आम आदमी को वोट की ताकत का अहसास कराना ही होगा

वर्तमान दूषित राजनीतिक वातावरण के लिए अधिकांश लोग राजनेताओं को ही जिम्मेवार मानते हैं, जबकि ऐसा सोचने वालों के साथ आम आदमी भी कम जिम्मेवार नहीं है और अगर कोई पूरी तरह जिम्मेवार है ही, तो वह वास्तव में प्रबुद्ध वर्ग है। ऐसे में सोचने की बात यह है कि राजनीतिक वातावरण स्वच्छ बनाने के लिए शुरुआत कहां से की जाये? समाज के प्रबुद्ध वर्ग का यह दायित्व है कि वह आम आदमी को लोकतंत्र के प्रति जागरूक करे और उसे राजनीतिक भागीदारी के लाभ बतायें। आम आदमी की समझ में अगर अपने वोट की कीमत आ जायेगी, तो वास्तव में सुधार होगा और वह सुधार ही वास्तविक सुधार होगा। कोई कानून या कानून के तहत बने आयोग अथवा मंत्रालय, योजनायें या कोई भी कार्यक्रम आम आदमी को नागरिकता का महत्व व दायित्व नहीं समझा सकते।

आम आदमी को नागरिकता का ज्ञान या दायित्व बोध साहित्यकार वर्ग ही आसानी से करा सकता है, पर देखने में आ रहा है कि यह वर्ग भी अब राजनैतिक चौखटों पर नतमस्तक होने लगा है, तभी हालात और अधिक खराब हुए हैं, लेकिन आश्चर्य और दु:ख की बात यह है कि अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में या रामदेव के काला धन देश में लाने के पक्ष में पूरा देश खड़ा नजर आता है, तो अच्छा तो लगता है, पर यही जागरूक वर्ग चुनाव के दौरान कहां गुम हो जाता है या यह समझ वोट डालते समय कहां चली जाती है? इन सवालों का जवाब इसलिए नहीं मिल सकते, क्योंकि ऐसे आंदोलनों से जागरूक वर्ग कम कांग्रेस विरोधी मानसिकता के लोग अधिक जुड़े थे, तभी आंदोलन का जमीन पर असर नहीं दिखा और तभी सरकार नहीं झुकी। सूचना क्रांति, फेसबुक या ट्विटर के दौर में प्रचार पा लेना बहुत बड़ी बात नहीं है, लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि प्रचार से दुष्प्रभाव तो आसानी से हो सकता है, पर सकारात्मक परिणाम के लिए जमीन पर या वास्तव में ही काम करना पड़ेगा और वर्तमान में देश हित या समाज हित में जमीन पर काम करने वालों की बेहद कमी दिख रही है, जिसका दुष्परिणाम यह है कि समाज दिशाविहीन है और अंधी दौड़ में बेवजह भाग रहा है।

अब सवाल यह उठता है कि सोच कहां से पैदा होती है? सीधी सी बात है कि अभिवावक, शिक्षा और वातावरण ही मिल कर सोच बनाते हैं, लेकिन यह तीनों ही पूरी तरह दूषित नजर आ रहे हैं। रोटी की जंग में अभिवावकों के पास इतना समय ही नहीं है कि वह अपने बच्चों में कर्तव्य भावना का बीज बोयें, साथ ही कर्तव्य परायणता का जीवन में कोई महत्व है, इसका ज्ञान उन्हें भी नहीं है, तभी वह यह सब बच्चों को भी देने के लिए चिंतित नहीं दिख रहे। शिक्षा से पूरी तरह से व्यवसाय का रूप धारण कर लिया। शिक्षा का आशय आदर्श नागरिक बनाना नहीं, बल्कि डिग्री के बाद नौकरी पाना भर रह गया है, जिससे जो बीज घर-परिवार से नहीं मिला, वह बीज स्कूल्स से भी नहीं मिल पा रही है। इसके बाद वातावरण की बात की जाये, तो बच्चों पर पूरी तरह टीवी का ही असर नजर आता है। आज के बच्चे टीवी और कंप्यूटर गेम के साथ ही बढ़े हो रहे हैं, तभी उनका दायित्व के साथ रिश्तों से भी विश्वास उठता जा रहा है और सिर्फ अपने लिए जीने की भावना पैदा हो रही है, जिसके चलते सब कुछ दूषित होता जा रहा है, क्योंकि इस सोच वाले व्यक्ति ही राजनीति में पहुंच रहे हैं। यही लोग सरकारी विभागों में आ रहे हैं और यही लोग समाज में रह रहे हैं, पर इतना तो साफ है कि इन सबकी अभी आत्मा नहीं मरी है, तभी वह चाहे, जो कर रहे हैं, लेकिन दूसरे के लिए न्याय की आदर्श की ही बात करते नजर आते हैं और इसलिए कभी अन्ना हजारे के पीछे तो कभी रामदेव के साथ पूरा देख खड़ा नजर आता है।

वैसे इसके पीछे और भी कई कारण हो सकते हैं। एक तो यही कि यह राजनेताओं के प्रति घृणा के चलते भी लोग एकजुट हो जाते हैं, क्योंकि अधिकांश लोगों सोच है कि उनकी चोरी छोटी है, इसलिए वह तो ईमानदार की श्रेणी में ही आते हैं, पर यह बड़ी चोरी करते हैं, इसलिए यही बेईमान हैं, साथ ही वह जीवन भर चोरी करते हैं तो भी लाखों के दायरे में ही रहते हैं, पर यह लोग एक झटके में ही करोड़ों के मालिक हो जाते हैं। यह भी कारण हो सकता है कि कांग्रेस के विरोधी हैं और कारण यह भी हो सकता है कि मंहगाई से तो सभी प्रभावित हैं, तो प्लेटफार्म मिलते ही सब शोर मचाने लगते हैं। कारण जो भी हों, पर मूल बात फिर भी साफ नहीं हो रही है कि सोच किस की साफ है, मतलब कर्तव्य भावना या समाज या देशहित की चिंता किसी को है, नहीं है, तभी राजनेता मौज मार रहे हैं और तब तक मारते रहेंगे, जब तक आम आदमी तटस्थ होकर नहीं सोचेगा और आम आदमी तभी सोचने को मजबूर होगा, जब उसे उसकी शक्ति का अहसास होगा, इसलिए प्रबुद्ध वर्ग को आगे आना ही होगा और आम आदमी को वोट की ताकत का अहसास कराना ही होगा।

लेखक वेदभानु आर्य मान्‍यता प्राप्‍त हैं.

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