अब खाने की खबरों की होती है खोज!

अयोध्‍या प्रसाद आजकल पत्रकार खबर खोजने, खबर तैयार करने में कम, खाने की खोज-खबर इत्यादि में अधिक व्यस्त रहते हैं। जब भी किसी विषय के दो-चार लोग मिल बैठते हैं तो उस पर, उससे जुड़े लोगों के बारे में बातें होने लगती हैं। जब कुछ गंभीर से पत्रकार मिल बैठते हैं तो पुरानी और नयी पत्रकारिता, पुराने और नए पत्रकारों पर बात होने लगती है। पत्रकारिता का स्तर गिर रहा है, इस पर अक्सर यहां-वहां चर्चा होती रहती है। एक दिन यूं ही पत्रकारों और नेताओं पर बात हो रही थी। एक पत्रकार ने सवाल किया, आपने आजकल नेताओं की कान्फ्रेंसों पर ध्यान दिया, वहां क्या होता है? एक दो लोगों ने उनकी ओर सवालिया निगाहों से देखा। उन्होंने बताया, आजकल जब प्रेस कान्फ्रेंस होती है तभी पत्रकारों को खाने-पीने की मेज पर बुला लिया जाता है। नेता ने जो कहना होता है वह बोलकर या पहले से तैयार विज्ञप्ति के द्वारा पत्रकारों को अपनी बात बता देता है। उससे चुभते हुए सवाल न किए जाएं इसलिए खाने-पीने का इंतजाम पहले से करके रखा जाता है।

आमतौर पर किसी कार्यक्रम को कवर करने की बात आती है तो पत्रकार आपस में एक दूसरे से पूछते हैं कि वहां खाने-पीने का क्या प्रोग्राम है? कोई गिफ्ट-शिफ्ट मिलेगा की नहीं! किसी ने कई बार बुला लिया और कुछ ठीक-ठाक खिलाया-पिलाया नहीं और कोई गिफ्ट या ‘पेट्रोल खर्च’ नहीं दिया तो पत्रकार कहने लगते हैं, साला कुछ न खिलाता-पिलाता है, न कुछ देता है। अनेक बार पत्रकार आयोजकों से कहते हैं कि आने वाले पत्रकारों के लिए खाने-पीने का इंतजाम ठीक से करना और कोई गिफ्ट भी देना तो खबर अच्छी लग जाएगी। उद्योगपति-पूंजीपति जब कोई कार्यक्रम रखते हैं तो पत्रकारों की लिस्ट मांगते हैं। कोई एक पत्रकार जिससे बात हो गयी, वह सारे पत्रकारों का ठेका ले लेता है। और अपनी पसंद के पत्रकारों को ही कार्यक्रम में बुलाता है। कई बार तो ऐसे पत्रकार सारे पत्रकारों के हिस्से के गिफ्ट बांटने का ठेका लेकर सारे गिफ्ट स्वयं उठा लाता है और अपने कुछ खास लोगों में बांट देता है और बाकी बचे खुद रख लेता है। पत्रकारों की यह हालत हम अपने ही इलाके में खूब देख रहे हैं।

अफसरों, नेताओं, मंत्रियों और पूंजीपतियों की चमचागीरी करने की प्रवृत्ति इधर पत्रकारों में खूब बढ़ी है। किसी नेता का बयान या उसकी तारीफ में खबर छापकर उसे दिखाने और उसके आगे-पीछे घूमने में पत्रकारों को बहुत अच्छा लगता है। एक दिन ऐसे ही एक मंत्री के आने पर एक पत्रकार उसके पिछले दौरे की खबर दिखाते हुए उसे अपनी ओर आकर्षित करने का पूरा प्रयास कर रहे थे। उन्होंने अखबार दिखाते हुए कहा, ‘सर, आपकी सबसे अच्छी खबर यह देखिए मैंने ही छापी थी। वह दैनिक अखबार इलाके, राज्य में कम ही चलता है। मंत्री जी ने कहा, ‘मैं अखबार कम ही पढ़ता हूं। एक दूसरे पत्रकार जो इस मामले पर पत्रकार और मंत्री दोनों से झुंझला गये थे, बोले, ‘सर, यह तो सरासर गलत बात है कि अखबार आप कम पढ़ते हैं। इसका मतलब तो यह है कि आपको राज्य के हालातों और जनता की दुख-तकलीफों से कोई मतलब नहीं है। इस पर मंत्री बौखला तो गये लेकिन संयम से मुस्करा कर एक बहाना बनाकर पत्रकार को शांत किया।

