आप अन्नाजी के साथ नहीं हैं, जरूर बेईमान होंगे!

इन दिनों जो नया शिगूफा देश में निकला है वह है अन्नागिरी, यानि तमाम नए-नवेले ढंग से लोगों को लगातार अन्ना के जन लोकपाल बिल के लिए उद्धत किया जाए, मानो यह लोकपाल बिल यदि नहीं आया तो देश में अनर्थ हो जाएगा. कोई ऐसा दिन नहीं जब अलग-अलग किस्म के ई-मेल और एसएमएस की बरसात नहीं हो रही हो. किसी एसएमएस में लिखा होगा-‘भारत सरकार ने यह शर्त रखी है कि पचीस करोड़ हिन्दुस्तानी भारत सरकार को एसएमएस भेजें तो वह जन लोकपाल कानून ला देगी, अतः आप भी फलां नंबर पर एसएमएस भेजें.’  किसी दूसरे ईमेल में कोई दूसरा शिगूफा होगा यानी कुल मिला कर तकनीकी का व्यापक प्रयोग करते हुए पूरे देश में एक हवा सी बना दी गयी है कि अन्ना, अन्ना, लोकपाल, लोकपाल.

कुल मिला कर यह कि अन्नाजी लोकपाल लायेंगे, भ्रष्टाचार भगायेंगे. बल्कि और खुल के कहा जाए तो जन लोकपाल का अन्ना द्वारा प्रस्तावित कानून बना नहीं कि देश से भ्रष्टाचार का काफी हद तक सफाया हो जाएगा. मेरी दृष्टि में हमारे देशवासियों के साथ इससे फूहड़, क्रूर और घटिया मजाक किसी ने नहीं किया होगा. यह सही है कि लोगों की भावनात्मक कमजोरियों से खेलने का हमारे देश में रिवाज रहा है और तमाम मौकों पर लोगों ने इन भावनाओं को उभार कर और भड़का कर अपना-अपना लाभ लिया है पर इतना बड़ा सब्ज़-बाग किसी ने भी नहीं दिखाया होगा, खास कर यह जानते-बूझते कि इस खिलवाड़ के क्या दुष्परिणाम होंगे.

अन्य बातों के अलावा एक बात जो बड़ी मजबूती के साथ कही जा रही है वह यह कि भारत आज दो खेमों में बंट चुका है- एक खेमा अन्ना का और एक खेमा अन्ना-विरोधियों का. जो अन्ना के साथ हैं वे तो दूध के धुले, ईमानदारी के परम समर्थक और एक नए भारत के निर्माण में सजग राष्ट्र के सच्चे प्रहरी हैं. और स्वाभाविक रूप से जो इस खेमे में नहीं हैं, जो अन्ना का समर्थन नहीं कर रहे हैं, वे घोर बेईमान, भ्रष्टाचारी और पतित हैं. यानी जोर्ज बुश की तरह अन्ना के टीम के सदस्य भारत को दो खेमों में बाँट कर स्वयं को देवताओं की श्रेणी में पा कर आनंदित हैं. अब इस बात से अंतर नहीं पड़ता कि आज अन्ना के इस आंदोलन से जुड़ा कोई भी व्यक्ति पहले कैसा था, किसका अतीत क्या है, कौन क्या-क्या कारनामे कर चुका है.

ऐसे कार्यक्रमों में इनकी लोकप्रियता के मद्देनज़र कई बार अच्छे-बुरे सारे लोग इनमे शामिल हो जाते हैं. यदि और कोई लाभ नहीं तो इतना हो हो ही जाता है कि ईमानदारी का तमगा स्वतः ही लग गया. यदि कोई अन्ना की शरण में चला आया तो समझो उसका निर्वाण हो गया, उसने गंगा नहा लिया, उसके सारे पापों धुल गए. अब तक हम यह सब बड़ी-बड़ी पोलिटिकल पार्टियों के बड़े-बड़े नेताओं में देखते थे जिनके शरण में आते ही सारे पाप-कर्म स्वतः ही गायब हो जाया करते थे और व्यक्ति का हृदय पवित्र, पुनीत और निर्मल हो जाया करता था. अब यही शक्ति अन्ना जी को भी हासिल हो गयी है. अतः जिसने भी अन्ना हजारे के इंडिया अगेंस्ट करप्शन का समर्थन किया, उनकी शिष्यता ग्रहण की और उनके जन लोकपाल के ड्राफ्ट के पीछे खुद को खड़ा कर दिया वह अपने-आप सही आदमी हो गया.

