उगांडा में आम चुनाव और डरे हुए भारतीय

अंचल सिन्‍हा : मेरी विदेश डायरी 7 : बचने के लिए दी जा रही स्‍थानीय युवती को अपने घर में रखने की सलाह : इस समय पूरे उगांडा में चुनाव का माहौल है और सारे के सारे उम्मीदवार अपने-अपने चुनाव क्षेत्र में डेरा जमाए हुए हैं। लेकिन सबसे ज्यादा भय के माहौल में इस समय यहां रहने वाले तमाम बाहरी लोग हैं, खासतौर से भारतीय। 26 जनवरी को जब कंपाला में भारतीय दूतावास में भारत के उच्चायुक्त नीरज श्रीवास्तव भारतीय ध्वज फहराने के बाद यहां रहने वाले भारतीयों को संबोधित कर रहे थे तब भी उन्होंने बस इतनी जानकारी दी कि पहली बार उगांडा में कंपाला के पास के छोटे से शहर जिंजा में भारतीय सेना के तीन बड़े अधिकारी आए हैं। उन्होंने साफ साफ तो कुछ नहीं कहा, पर बार-बार यह जरुर बताते रहे कि भारत और उगांडा में बहुत अच्छे संबंध हैं और यहां के महामहिम मुसोविनी भारतीयों को पूरी-पूरी सुरक्षा देने का बार-बार आश्वासन देते रहते हैं। पर इसके एक दिन पहले अमरीकी सरकार ने भी अपने लोगों से अपील की थी कि वे फिलहाल उगांडा में घूमने जाने से परहेज करें।

मुसोविनी पिछले लगभग 20 साल से उगांडा की सत्ता की बागडोर थामें हुए हैं और अच्छी तरह जानते हैं कि इस समय उगांडा की 80 फीसदी अर्थव्यवस्था पर भारतीयों का कब्जा है और वे यहां से चले गए तो यहां सबकुछ चौपट हो जाएगा। इसलिए वे कई बार यहां के एक प्रमुख औद्योगिक समूह माधवानी समूह के किसी भी कार्यक्रम में जाने को तैयार हो जाते हैं और हर प्रकार की मदद का आश्वासन भी दे आते हैं। फिर भी यहां के आने वाले चुनाव में हिंसा की पूरी आशंका है। कार्यक्रम के अनुसार अगले महीने यानी 15 फरवरी से चुनावी प्रक्रिया आरंभ हो जाएगी और 18 फरवरी को वोट डाले जाएंगे। महामहिम के पद के लिए अभी जो तीन प्रमुख उम्मीदवार मैदान में हैं उनमें से एक नेता माओ सबसे कमजोर माने जा रहे हैं। यहां हुए एक सर्वेक्षण को अगर सही मान लें तो अभी भी मुसोविनी के पक्ष में 67 फीसदी लोगों ने भरोसा जताया है। उसके बाद उनके असली विरोधी नेता हैं बीसिग्वे, जिन्हें केवल 12 फीसदी वोट मिलने की उम्मीद जताई गई है। और इसी दूरी के कारण हिंसा की संभावना और ज्यादा बढ़ भी गई है।

26 जनवरी को भारतीय गणतंत्र दिवस मनाते हैं तो उगांडा में एनआरएम दिवस मनाने के लिए सरकार ने सार्वजनिक अवकाश कर दिया था। एनआरएम का मतलब है- नेशनल रेसिस्टेंस मूवमेंट। 1962 के अक्तूबर में इसी दल ने उगांडा में आजादी प्राप्त की थी तब से आजतक, बीच के एक चुनाव को छोड़कर, उगांडा पर एनआरएम का ही शासन रहा है, जिसके अगुवा मुसोविनी हैं। उनकी राजनैतिक सूझबूझ और कूटनीति के सामने दूसरे सारे विरोधी नेता अबतक बौने ही साबित होते रहे हैं। और भले ही मुसोविनी कहते हों कि वे लोकतंत्र के प्रबल समर्थक हैं, पर उन्होंने किसी विरोधी दल को पनपने भी नहीं दिया। इस बार बीसिग्वे पूरा जोर लगा रहे हैं लेकिन अब भी उनकी रैलियों में वह दम दिखता नहीं है। इसका सबसे नकारात्मक पक्ष यह है कि लगभग सारे विरोधी दलों के नेता अभी से अपने लोगों के मन में यह बात डाल रहे हैं कि उगांडा में रहने वाले सभी बाहरी लोग, खासतौर से भारतीय, मुसोविनी के समर्थक हैं। इससे भारतीयों के खिलाफ एक अजीब सा नकारात्मक माहौल भी बनने लगा है। उनके एक समर्थक सांसद, फंगारु हसन कैप्स से मैंने जब पूछा कि उन्हें भारतीयों से क्या परेशानी हुई है, तो उनका सपाट सा जवाब मिला कि भारतीय लोग हमें नौकरों की तरह रखना चाहते हैं और पैसे भी कम देते हैं, उन्हें लूटते हैं। हालांकि उनके पास इसके लिए कोई उदाहरण नहीं था, लेकिन वे अनपढ़ और राजनीतिक रुप में अपरिपक्व आम जनता को भ्रमित करने में तो सफल हो ही जाते हैं।

