एक देश और दो सेनाएं, पेचीदा सवाल

: नेपाल की दशा-4 : नागरिक सर्वोच्‍चता के खातिर प्रचंड ने इस्‍तीफा दे दिया :  माओवादियों की मूल ताकत से अप्रैल 2006 में काठमांडू पर नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी और अन्य ज्ञानेन्द्र विरोधी राजनैतिक दलों ने लाखों लोगों की जन भावनाओं का नेतृत्व करते हुए नेपाल से दुनिया के सबसे पुराने राजतंत्र को इतिहास बना दिया। ज्ञानेन्द्र के पास शाही सेना थी जो काफी उम्दा हथियारों से लैस थी जो अमेरिका, भारत, इंग्लैण्ड और इजराइल से उसे हासिल हुई थी। एक लाख की तादाद वाली शाही सेना नेपाल के माओवादियों की जनमुक्ति सेना से कम से कम तीन गुना तो तादाद में थी ही, आधुनिक और उन्नत हथियारों की तो बात ही क्या! लेकिन शाही सेना अपने हथियार इस्तेमाल नहीं कर सकी। एक तो सड़कों पर निकले लाखों लोगों की भीड़ के सामने वे कितनी गोलियाँ चलाते, उससे भीड़ के हिंसक हो जाने का खतरा था। दूसरी प्रमुख वजह थी लाखों की तादाद वाले आम प्रदर्शनकारियों के साथ जनमुक्ति सेना के करीब बीस हजार जवानों की मौजूदगी।

अपने से कई गुना बड़ी और कहीं ज्यादा आधुनिक शाही नेपाली सेना को पराजित करने वाली, माओवादी प्रशिक्षण से तपी और नैतिक साहस से दमकती इस जनमुक्ति सेना का नेपाल के इतिहास में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान सुनिश्चित है। अब सोचिए कि जिस सेना ने क्रान्ति को अंजाम देने में इतनी अहम भूमिका अदा की हो, उसका नई सरकार बनने पर क्या सम्मान हुआ? सम्मान यह हुआ कि उसे पिछले तीन सालों से भी अधिक वक्त से बैरकों में रखा हुआ है। दरअसल अप्रैल 2006 के लोकतांत्रिक आंदोलन के बाद सात दलों के गठबंधन और माओवादियों के बीच हुए व्यापक शान्ति समझौते में इन बिंदुओं पर सहमति हुई थी कि –

  1. शाही नेपाल सेना का नाम बदलकर नेपाल सेना कर दिया जाए।

  2. माओवादियों की जनमुक्ति सेना और पूर्व शाही नेपाली सेना का एकीकरण किया जाए। इन दोनों सेनाओं द्वारा समझौते का पालन किया जाए, इसकी मॉनिटरिंग संयुक्त राष्ट्र संघ की एक टीम करे।

  3. जब तक एकीकरण का काम पूरा नहीं हो जाता तब तक किसी भी सेना में कोई नई भर्ती नहीं की जाए, और तब तक ये दोनों सेनाएँ अलग-अलग बैरकों व छावनियों में रहेंगी।

  4. सरकार में कोई भी पद ग्रहण करने वाला व्यक्ति जनमुक्ति सेना का सदस्य नहीं रह सकता।

इसी आधार पर कॉमरेड प्रचंड ने जनमुक्ति सेना से त्यागपत्र दिया, जिसके वे अध्यक्ष थे और प्रधानमंत्री बने। गठबंधन के भीतर आपसी समझ व विचार-विमर्श के बाद जनरल कटवाल को सेनाध्यक्ष बनाया गया। जनरल कटवाल ने जल्द ही प्रधानमंत्री कॉमरेड प्रचंड के निर्देशों की अवहेलना शुरू कर दी जो खिंचते-खिंचते मई 2009 में यहाँ तक आ पहुँचा कि कटवाल ने व्यापक शान्ति समझौते की शर्तों को दरकिनार करके 3000 सैनिकों की नेपाली सेना में भरती कर डाली। बहाना यह किया गया कि रोक तो नई भर्तियों पर है, रिक्त स्थान भरने पर नहीं। उस पर भी कटवाल तथा भारतीय राजदूत राकेश सूद ने जो गलतबयानियाँ कीं उनके समवेत असर से प्रचंड ने कटवाल को बर्खास्त कर दिया। प्रचण्ड के आदेश को अमान्य करते हुए नेपाल के राष्ट्रपति ने कटवाल को बहाल कर दिया। इसे अलोकतांत्रिक और सैनिक सर्वोच्चता कायम करने की कोशिश बताते हुए प्रचंड ने नागरिक सर्वोच्चता के खातिर प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

इन सारे घटनाक्रमों में सत्ता से फौरी तौर पर माओवादी अलग हो गए लेकिन उन्होंने उन आशंकाओं को निर्मूल भी सिद्ध किया कि सत्ता पाने के बाद माओवादी भी सत्ता में बने रहने के मोह का शिकार हो जाएँगे और आमूल परिवर्तनों की योजनाएँ धरी रह जाएँगी। प्रचंड के इस्तीफे ने जनता के बीच उनकी प्रतिष्ठा को मजबूत किया है, लेकिन अब जिन लोगों के हाथों में सत्ता है वे उसकी ताकत का इस्तेमाल संविधान को कमजोर करने में और माओवादियों को सत्ता से दूर रखने का हर संभव प्रयत्न करेंगे।

जारी…

लेखक विनीत तिवारी पत्रकार है तथा इंदौर के निवासी हैं. उनका यह लेख मध्‍य प्रदेश से प्रकाशित होने वाली पत्रिका लोकसंघर्ष में प्रकाशित हो चुका है.

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