अमूमन मां अपने बच्चे को बहुत कुछ देने के लिए अथक मेहनत करती है। उस दौर में बच्चे को जीवन की सभी सुविधाएं तो मिल जाती है, नहीं मिलता तो सिर्फ मां का प्यार और जीवन की इस आपाधापी में बच्चा जब बड़ा होता है और उस प्यार के बारे में सोचकर, जो उसे नहीं मिल पाया , दुखी हो रहा होता है, तब मां की एक आवाज उसके जीवन में किस तरह एक नई उम्मीद लेकर आती है, यही इस कविता का सारांश है।
भूली बिसरी चितराई सीकुछ यादें बाकी हैं अब भी
जाने कब मां को देखा था
जाने उसे कब महसूस किया
पर, हां आज मां ने फिर याद किया।।।
बचपन में वो मां जैसी लगती थी
मैं कहता था पर वो न समझती थी
वो कहती की तू बच्चा है
जीवन को नहीं समझता है
ये जिंदगी पैसों से चलती है
तेरे लिए ये न रूकती है
मुझे तुझको बड़ा बनाना है
सबसे आगे ले जाना है
पर मैं तो प्यार का भूखा था
पैसे की बात न सुनता था
वो कहता थी मैं लड़ता था
वो जाती थी मैं रोता था
मैं बड़ा हुआ और चेहरा भूल गया
मां की आंखों से दूर गया
सुनने को उसकी आवाज मैं तरस गया
जाने क्यूं उसने मुझको अपने से दूर किया
पर, हां आज मां फिर ने याद किया।।।
मैं बड़ा हुआ पैसे लाया
पर मां को पास न मैंने पाया
सोचा पैसे से जिंदगी चलती है
वो मां के बिना न रूकती है
पर प्यार नहीं मैंने पाया
पैसे से जीवन न चला पाया
मैंने बोला मां को, अब तू साथ मेरे ही चल
पैसे के अपने जीवन को, थोड़ा मेरे लिए बदल
मैंने सोचा, अब बचपन का प्यार मुझे मिल जायेगा
पर मां तो मां जैसी ही थी
वो कैसे बदल ही सकती थी
उसको अब भी मेरी चिंता थी
उसने फिर से वही जवाब दिया
की तू अब भी बच्चा है
जीवन को नहीं समझता है
ये जिंदगी पैसों से चलती है
तेरे लिए ये न रूकती है
सोचा कि मैंने अब तो मां को खो ही दिया
पर, हां आज मां ने फिर याद किया ।।।
अंकुर विजय हिन्दुस्तान टाइम्स, दिल्ली में कार्यरत हैं.

