश में रोजगार का सवाल एक महत्वपूर्ण सवाल बन चुका है। करोड़ों नौजवान सम्मानजनक जीवन और रोजगार के लिए बेचैन हैं। रोजगार प्रदान करने वाले लघु एवं कुटीर उद्योग घाटे की मार से एक-एक करके बंद होते जा रहे हैं। स्थायी तौर पर घाटे का सौदा बन चुकी खेती में भी रोजगार अब न के बराबर रह गया है। बेकारी के इस आलम में अपराध की घटनाएं उल्लेखनीय तौर पर बढ़ती जा रही हैं। ऐसे में नौजवानों के समक्ष बड़ा संकट पैदा हो गया है कि जिंदगी की गाड़ी कैसे चले। युवा मुख्यमंत्री के राज में आज प्रदेश का नौजवान दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर है। कहां तो उसने सोचा था कि युवा मुख्यमंत्री के राज में उसके सपने सच होंगे। मगर यहां इसके ठीक उलटा हो रहा है। रोजगार तो मिल नहीं रहा है, उसकी जगह दर-दर भटकने के साथ उसकी खून पसीने की कमाई भी हड़प ली जा रही है। सरकारों के गड़बड़झाले में उसकी आकांक्षाएं आज दम तोड़ती नजर आ रही हैं।
 बैचैनी और निराशा के इस भंवर में जिसमें नौजवान बुरी तरह से फंस चुका है, उसमें वह करे तो क्या करे? प्रदेश सरकार की तरह ही केंद्र की मोदी सरकार के रोजगार देने के वादे भी आखिरकार छलावा ही साबित हुए हैं। ऐसे में उसके पास एकमात्र विकल्प यही बचता है कि इन जनविरोधी, रोजगार विरोधी व युवा विरोधी सरकारों से लड़ने का रास्ता अख्तियार किया जाए। इस लड़ाई को व्यापक स्तर एकजुट होकर ही लड़ा और जीता जा सकता है। एकजुट संघर्ष के दम पर ही इन जनविरोधी, रोजगारविरोधी व युवाविरोधी सरकारों को शिकस्त दी जा सकती है। ऑल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) की ओर से ‘उत्तर प्रदेश बचाओ अभियान’ के तहत उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आगामी 28 अक्टूबर को आयोजित ‘रोजगार सम्मेलन’ इसी दिशा में ली गयी एक उल्लेखनीय पहल है।

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