अब क्यों बात नहीं होती पीत पत्रकारिता की?

मनोज कुमारलगभग एक दशक पहले पत्रकारिता का भेद हुआ करता था। एक पत्रकारिता होती थी सकरात्मक एवं दूसरा नकरात्मक, जिसे हम हिन्दी में पीत पत्रकारिता और अंग्रेजी में यलो जर्नलिज्म कहा करते थे। बीते एक दशक में पत्रकारिता का यह फर्क लगभग समाप्त हो चला है। अब पीत पत्रकारिता की बात नहीं होती है। हैरत नहीं होना चाहिए कि इस एक दशक में आयी पत्रकारिता की पीढ़ी को इस पीत पत्रकारिता के बारे में कुछ पता ही नहीं हो, क्योंकि जिस ढर्रे पर पत्रकारिता चल रही है और जिस स्तर पर पत्रकारिता की आलोचना हो रही है, उससे ऐसा लगने लगा है कि समूची पत्रकारिता ही पीत हो चली है। हालांकि यह पूरी तरह सच नहीं है और हो भी नहीं सकता और होना भी नहीं चाहिए। पत्रकारिता की इस फिलासफी के बावजूद यह बात मेरे समझ से परे है कि ऐसा क्या हुआ कि पत्रकारिता से पीत शब्द गायब हो गया। कहीं ऐसा तो नहीं कि समूची पत्रकारिता का शुद्विकरण हो गया हो और पूरी पत्रकारिता सकरात्मक भूमिका में उपस्थित दिखायी दे रही हो, किन्तु यह भी नहीं है क्योंकि यदि ऐसा होता तो पत्रकारिता की आलोचना जिस गति से हो रही है, वह नहीं होती। इसका मतलब साफ है कि पत्रकारिता के मंच पर स्याह का रंग और गहराया है।

पत्रकारिता की इस समस्या को हल्के से नहीं लिया जाना चाहिए। स्कूल के दिनों में मास्टरजी सिखाया करते थे कि सफेद रंग का महत्व तब तक है जब तक कि काला रंग मौजूद हो, जब काला रंग गायब हो जाएगा तो सफेद महत्वहीन हो जाएगा और यही बात काले रंग के साथ भी है। उसका अस्तित्व भी सफेद रंग पर टिका है। इस आधार पर पत्रकारिता के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि सकरात्मक पत्रकारिता को जानने और पहचानने के लिये पीत पत्रकारिता का भेद करना जरूरी है, किन्तु जब समूची पत्रकारिता सकरात्मक हो जाएगी तो भेद कैसे होगा। दुर्भाग्य से इन दिनों समूची पत्रकारिता भले ही सकरात्मक न हो पायी हो किन्तु पीत जरूर हुयी है। इस स्थिति से पत्रकारिता को बचाना जरूरी होगा।

पत्रकारिता का विस्तार हुआ है और इसी के साथ विश्वसनीयता का संकट पैदा हुआ है, तो सिर्फ इसलिये कि अब हम पीत पत्रकारिता की बात नहीं करते हैं। उसे नया नाम दे रहे हैं जैसे पेड न्यूज। पेड न्यूज भी तो पीत पत्रकारिता का हिस्सा है। मेरी पत्रकारिता के आरंभिक दिनों में बताया गया था कि पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर लिखी गयी खबर अथवा दी गयी सूचना पीत पत्रकारिता कहलाती है। समाज हित में, देशहित में इससे बचना चाहिए। इसका अर्थ यह हुआ कि लगभग तीस साल पहले की पीत पत्रकारिता उतनी भी स्याह नहीं थी जितना कि आज हम महसूस कर रहे हैं। पत्रकारिता में सकरात्मकता का स्थान समाप्त हो रहा है तो इसका कारण यह नहीं है कि अच्छे लोगों ने काम करना बंद कर दिया है, बल्कि सकरात्मक पत्रकारिता के समाप्त होने का भय इसलिये ज्यादा हो रहा है कि नयी पीढ़ी को पत्रकारिता की मुफलिसी, उसकी जवाबदारी नहीं बतायी जा रही है, बल्कि उसे बताया जा रहा है कि जल्द से जल्द धनवान कैसे बनें?

यह सच है कि युवा मन, वह भले ही पत्रकार हो, अच्छी जिंदगी जीने की चाहत होती है और जब यह ज्ञान मिले तो इससे ज्यादा सुखकर क्या होगा? अपने काम की कीमत हर प्रोफेशनल्स को मालूम होना चाहिए, लेकिन इसके पहले अपने प्रोफेशन की जवाबदारी का अहसास होना ज्यादा जरूरी है और हो यही रहा है कि उत्तरदायित्व तो हमें मालूम नहीं, लेकिन अधिकार के बारे में हम सजग हो गये हैं। यह एक सच है जिसने पत्रकारिता को पीत पत्रकारिता में समाहित कर दिया है। यह सब सकारण नहीं हो रहा है और न ही सुनियोजित ढंग से बल्कि यह अनजाने में और अनियोजित ढंग से। इसके लिये डिग्री कॉलेजों की तरह रोज खुल रहे वो पत्रकारिता शिक्षण संस्था भी जवाबदार हैं।

लेखक मनोज कुमार स्वतंत्र पत्रकार एवं मीडिया अध्येता हैं. वर्ष 1981 से पत्रकारिता में हैं. फिलवक्त मीडिया की मासिक पत्रिका ‘समागम’ के प्रकाशक एवं संपादक हैं.

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