इन लोगों ने तो शीला दीक्षित की कुर्सी ही छीन ली थी

पिछले दिनों दिल्ली के एक कद्दावर नेता के सालिड चमचे महाराज बड़ी सीरियसली दिल्ली सरकार के अगले मंत्री मंडल की रूप रेखा समझाते मिले। नये मंत्री मंडल में कौन-कौन मंत्री होगा, क्या-क्या समीकरण बैठाये जायेंगे और न जाने क्या-क्या होगा। अचानक मुझे अपने बीच पाकर खिसियानी हंसी-हंसते हुए बोले, आओ भई पण्डित जी, अब तो मान जाओ कि शीला दीक्षित जा रही हैं, अब तो शुंगलू के बाद कैग रिपोर्ट में भी खुलासा हो गया। मंत्री जी ने भी कह दिया कि किसी को भी बख्शा नहीं जायेगा। टी.वी. चैनल आई.बी.एन-7 ने तो काफी विस्तार से खबर प्रसारित कर दी है, आपकी नजर में अगला मुख्यमंत्री कौन होगा।

पहले तो मैं उनके द्वारा अचानक हुए इस रहस्योद्घाटन को समझ ही नहीं पाया मगर जब मैंने उनके विषय वस्तु के मर्म को समझा तो मेरे होठों पर भी मुस्कान आ गई। मैं उनकी शरारती नजरों में डूबते-उभरते उनके सालों-साल के सपनों की परछाइयां ढूंढने लगा। बेचारे कब से सपना सजोयें बैठे हैं कि कब शीला दीक्षित हटे तो उनके आका दिल्ली की गद्दी संभालें। हालांकि मैं पहले भी उनको कई बार समझा चुका हूं कि भाई जी, राजनीति में कोई भी-कुछ भी स्थायी नहीं होता, सभी को एक न एक दिन अपना पद, चाहे वो सरकार में हो या संगठन में, छोड़ना ही पड़ता है, फिर परेशान क्यों होते हो। प्रजातंत्र में जनता का फैसला सर्वोपरि होता है। जनता समझदार है-वो टी.वी. चैनलों के और प्रिन्ट मीडिया के ‘प्रायोजित कार्यक्रमों’ को बखूबी समझती है। जनता के प्यार और विश्वास के सामने शुगंलू या कैग रिपोर्ट को पेश तो होने दो, लोगों ने तो कैग रिपोर्ट पेश होने से पहले ही अपने फैसले सुनाने भी शुरू कर दिये।

मेरी अपनी सोच है कि किसी भी रिपोर्ट के आने के बाद ही उस पर अपने विचार दिये जा सकते हैं। जायज या नाजायज खर्चों पर कोई भी फैसला लेने से पहले, उस वक्त के हालात और जरूरतों पर भी ध्यान देना जरूरी होता है, जिस वक्त खर्चे किये गये होते हैं। एक साधारण परिवार में लड़की की शादी पर जो खर्चा आता है वास्तव में व्यवहारिक तौर पर उससे कई गुणा खर्चा बढ़ जाता है अगर बराती और घराती किसी विशेष आयोजन की रूप रेखा बनाते हैं। कभी-कभी मरीज की जान बचाने को एक इंजेक्शन विदेश में चार्टर्ड प्लेन से भी मंगाना पड़ता है। उस वक्त सवाल इंजेक्शन के मूल्य या चार्टर्ड प्लेन के खर्चे का नहीं वरन-मरीज के स्वास्थ्य और इसकी प्राण रक्षा का होता है।

इसी प्रकार कामनवैल्थ गेम्स, जिन पर देश की आन-बान-शान टिकी थी, उसके आयोजन पर सन्देह किया जा रहा था, उस वक्त की परिस्थितियों पर पूरा विचार करके ही तो कोई फैसला लिया जा सकता है। सकंटग्रस्त परिस्थितियों में घिरे कामनवैल्थ खेलों का सपफल आयोजन यकीनन आजतक ‘कुछ’  लोगों की निगाहों में खटक रहा है। दिल्ली के विकास की पर्याय बन चुकी, आम दिल्लीवासी की चहेती शीला दीक्षित को उनके पद से हटाने की कामना तो ‘चन्द’  स्वार्थी तत्व कर ही सकते हैं मगर यह भी सच है कि –

मुद्दई लाख बुरा चाहे तो क्या होता है।
वही होता है जो मंजूरे खुदा होता है।।

और फिर

फानूस बनके जिसकी हिफाज़त हवा करे।
वो शमा क्या बुझे जिसे रोशन खुदा करे।।

लेखक विजय मोहन दैनिक राष्‍ट्रीय विश्‍वास के प्रधान संपादक हैं.

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