लेकिन जिसने भी विरोध की भाषा कही, जिसने भी जन लोकपाल बिल का विरोध किया, जिसने भी उसे अनुचित बताया समझो वह मनुष्य रूप में नराधम है, परम पापी है, राक्षस प्रवृत्ति का है. यह भी मान्यता दी जा रही है कि जन लोकपाल बिल का वही विरोध करेगा जो भ्रष्ट होगा, जो सरकारी पैसे का गबन कर चुका होगा, जिसने नौकरी में रहते हुए तमाम गलत काम किये होंगे या कर रहा होगा. अर्थात यह हव्वा कि जन लोकपाल का भय भ्रष्ट लोगों के सिर पर चढ़ कर बोल रहा है और वे हर तरह से इसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं. मजेदार बात यह है कि समाचार पत्र और मीडिया भी इन बातों को पूरी तरह सत्य मान कर ‘मजबूत भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून’  और उसके विरोध की बात कर रहे हैं.

पर यदि हम इसकी सच्चाई में जायेंगे तो हम पायेंगे कि इससे बड़ी भ्रान्ति और असत्य कुछ हो ही नहीं सकता. क्योंकि अगर कोई समर्थवान है, ताकतवर है, शक्तिसंपन्न है तो हर जगह के लिए है. यदि किसी के पास पैसा है तो उसके लिए हर जगह बराबर है. रसूखदार लोग, ताकतवर व्यक्ति और धनाढ्य लोग व्यवस्था को देख कर चिंतित नहीं होते क्योंकि वे जानते हैं कि व्यवस्था है तो उसमे छेद भी होगा, उन्हें मालूम है कि जहां उनकी चाह है वहाँ उनके लिए राह भी होगा. उन्हें अच्छी तरह् ज्ञात होता है कि किसी भी व्यवस्था में अंत में मनुष्य ही होते हैं और किसी भी मनुष्य से कोई भी काम कराने के साम, दाम, दंड, भेद और नीति के कई सारे तरीके हैं जो कभी बेकार नहीं जाते.

इसीलिए इस तरह के अनियंत्रित क़ानून कभी भी मजबूत और बड़े लोगों के सर पर नहीं गिरते, वह सामान्य लोगों को ही परेशान करते हैं. जहां बड़े लोग अपने साधनों-संसाधनों के बल पर अपने लिए निरंतर रास्ते तलाशते रहेंगे, वहीँ वे छोटे लोग इन कथित ‘मजबूत भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों’  से मारे जायेंगे क्योंकि जब दुनिया भर की शक्तियां विधि के मूल सिद्धांतों के विपरीत किसी भी संस्था को दे दी जायेंगी तो स्वतः ही इनका दुरुपयोग करने और इनसे मनमाना आचरण करते हुए न्याय का गला घोंटने की बात सामने आ जायेगी. इस तरह से यह मानव अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन भी होगा क्योंकि आरोपित व्यक्ति अपनी पूरी बात कहे बगैर ही क़ानून की चपेट में आता रहेगा.

ऐसे में यदि इन तथ्यों को प्रकट करते हुए, मानवाधिकार हनन की बातों को सामने लाते हुए, ऐसे अवयस्क और अनियंत्रित कानूनों की हानियों और कमजोरियों को प्रकट करते हुए कोई व्यक्ति यदि कथित जन लोकपाल बिल का विरोध करता है तो वह टीम अन्ना के लिए भले भ्रष्टाचार का पोषक हो जाएगा, जबकि वास्तविकता में वह एक सही बात जनता के सामने ला रहा है. अपने बेहतर संसाधनों और अपनी बेहतर प्रबंधन शक्ति के बल पर टीम अन्ना के खिलाड़ियों ने भले ही आज मीडिया को मन्त्र-मुग्ध कर रखा हो पर सच्चाई यही है कोई भी क़ानून हमेशा ऐसा होना चाहिए जो लोकतांत्रित कसौटी पर खरा उतरे तथा साथ ही शक्ति के विकेन्द्रीकरण के मूलभूत सिद्धांत का अनुसरण करे. यह जन लोकपाल बिल इन दोनों कसौटियों पर पूरी तरह फेल है और इस रूप में मैं इसे अपने देश के लोकतंत्र के लिए एक गंभीर खतरे के रूप में लेता हूँ. मैं समझता हूँ कि जन लोकपाल की अवधारणा एक ऐसी ही अवधारणा है जो अभी तो बहुत ही चित्ताकर्षक और लोक-लुभावन लग रही है पर इसकी नुकसानदेह आंच का असर तब पड़ेगा यदि यह वास्तव में लागू कर दी गयी. ऐसे समय में सभी स्थापित विधिक प्रणालियों के विपरीत एक ही आदमी पुलिस की भूमिका में भी होगा, प्रशासन की भूमिका में भी और आंशिक तौर पर जज की भूमिका में भी. तब यदि उसके मन में खोट हो अथवा वह गलत कार्य करने को उद्धत हो वैसी दशा में उसके कितने खतरनाक दुष्परिणाम निकलेंगे, यह वक्त ही बताएगा

ऐसे में लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करने, सत्ता का विकेन्द्रीकरण करने और अतीव शक्तियुक्त संस्था बनाने की जब भी बात होती है तो मुझे साफ़ दिख जाता है कि कहीं हम नागनाथ की जगह सांपनाथ को अपनाने वाले खेल में तो नहीं फंस रहे हैं. लोकतंत्र आज भी विश्व की श्रेष्ठतम व्यवस्था है और चेक और बैलेंस का सिद्धांत बहुत मुफीद एवं चतुर्दिक अपनाया हुआ. अतः हमें चाहिए कि हम इस व्यवस्था से खिलवाड़ करने वाले किसी भी प्रयास को देश के लिए लंबे समय में अत्यंत हानिपरक मानें.

यहाँ दो बातें स्पष्ट करना चाहता हूँ. एक तो यह कि जो बातें मैं कह रहा हूँ वह अन्ना हजारे अथवा उनकी टीम के किसी भी व्यक्ति के ऊपर किसी प्रकार का व्यक्तिगत लांछन नहीं है बल्कि एक नीतिगत मामले पर मेरा उनके दृष्टिकोण से विपरीत मत है. यदि मेरे जैसा सामान्य व्यक्ति इतनी बड़ी विभूतियों को किसी प्रकार से व्यक्तिगत स्तर पर कमतर आंकने की कोशिश करूँगा तो मैं ही बेवकूफ दिखूंगा, वे नहीं. सामने वाला व्यक्तिगत तौर पर कितना भी महान हो सकता है, यह आवश्यक नहीं कि उसकी कही हुई सभी बातें उतनी ही सही हों. दूसरी बात यह कि इस पूरे सन्दर्भ में मैं, मेरा इतिहास अथवा मेरा व्यक्तित्व एवं कृतित्व महत्वपूर्ण नहीं है. यह हो सकता है कि मैं बहुत ही गया-बीता आदमी होऊं, मेरा बहुत ही खराब इतिहास रहा हो, पर जो बात वास्तव में मायने रखती है वह होगी मेरी कही गयी बातों की सत्यता एवं सारगर्भिता. यदि मेरी बातों में वजन है तो इस ‘अन्ना के विरोध का मतलब भ्रष्टाचार का पोषण’  वाली मानसिकता से निकलते हुए हम जन लोकपाल को उसकी सम्पूर्णता में एक तटस्थ दृष्टि से देखें और तदनुसार उसने गुण-दोष का सम्यक आकलन करें, ना कि उसके बीच में अन्ना या किसी व्यक्ति विशेष को घुसा कर गलत रूप में भावनात्मक ज्वार पैदा कर के.

लेखक अमिताभ ठाकुर आईपीएस अफसर हैं. यूपी के कई जिलों में पुलिस अधीक्षक रहे. दो वर्ष तक अवकाश लेकर एमबीए किया. इन दिनों मेरठ में आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा के प्रमुख के बतौर पदस्थ हैं. कई अखबारों, मैग्जीनों और पोर्टलों में विभिन्न विषयों पर लेखन.

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