सरकार द्वारा अनेक सुविधाएं देने के बावजूद इतने सालों में उगांडा के ज्यादातर गंवई लोग पिछड़े और आदिवासियों की ही तरह हैं। शहरों में रहने वाले परिवारों में कुछ फर्क तो आया है पर उन्हें भी आसानी से शातिर लोग बेवकूफ बना सकते हैं।  शहरो में ही नहीं गांवों में भी जो परंपरा है, उसके अनुसार परिवार का कोई बच्चा कालेज में जाते ही घर से अलग रहना चाहता है और परिवार के बड़े-बूढ़े भी इस घर से बाहर जाकर अपने आप कमाने और अपने लिए रास्ता बनाने के लिए कह देते हैं। इससे वे कहीं छोटी-मोटी नौकरी करते हैं या किसी और रास्ते से आमदनी की कोशिश में लग जाते हैं। पर उनके मन में यह बात बैठाई जाती है कि देखो वे तुम्हें लूट रहे हैं। यही स्थिति युवतियों की भी है। उनके लिए सेक्स के लिए हमेशा तैयार रहना और उसी रास्ते से कुछ आमदनी प्राप्त करना सबसे सरल रास्ता बन जाता है। परिवार के लोग भी उन्हें प्रोत्साहित करते हैं। ज्यादातर परिवारों के बुजुर्ग भी यही चाहते हैं कि उनके घर की युवती किसी विदेशी, खासतौर से भारतीय को पटा ले। उन्हें पता है कि भारतीय कोमल दिल वाले होते हैं। इस बार बीसिग्वे के लोग इस बात के लिए भी भारतीयों के बारे में ऐसे प्रचार करा रहे हैं, जिससे आम धारणा यह बनने की आशंका है कि भारतीय उगांडा की युवतियों के शरीर का बस उपयोग करते हैं।

उगांडा में इस समय हजारों की संख्या में भारतीय हैं। 26 जनवरी को कंपाला के एक अखबार रेड पेपर में यह खबर छापी गई कि सरकार की गुप्तचर एजेंसियों को यह सूचना मिली है कि चुनाव के आसपास मुसोविनी के विरोधी दलों के लोग मिलजुल कर व्यापक हिंसा की तैयारी कर रहे हैं। इसके तुरंत बाद सरकार की ओर से पूरे शहर में सेना और पुलिस के जवानों को लगा तो दिया गया है, पर वे दंगे के समय कितना कारगर साबित हो सकेंगे यह कहना अभी किसी के लिए संभव नहीं है। कुछ स्थानीय काले लोगों ने मुझे राय दी कि मैं क्योंकि अकेला रहता हूं इसलिए अपने साथ कोई काली युवती रख लूं और कम से कम 19 फरवरी तक तो उसे घर से बाहर न जाने दूं ताकि जब दंगाई आएं तो वे घर में एक अपनी युवती को देखकर मुझे भी उनके बीच का मान लें। पिछले चुनाव के दौरान कुछ लोगों ने इसी फार्मूले से अपनी जान बचाई थी। पर क्या यह कोई समाधान हो सकता है? मेरे जैसे अनेक लोग इस समय ऐसी ही बातों पर विचार कर रहे हैं और रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे हैं कि कैसे अगले महीने के मध्य में संभावित दंगों से बचा जाय। क्योंकि दंगाइयों की भीड़ उन्मत्त और पागलों जैसी हरकत करती है, जिसे वहां के गुडे और बदमाश लोग हवा देकर और बढ़ाते हैं। वे या तो हिंसा करके छोड़ते हैं या बेहद कठोर पुलिसिया या सैनिक कार्रवाई से। क्या सरकार की ओर से इसकी तैयारी है? देखना है कि हम कैसे आने वाले 20 दिन कंपाला में बिताते हैं! विदेश में नौकरी करने का यह भी एक नया अनुभव होने वाला है।

लेखक अंचल सिन्हा बैंक के अधिकारी रहे, पत्रकार रहे, इन दिनों उगांडा में बैंकिंग से जुड़े कामकाज के सिलसिले में डेरा डाले हुए हैं. अंचल सिन्हा भड़ास4मीडिया पर अपनी विदेश डायरी के जरिए समय-समय पर उपस्थित होते रहेंगे. अंचल सिन्‍हा से सम्‍पर्क उनके फोन नंबर +256759476858 या ई-मेल – anchalsinha2002@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

अपने मोबाइल पर भड़ास की खबरें पाएं. इसके लिए Telegram एप्प इंस्टाल कर यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *