ऐसे तो ध्‍वस्‍त हो जाएगा गोलघर

गोलघरराज्य सरकार राजधानी के सौंदर्यीकरण पर विशेष ध्यान दे रही है। पटना में जहां देखिये पार्कों का निर्माण हो रहा है लेकिन दूसरी ओर पटना की पहचान बन चुका गोलघर फिलहाल अपनी पहचान बचाये रखने के लिए संघर्ष कर रहा है। राजद सरकार के कालखंड में चमचमाते गोलघर पर वर्तमान सरकारी उपेक्षा के कारण अस्तिव का संकट मंडराने लगा है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण गोलघर की दीवारों पर बनी दरारें हैं। दरारें इतनी स्पष्ट हैं कि एक बार देख लेने पर शायद ही कोई व्यक्ति इस पर चढ़ कर गंगा का नैनसुख प्राप्त करने की नादानी करेगा। इसके अलावे गोलघर के दक्षिणी द्वार के मुहाने पर लगी ईटें खिसकने लगी है।

इन पर लगा ‘नोनी’ भी स्पष्ट देखा जा सकता है। अगर इस ‘नोनी’ का शीघ्र उपचार नहीं किया गया तो ये गोलघर के अकाल ध्वस्त होने का सबसे प्रमुख कारण बनेगा। विशेषज्ञ बताते हैं कि ‘नोनी’ का उपचार नहीं होने पर यह ईंटों को धीरे-धीरे चाट जाता है। इससे ईंटों से निर्मित कोई भी ढांचा समयकाल में अपनी मजबूती बरकरार नहीं रख पाता परिणाम स्वरूप यह ध्‍वस्त हो जाता है। इसका उपचार कर ढांचे को बचाया जा सकता है। गोलघर के मामले में यह और भी आवश्यक है क्योंकि यह विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल के साथ- साथ हमारा ऐतिहासिक धरोहर भी है। अगर इसका ख्याल नहीं रखा गया तो यह धरोहर कभी भी इतिहास के पन्ने में समा सकता है।

गोलघर फिलहाल कुव्यवस्था का भी घर बन चुका है। इसके मुख्यद्वार पर घुसते ही एक शिलालेख दिखती है, जो अब कचरा-स्पॉट बन चुका है। इस पर पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी द्वारा 6 फरवरी 2001 को जीर्णोद्धार कराये जाने की सूचना दर्ज है। संभवत: सत्ताच्यूत सरकार की सारी बातें भुला देनेवाला वर्तमान सरकारी तंत्र इस शिलालेख को अहमियत न दे, पर इससे भी बड़ी लापरवाही का पता तब चलता है जब नजरें गोलघर के मुख्य शिलालेख पर पड़ती हैं। इस पर अंकित है कि पटनावासियों को अकाल के समय भूख से बचाने के लिए अंग्रेजी हुकूमत द्वारा 20 जनवरी 1786 को कैप्टन जॉन गार्सटिन के नेतृत्व में यह गोदाम बनवाया गया था। हालांकि इन अक्षरों को मिटाने के प्रयासों को भी आसानी से देखा जा सकता है। इस अति महत्वपूर्ण धरोहर की सुरक्षा के लिए कोई इंतजाम नहीं किया गया है। इस वजह से कोई भी आने-जाने वाला व्यक्ति या युगल युवा जोड़ा अपने प्रेम को अमरता प्रदान करने के लिए इसे खरोंच जाता है। सिढि़यां चढ़ते हुए कई हीर-रांझा, रोमियो-जूलियट सरीखे दीवानों से परिचय हो जाता है।

हां, यहां आने पर अभी आपको एक बारगी यह भ्रम जरूर हो सकता है कि शायद इसके जीर्णोद्धार का काम चल रहा है, पर इस मुगालते में न रहें। गोलघर के चारों ओर बिखरे बालू-ईंट-कंक्रीट यहां बन रहे मार्केट परिसर के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। मार्केट परिसर बनाने का काम करीब डेढ़-दो सालों से चल रहा है। इतने दिनों से चल रहे निर्माण प्रक्रिया का ही नतीजा है कि अब मार्केट का अर्धनिर्मित ढांचा यहां आनेवाले लोगों के लिए मल-मूत्रा त्याग करने का स्थान बन गया है। उसकी बदबू भी लोगों को विचलित करती है। इसके साथ पूरे परिसर में फैला धूल-मिट्टी का अंबार किसी पर्यटक के मन को खिन्न करने के लिए पर्याप्त है। सुरक्षा के अभाव में शाम ढलते ही पूरा परिसर असमाजिक तत्वों का अड्डा बन जाता है। इसका सबूत भी यहां पड़े बीयर-शराब की बोतलें और पाउच देती है।

बहरहाल, पटना की पहचान बन चुका यह ऐतिहासिक धरोहर अपनी बदहाली पर आंसू बहाने को बेबस है। इसकी दुर्दशा देख कर भी राज्य सरकार खास कर पर्यटन विभाग की चुप्पी बिहार को वैश्विक पहचान दिलाने के दावों और विकास की पोल खोल रहा है। ब्रिटिश कालीन इस धरोहर का पिछले सप्ताह आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, पटना प्रभाग और आईआईटी इंडिया के विशेषज्ञों ने मुआयना किया। उनके अनुसार गोलघर के बगल की सड़क पर गुजरने वाले भारी वाहनों से उत्पन्न होने वाला कंपन का भी इस पर दुप्रभाव पड़ता है। बगल की सड़क पर भारी वाहनों का परिचालन बंद करने को लेकर परिवहन विभाग को पत्र भी लिखा जाएगा।

ऐतिहासिक धरोहर की सुरक्षा के बाबत पूछे जाने पर कला-संस्कृति विभाग के सचिव केपी रमैया ने बताया है कि पीपीपी मोड़ के तहत सुरक्षा गार्डों को नियुक्त किया जाएगा ताकि इसे क्षतिग्रस्त होने या अतिक्रमण से बचाया जा सके। योजना तो यह भी है कि ऐतिहासिक धरोहरों को हाइटेक लाइटिंग व्यवस्था के साथ सोलर उर्जा की चकाचौंध में उन्हें आकर्षक रूप दिया जाए। पर जब वह धरोहर ही ध्वस्त हो जाएगा तो फिर रोशन क्या उसके स्मारक को किया जाएगा?

लेखक दीपक कुमार पटना के निवासी हैं.

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