आतंकियों से ज्‍यादा खतरनाक हैं न्‍यूज चैनल!

: अयोध्‍या मामले में बढ़ा-चढ़ा कर दिखा रहे हैं खबरें : इससे सौहार्द बिगड़ने का खतरा बढ़ रहा है : देश की समरसता व प्रभुता अक्षुण्‍य रखने की शपथ हर नेता मंत्री, नौकरशाह तथा समाज के हर स्तम्भ की चोटी पर बैठे लोगों द्वारा अपने काम को शुरू करने के पहले ली जाती है। लेकिन इस शपथ के मायने अब बदल गये हैं। लोकतंत्र के चारों स्तम्भ में सबसे मजबूत न्यायपालिका और मीडिया को माना जाता है, जो समाज को नई दिशा देने का काम करता है। आज से करीब 15 वर्ष पूर्व मीडिया का जो सम्मान समाज में कायम था, उसे आज जिस तरह से नष्‍ट कर दिया गया है उसका जिम्मेदान कौन है? इस पर अब गंभीर आत्ममंथन करने की जरूरत है।

जिस तरह से इस देश  में बेलगाम इलेक्ट्रानिक्‍स चैनल अपनी-अपनी टीआरपी रेटिंग की होड़ में समाज को नफरत की और ले जा रहे हैं, उस पर अगर तत्काल रोक नहीं लगी तो हमारा समाज व धर्मनिरपेक्ष भारत टूटकर बिखर जायेगा। ऐसा मेरा मानना है। प्रिंट मीडिया ने अभी भी जिस जिम्मेदारी से अपना निर्वहन हर संवेदनशील मामले में किया है, और कर रही है उसकी जितनी भी तारीफ की जाये कम है। एक दो अपवाद को छोड़कर आज भी प्रिंट मीडिया का वजूद समाज में मजबूती से कायम है। लेकिन आज के नये दौर में तेजी से कुकरमुत्ते की तरह पनप रहे इलेक्‍ट्रानिक चैनलों ने समाज में नफरत का बीज बोने का काम करना शुरू कर दिया है, अब समय आ गया है कि उस पर तत्काल रोक लगनी चाहिये।

मैं जिम्मेदारी से इस बात को कहना चाहता हूं कि जिस तरह से समाज व देश  के लिये आतंकवादी खतरा हैं, उसी तरह से आने वाले समय में नम्बर एक बनने की चाहत लिये इलेक्‍ट्रानिक चैनल इस समाज व भारत के लिये खतरा बनते जा रहे हैं। ऐसे लोग आतंकियों से बड़े गुनाहगार माने जा सकते है। आतंकी तो सीमा पार से आ रहे है लेकिन यह आतंकी अपने ही देश में बैठ कर समाज को निगलने का काम लगातार कर रहे हैं। इनके लिये अब आचार संहिता कोई मायने नहीं रखती है। कई उदाहरण यहां पर दिये जा सकते हैं, जिससे समाज को विकृत करने में इनका महत्वपूर्ण योगदान माना जा सकता है। जबसे चैनल समाज के सामने आये हैं तब से समाज में हिंसा व नफरत का बीज काफी तेजी से पनपने लगा है। लड़की के साथ बलात्कार होने के बाद उससे पूछना कि तुम कैसा महसूस कर रही हो- यह एक ऐसा उदाहरण है, इसकी निंदा जितनी की जाये कम है।

बाइट लेने के लिये जिस तरह से बिना पढ़े लिखे रिपोर्टर एक विशेषज्ञ की तरह सवाल पूछते नजर आते हैं और माइक लेकर हर जगह घुस जाते हैं, वह आने वाले समय में कैसा समाज देगें यह सवाल उन्हीं से या उनके मालिकों से पूछा जाना चाहिये। एंकर भी जिस तरह से सवाल-जवाब करके घृणित तस्वीर को अपने चैनल में बार-बार रिपीट करके दिखाते है, उस पर तत्काल रोक लगनी चाहिये। लगातार नफरत का बीज बोया जा रहा है। जिसे रोका जाना चाहिये। हम अब असल मुद्दे पर आ रहे हैं। आज जिस तरह से अयोध्या मुद्दे पर 24 सितम्बर के पहले हाईकोर्ट के आने वाले निर्णय पर चैनल लगातार अपनी रेंटिंग बढ़ाने के चक्कर में अभी से देश को आने वाले निर्णय की काल्पनिक तस्वीरे पेश करके व रोज बढ़ा-चढ़ा कर इन्टरव्‍यू पेश कर रहे हैं, उससे लगातार यूपी सहित देश की स्थिति खराब हो रही है। इस निर्णय पर पूरे अतंरराष्‍ट्रीय समुदाय की नजर लगी है। भारत के मीडिया को पूरी तरह से संयम बरतने की जरूरत है। लेकिन इलेक्‍ट्रानिक्‍स चैनल लगातार दो समुदाय के बीच नफरत बोने का काम कर रहे है।

