उत्‍तराखंड : पहाड़ और मैदान में बोलियों की लड़ाई

राजेन्‍द्र जोशीउत्तराखण्ड राज्य की मांग को लेकर राज्यवासियों ने केन्द्र और उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ सड़क पर उतर कर खुली जंग लड़ी, लम्बी लड़ाई लड़ी व कई शहादतों के बाद राज्य तो मिला लेकिन राज्यवासियों की लड़ाई अब भी जारी है। कभी रोजगार को लेकर तो कभी पलायन की समस्या को लेकर। जहां एक ओर सड़कों पर अपने हकों के लिए खुली जंग लड़ी गयी, वहीं अब राज्यवासी व प्रवासी उत्तराखण्डी एक बार फिर अपने हकों के लिए सड़कों के बजाय संचार माध्यमों के जरिये लड़ाई लड़ रहे हैं। यह लड़ाई न तो पलायन की समस्या को लेकर है और न ही रोजगार व राजधानी के मसले पर है। यह लड़ाई प्रदेश की तीन प्रमुख बोलियों गढ़वाली, कुंमाउंनी व जौनसारी को लेकर हैं। दरअसल, राज्य सरकार ने अपनी बोलियों के प्रति भलमानुषता दिखाते हुए समूह ग की प्रवेश परीक्षा में शामिल किये जाने को लेकर एक शासनादेश जारी किया, लेकिन हमेशा की तरह यह मैदानी व पहाड़ीवाद की भेंट चढ़ गया।

उल्लेखनीय है कि राज्य कैबिनेट में एक कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक ने इसका विरोध किया और उसी सरकार ने राज्यवासियों की भावनाओं को दरकिनार कर दबंग कैबिनेट मंत्री के दबाव में अपने ही आदेश को वापस ले लिया। जिससे प्रदेश वासियों व अप्रवासियों के बीच इस आदेश की वापसी को लेकर अंसतोष के स्वर उभरने लगे हैं। जिसके संकेत बहुचर्चित सोशल नेटवर्क फेसबुक की दुनिया में देखने को मिलते हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पर्वतीय राज्य उत्तराखण्ड की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए ही राज्य सरकार ने इन बोलियों को समूह ग की परीक्षा में शामिल किया था, क्योंकि समूह ग के अंतर्गत परीक्षा देने वाले परीक्षार्थी को उत्तराखण्ड में ही नौकरी करनी होती है, इसलिए यह आवश्यक है कि उसे स्थानीय बोलियों की जानकारी तो कम से कम होनी ही चाहिए, ताकि वह कम पढ़े-लिखे ग्रामीणों की भाषा को अच्छी तरह से समझ सके, लेकिन सरकार के इस कदम से ग्रामीणों की उम्मीदों पर भी पानी फिरा है। हालांकि मुख्यमंत्री ने अभी इस पर विचार करने का आश्वासन प्रदेशवासियों को दिया है।

सोशल नेटवर्किंग साईट फेसबुक पर पत्रकार राजेन्द्र टोडरिया ने कहा है कि उत्तराखंड मंत्रिमंडल की बैठक में एक मदन कौशिक ने विरोध किया और उत्तराखंड सरकार ने गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी को समूह ग की परीक्षा से बेदखल कर दिया। मंत्रिमंडल की उस बैठक में मुख्यमंत्री समेत 11 गढ़वाली और कुमाऊंनी मंत्री भी थे और वे नपुंसकों की तरह चुपचाप बैठे रहे। उनमें एक दिवाकर भट्ट भी था, जो खुद को उत्तराखंड के पहाडिय़ों का ठेकेदार बताता रहा है। इन मंत्रियों के साथ कैसा सुलूक होना चाहिए, यह आपको और हमें तय करना है। दिल्ली के पत्रकार वेद भदोला ने कहा कि यदि आप भी उत्तराखंड मंत्रिमंडल के इस फैसले से आहत हैं और अपने को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं तो एक पोस्ट कार्ड भेज अपना विरोध दर्ज कराने का कष्ट करें। उनका कहना है कि दरअसल उत्तराखंड के क्षेत्रीय दल जिनमे उक्रांद भी है, आज तक जनता के सामने कोई ठोस राजनैतिक विकल्प प्रस्तुत ही नहीं कर पाया. एकमात्र कारण ये कि उक्रांद के पास भी कांग्रेस-भाजपा की तरह उत्तराखंड के लिए कोई विजन नहीं है।

सुभाष काण्डपाल का कहना है कि एक आन्दोलन उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिए लड़ा गया था। अब तो मुझे लगता है कि एक और आन्दोलन लड़ने का समय आ गया है. विलुप्त होती हुई अपनी भाषा-बोली, संस्कृति रीति रिवाज, लोक साहित्य और लोक कला संगीत के संवर्धन के लिए अपने ही जन प्रतिनिधियों से आवाज बुलंद करने का अब समय आ गया है। उत्तराखंड शुरू से ही पहाड़ी राज्य कहाँ रहा है. यहां का पहला मुख्यमंत्री ही गैर- पहाड़ी रहा. ऐसे में फिलहाल आदर्श पहाड़ी राज्य की परिकल्पना ही बेमानी लगती है। आखिर अपने ही राज्य में दोयम दर्जे का जीवन जीने को मजबूर करने वाले इन तथाकथित जनप्रतिनिधियों को सबक तो मिलना ही चाहिए। वहीं किसी अनजान ने कहा है कि मदन कौशिक उत्तराखण्ड का मुलायम सिह है, जो पहाड़ और मैदानवासियों को आपस में बांटता रहा है और अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकता रहा है। दिवाकर भट्ट भी कुछ खास नहीं कर पाया जितनी कि इनसे उम्मीद थी। 17 खनन के पट्टे इनके पास हैं और उत्तराखडियों को बेवकूफ बना रहा है। सावधान ऐसे नेताओं से इनसे तो भले और नेता हैं। कुल मिलाकर क्षेत्रीय बोलियों का मसला विवादित स्वरूप ले चुका है। लेकिन यह बात दीगर है कि पर्वतीय क्षेत्र के सूदूरवर्ती इलाकों में नौकरी करने वाले को स्थानीय बोली भाषा का ज्ञान होना आवश्यक है अन्यथा भैंस के आगे बीन बजाने वाली कहावत उत्तराखण्ड में सही साबित हो सकती है।

लेखक राजेन्‍द्र जोशी उत्‍तराखंड में पत्रकार और स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं.

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