जो नेता, मंत्री, नौकरशाह या पूंजीपति पत्रकारों को खिलाता-पिलाता रहता है, उसकी खबरों को पत्रकार खूब तवज्जो देते हैं, लेकिन जो नहीं खिला-पिला पाते जैसे- जन संगठनों के लोग, समाजसेवी, वामपंथी पार्टियों या संगठनों के लोग, मजदूर यूनियनों के लोग या छोटे-मोटे स्वयंसेवी संगठनों के लोग, तो उनकी खबरें पत्रकारों की उपेक्षा का शिकार रहती हैं। अब पत्रकारों को यह चिंता नहीं रहती कि सबसे अलग खबर निकाली जाए, भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया जाए या जनसमस्याओं को उठाया जाए। बल्कि इस बात की फिक्र रहती है कि कैसे किसी नेता, मंत्री, नौकरशाह अथवा पूंजीपति को खुश करके कुछ हासिल किया जाए या विज्ञापन बटोरा जाए। कई बार तो लगता है कि किसी की चमचागीरी करने में पत्रकार आपस में प्रतिद्वंद्विता कर रहे हैं। कमीने से कमीने नेता, मंत्री, नौकरशाह या पूंजीपति को भी बहुत दयालु, जनसेवक, जनता का मसीहा कहने में पत्रकारों को शर्म नहीं आती।

एक तरफ नेता गुंडागर्दी खुलेआम कर रहा है दूसरी ओर अखबार वाले पहले या किसी अन्य महत्वपूर्ण पन्ने पर उसका यशोगान कर रहे हैं। अब तो कुछ पत्रकारों को खबर छापने, न छापने के लिए खुलेआम सौदेबाजी करने, दलाली करने में जरा भी शर्म का अहसास नहीं होता। और एक आम मानसिकता यह समाज के अंदर घर करती जा रही है कि बिना खाए-पिए पत्रकार अच्छी खबर छापते ही नहीं। अच्छी खबर छपवानी हो तो खर्चा जरूर करना पड़ेगा। कई बार तो यह होता है कि दोनों ओर से पत्रकार सौदेबाजी करने लगते हैं। खबर छापने के लिए जो पैसा मिल रहा है खबर रुकवाने वाला उससे अधिक पैसा देने का ऑफर करता है। वेश्यावृत्ति का धंधा करने वालों, कच्ची अवैध शराब का कारोबार करने वालों, कालाबाजारियों, जुआ-सट्टे के धंधेबाजों और अन्य असामाजिक और अवैध काम करने वालों से पत्रकार पुलिस की तरह अपना हिस्सा मांगते/लेते हैं।

आजकल यह समझाने वाले लोग बहुत मिल रहे हैं कि दूसरे पत्रकार पैसा ले रहे हैं तुम भी लो। यह सिद्धांत और आदर्श का जमाना नहीं रहा। यह सब बातें फिजूल की हैं। तर्क है कि देने वाला स्वयं भ्रष्‍ट है। तुम्हें लेने में क्या दिक्कत है? एक सिस्टमैटिक तरीके से पत्रकारों को भ्रष्ट किया जा रहा है कि यह दुनिया किसी की नहीं है। तुम्हारा घर है, परिवार है उसके बारे में सोचो। आदर्शों सिद्धांतों से पेट नहीं भरता और दूसरी जरूरतें पूरी नहीं होतीं। घरवाले भी स्वार्थी होते हैं। अगर तुम कुछ कमा कर ले जाओगे तभी वह तुम्हें पसंद करेंगे। इसलिए वक्त रहते जो कमा सकते हो कमा लो। ऐसे में खबरों की विश्वसनीयता खत्म हो रही है। अब खोज खबर और वस्तुनिष्ठ पत्रकारिता खत्म हो रही है। खबरें स्वयं खोजने/लिखने के बजाए पत्रकार प्रेस विज्ञप्तियों पर निर्भर हो गये हैं। अधिकतर खबरें प्लांट करवाई जाती है। पेड न्यूज पर तो काफी चर्चा हो चुकी है और किसी हल तक अभी नहीं पहुंचा जा सका है, पत्रकारिता को बचाने वालों को पत्रकारों के उपरोक्त पतन को भी अपनी मुहिम में शामिल करना चाहिए।

लेखक अयोध्या प्रसाद ‘भारती’ लेखक एवं स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *