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अमेरिकी मीडिया ने मोदी सरकार को दिखाया आइना, ‘मेक इन इंडिया’ और ‘रोजगार वृद्धि’ को लेकर कोई प्रगति नहीं

मोदी सरकार वाली राजग सरकार का आज एक साल पूरा हो गया और अमेरिकी मीडिया ने मोदी सरकार की आलोचनात्मक रुख जाहिर करते हुए कहा है कि उनका ‘मेक इन इंडिया’ अभियान अब तक सुर्खियों में ही रहा है और भारी अपेक्षाओं के बीच रोजगार में धीमी गति बनी हुई है। मोदी के भारतीय प्रधानमंत्री के तौर पर एक साल पूरा होने पर वॉल स्ट्रीट जर्नल में एक लेख प्रकाशित हुआ है जिसका शीर्षक ‘इंडियाज मोदी ऐट वन इयर: ‘यूफोरिया फेज’ इज ओवर, चैलेंजेस लूम’ है।

मोदी सरकार वाली राजग सरकार का आज एक साल पूरा हो गया और अमेरिकी मीडिया ने मोदी सरकार की आलोचनात्मक रुख जाहिर करते हुए कहा है कि उनका ‘मेक इन इंडिया’ अभियान अब तक सुर्खियों में ही रहा है और भारी अपेक्षाओं के बीच रोजगार में धीमी गति बनी हुई है। मोदी के भारतीय प्रधानमंत्री के तौर पर एक साल पूरा होने पर वॉल स्ट्रीट जर्नल में एक लेख प्रकाशित हुआ है जिसका शीर्षक ‘इंडियाज मोदी ऐट वन इयर: ‘यूफोरिया फेज’ इज ओवर, चैलेंजेस लूम’ है।

वॉल स्ट्रीट जर्नल की खबर में कहा गया है, ‘मोदी सरकार को भारतीय जनता ने अर्थ व्यवस्था में जान डालने और देश में बदलाव लाने के लिए पूर्ण बहुमत दिया था, हालत में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। इसमें कहा गया है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की तेज ग्रोथ के मकसद से मोदी सरकार ने जिस ‘मेक इन इंडिया’अभियान को शुरू किया वह अब तक ज्यादातर चर्चाओं में ही रहा है। लेख में कहा गया है कि निर्यात जैसे आर्थिक मानक बताते हैं कि अर्थव्यवस्था अभी भी लड़खड़ा रही है।वॉल स्ट्रीट जर्नल ने लिखा है कि पिछले साल पूंजीगत निवेश के लिए मुद्रास्फीति समायोजित उधारी 2004 के बाद के सबसे निचले स्तर पर आ गई और निर्यात अप्रैल में लगातार पांचवे माह गिरा है। वहीं कंपनियों की आय मामूली रही है और विदेशी संस्थागत निवेशकों ने मई में अभी तक भारतीय शेयर व बांड बाजारों से करीब 2 अरब डालर की निकासी की है।

न्यू यॉर्क टाइम्स ने एक समाचार विश्लेषण में कहा कि विदेश से देखें तो भारत उभरता हुआ सितारा नजर आ रहा है और इस साल इसके चीन से भी आगे निकलकर विश्व की सबसे तेजी से बढ़त अर्थव्यवस्था बनने की संभावना है। लेकिन, भारत में रोजगार की वृद्धि सुस्त बनी हुई है, कारोबारी इंतजार करो और देखो का रुख अपना रहे हैं।अखबार ने लिखा है, ‘मोदी को राजनीतिक जोखिम का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि विपक्षी दलों के नेताओं ने उनके दो प्रमुख सुधारों को रोक दिया हैऔर उन पर ‘गरीब विरोधी व किसान विरोधी’ होने का आरोप लगा रहे हैं।

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