कोई भी समुदाय अब आपस में नफरत नहीं चाहता लेकिन यह चैनल लगातार अपनी रिपोर्टो को अभी से गलत-तौर तरीके से पेश करके स्थित को पैनिक करने का काम कर रहे हैं। चाहे आईबीएन-7 हो या फिर आजतक या फिर जी न्यूज या फिर सहारा समय चैनल हो, इन चैनलों की लगातार पिछले एक माह की बाइट निकलवाकर देख लिया जाये, इन चैनलों ने लगातार एक समुदाय को आहत करने का काम किया है। एनडीटीवी की कवरेज अब तक पूरी तरह से संयमपूर्ण कही जा सकती है। एनडीटीवी को छोड़कर इन सभी चैनलों की बाइट की मॉनि‍टरिंग की जानी चाहिये, जिससे पता लग जायेगा कि कौन से चैनल ने अब तक अयोध्या जैसे संवेदनशील मामले को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने का काम करना शुरू कर दिया है। मेरे हिसाब से इन चैनलों पर चल रही कवरेज को तत्काल प्रभाव से रोका जाना चाहिये।

24 सितम्बर को दोपहर 3 बजकर 30 मिनट पर अदालत का निर्णय कुछ भी आए, उससे किसी को अब लेना देना नहीं है। लेकिन कुछ राजनैतिक दल उस पर राजनीतिक रोटियां अवश्‍य सेंकना चाहेगें। राजनैतिक दलों के इन मसूंबों को बढ़ा-चढा कर पेश करने से बचना चाहिये। लेकिन नहीं! चैनल वाले लगातार स्थिति को और बिगाड़ने का काम कर रहे हैं, इस पर तत्काल रोक लगनी चाहिये। अयोध्या मुद्दे पर जिस तरह से प्रिंट मीडिया ने अभी तक अपनी रिपोर्टे पेश की है और पूरी तरह से संयम बरता है, उससे यह प्रतीत होता है कि चैनल अपनी भूमिका को सही तरह से निर्वहन नहीं कर रहे है। कुछ चैनल तो स्थिति को काफी पैनिक करने में जुटे हैं। जो किसी आतंकी कार्रवाई से कम उनके लिये नहीं कहा जा सकता। चैनल वाले आत्मघाती दस्ते की तरह अगर लगातार कार्य करेगें तो हम इस तरह की स्थिति से कैसे निपट पायेंगे!

24 सितम्बर को अयोध्या मुद्दे पर सभी को संयम बरतना चाहिये। यही मेरी अपील सभी राजनैतिक दलों व मीडिया के भाई-बन्धुओं से है। हम चैनलों के विरोध में नहीं है, लेकिन चैनलों को अपनी मर्यादा में रहना होगा। अपनी टीआपी रेटिंग के चक्कर में समाज में दो समुदाय के बीच ऐसा महौल नहीं बनाना चाहिये, जिससे दंगा-फसाद जैसी स्थिति पैदा हो। चैनलों को अयोध्या के आने वाले निर्णय की हर कवरेज को सोच-समझ कर लाइव करना होगा। चाहे इन्टरव्‍यू हो या फिर कोई घटना की बाइट ही क्यों न हो।

देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी से मेरी मांग है कि वह अयोध्या जैसे संवेदनशील मामले को गंभीरता से लेते हुये मीडिया के खिलाफ, खासतौर से इलेक्‍ट्रानिक मीडिया वालों के लिए कठोर फरमान जारी करें। उनके किसी फरमान से मीडिया की स्वतंत्रता पर रोक लगाने का आरोप नहीं लगेगा। केन्द्र सरकार को इलेक्‍ट्रानिक्‍स चैनलों पर 22 सितम्बर तक अयोध्या की कोई भी कवरेज को करने से पूरी तरह से रोक लगा देनी चाहिये। सिर्फ अदालत के निर्णय की पत्रकार वार्ता की खबर को दिखाने की छूट (स्वायत्ता) देनी चाहिये, न कि उसके बाद की खबरें। लोगों की प्रतिक्रिया तथा हिंसा की खबरें बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने पर रोक लगानी होगी। तभी हम अयोध्या के मामले में देश की आन और शान तथा सुरक्षा तथा आपसी सौहार्द को बचाये रखने में कामयाब होगें।

लेखक प्रभात कुमार त्रिपाठी लखनऊ में दैनिक समाजवाद का उदय के ब्‍यूरो प्रमुख हैं.

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