क्या दिसम्बर में डेनमार्क में बदलेगी दुनिया की तस्वीर?

पंकज चतुर्वेदीसमय हाथ से फिसलता जा रहा है। शायद सारी दुनिया आने वाले संकट की भयावहता के बारे में सही ढंग से विचार नहीं कर रही है। जो स्थितियां निर्मित हो रहीं हैं और जिस प्रकार से हम लापरवाह होकर सो रहे हैं वह एक बड़ी परेशानी का सबब है। ग्लोबल वार्मिंग और उसके कारण होने वाले जलवायु परिवर्तन जीवन के लिए बहुत घातक है। वैज्ञानिक अनुसंधान एवं परिणाम बताते हैं कि कार्बन डाई आक्साइड का वातावरण में स्तर अपेक्षा से कई गुना ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है। समुद्रीय इकाइयों में जल की अधिकता, सभी ग्लेशियरों के पिघलने के साथ-साथ समुद्रों का अम्लीकरण जैसी कई घटनाएं आने वाले भविष्य की कठिनाइयों की ओर इशारा कर रही हैं। इस समस्या पर मानवीय चेतना का पहला गंभीर प्रयास सन् 1992 में दिखा, जहां पर कि ब्राजील देश के रियोडिजिनरियो शहर में ‘पृथ्वी सम्मेलन’ का आयोजन किया गया जिसमें संयुक्त राष्ट्र संघ की पहल पर समस्त देशों के प्रतिनिधी एकत्रित हुए और ग्लोबल वार्मिंग से लड़ने के उपायों एवं योजनाओं पर चर्चा की गयी।

इस सम्मेलन में सभी ने एक संधि पर हस्ताक्षर किए कि हम सभी जलवायु तंत्र के साथ खतरनाक ढंग से बढ़ रहे मानवीय हस्तक्षेप को रोकेंगे। इस संधि पर हस्ताक्षर करने वाले सभी देशों ने जिनमें से ज्यादातर विगत 200 वर्षों से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए उत्तरदायी हैं, इन सभी ने जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से लड़ने की प्रतिबद्धता जताई। वहीं इसके बाद सन् 1997 में क्योटो प्रोटोकाल जिसके अंतर्गत लगभग 170 देश शामिल हैं, इन्होंने ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को सन् 2012 तक 5 से 7 प्रतिशत कम करने का निर्णय किया एवं इसके लिए मानदंड सन् 1990 के ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन स्तर को माना।

लेकिन क्योटो प्रोटोकाल के 2012 में समापन और 1992 से लेकर आज तक किये गये उपायों के आंकलन के बाद यह बिल्कुल स्पष्ट है कि परिणाम अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं हैं और आने वाले समय में जैविक एवं जलवायु परिवर्तन के पीछे ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन ही होगा, क्योंकि यह ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ावा दे रहा है। सन 2007 में इंडोनेशिया के शहर बाली में फिर इस विषय पर अंतरराष्ट्रीय स्तर की चर्चा का आयोजन हुआ और निर्णय लिया गया कि सन् 2009 दिसंबर में डेनमार्क के कोपन हेगन शहर में मिलकर कोई ठोस एवं सार्थक नीति एवं संधि बनायी जावे। इस बैठक एवं संधि में संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ-साथ विकासशील देश जैसे भारत, चीन, मेिक्सको, साउथ कोरिया आदि शामिल हैं। इन देशों के प्रतिनिधित्व का महत्व इसलिये और बढ़ जाता है कि यह सभी बड़ी तीव्र गति से औद्योगिकीकरण को बढ़ावा दे रहे हैं।

इस समस्या की गंभीरता इसी से आंकी जा सकती है कि स्वयं सं.रा.सं. के महासचिव बान-की-मून इस में रूचि लेकर ऐसा प्रयास कर रहे हैं कि विकास एवं औद्योगिकीकरण के साथ-साथ पर्यावरण का विनाश न हो ऐसा कोई मसोदा तैयार हो। श्री मून 2007 की बाली बैठक से इस दिशा में कार्य रहे हैं। इन प्रयासों के सार्थक परिणामों के लिए सं.रा. महासचिव 22 सितम्बर 2009 को विभिन्न राष्ट्र प्रमुखों से सं.रा. जनरल असेम्बली के पहले बैठक कर इस परिवर्तन से संघर्ष के बारे में बात करेंगे। इस बैठक में कोई ठोस योजना बने इसके लिए नार्वे के पूर्व प्रधानमंत्री हरलेम ब्रूडलेंड, चिली के पूर्व राष्ट्रपति रिचर्ड लागोस, बोत्सवना के पूर्व राष्ट्रपति फेस्तस मोगे सहित मेसेडोनिया के पूर्व विदेशमंत्री सर्जियन केरीम को मिलकर एक दल बनाया गया है जो महासचिव को इस मामले में सहयोग करेंगे।

अमेरिका में ओबामा प्रशासन का रूख इस दिशा में सकारात्मक है और शीघ्र ही यू.एस. कांग्रेस एक बिल का मसौदा तैयार कर रही है जिसके दिसंबर बैठक के पूर्व पारित होने की संभावना है, जो अमेरिका को संवैधानिक रूप से डेनमार्क में किसी संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए और मजबूती प्रदान करेगी। भारत को अन्य विकासशील देशों के साथ इस संबंध में कोई निश्चित कार्ययोजना का निर्माण करना चाहिए जिससे दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र विश्व मंच पर वैश्विक संकट से लड़ने की अगुआई एवं पथ प्रदर्शन कर सके। इस विषय पर पर्याप्त विलंब हो चुका है। जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम बहुत भयावह हैं। हथियारों के बजाय जिंदा रहने की स्थितियां निर्मित करना आवश्यक है और यह सब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग के बिना संभव नहीं है।

आशा है कि दिसम्बर में डेनमार्क दुनिया को ग्लोबल वार्मिंग से बचाने में सक्षम होगा।

लेखक पंकज चतुर्वेदी पर्यावरणविद हैं और एनडी सेंटर फार सोशल डेवलपमेंट एंड रिसर्च के अध्यक्ष हैं.

 

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