खाकी का खौफ या ख़ौफनाक खाकी

लीजिए, एक बार फिर खाकी वर्दी की हैठी को तोड़ने के लिए एक और कालमबाज़ सामने आ ही गया। समाज में व्याप्त विधि व्यवस्था के हालातों का पोस्टमार्टम करते-करते, राज-समाज की सच्चाइयों व स्वामियों से अवगत कराते वक्त और मीडिया में व्याप्त उठापठकों, मीडिया कर्मियों के छिपे चेहरे या धवल मुखड़े को दर्शाने के चक्कर में वह कभी यह सोच भी नहीं सकता था कि पुलिस की दादागिरी का पाला खुद उसकी मां यमुना सिंह से भी पड़ जाएगा। क्योंकि वह तो सभ्यता के चौखट के अंदर रहती हैं। लेकिन जिन अंग्रेजों ने हिन्दुस्तानी पुलिस का गठन भारतीयों पर राज करने के लिए किया था, वह पुलिस भी कभी सवर्ण तो कभी पिछड़े तो कभी दलित नेतृत्व की छांव में आज भी राज करने का ही काम कर रही है। यदि ऐसा नहीं होता तो यूपी के गाजीपुर के थाना नंदगंज की पुलिस कुछ भी वैसा नहीं करती, जैसा करके वह आज बदनाम हो रही है। उस पर आरोप है कि बिना महिला पुलिस के, बिना किसी वारंट के उसने कलमबाज़ की बूढ़ी मां यमुना सिंह को रात आठ बजे उसके घर से उठा लिया और अगले दिन एक बजे दोपहर में रिहा किया।

पुलिस ने इन 18 घंटों में यमुना सिंह या पत्रकार यशवंत सिंह की एक भी दलील सिर्फ इसलिये नहीं सुनी की पुलिस के थाना क्षेत्र में पंचायत चुनाव के दौरान ग्राम प्रधान पद के प्रत्याशी राम निवास सिंह उर्फ नेमा भैय्या पर कुछ लोगों ने जानलेवा हमला कर दिया था, जिसमें किसी एक समर्थक की मौत हो गयी थी। संयोगवश वह प्रत्याशी ग्राम प्रधान का ही चुनाव लड़ रहे एक प्रत्याशी, जो कि यशवंत सिंह का चचेरा भाई है, का मुख्य प्रतिद्वंदी है। यही वजह है कि पुलिस ने यशवंत के चचेरे भाई की तलाश करने के बजाय उनकी चाची रीता सिंह, भाभी सीमा सिंह और मां यमुना सिंह को भी बिना महिला पुलिस या वारंट के रात में घर से उठाकर थाने ले गयी और तब तक रिहा नहीं किया, जब तक कि वह आरोपी  सरेंडर नहीं कर दिया।

एक प्रकार से तो पुलिस अपने मिशन में सफल रही लेकिन इसी चक्कर में उसने जिस प्रकार से एक सभ्रांत परिवार के इज्जत के साथ खिड़वाड़ की, वो भी तमाम कानूनों को धत्‍ता बताकर, यह निश्चय ही पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़ा करता है। सवाल तो यह भी है कि बिखर चुके संयुक्त परिवार की सच्चाई को भी वह अपनी वर्दी हठ के सामने स्वीकार करने को तैयार नहीं है। क्योंकि वह ऐसा करती तो एक पत्रकार को ठेस नहीं पहुंचता। यशवंत की बातों में दम है कि अभियुक्त चचेरा भाई जरुर है, लेकिन चूल्हा-चौका वर्षों से अलग हो चुका है। खेती-बारी सब अलग-अलग है। बावजूद इसके पुलिस यमुना सिंह को क्यों जबरन उठा लिया इसका जवाब अभी तक यशवंत को नहीं मिला है।

यशवंत की मानें तो स्थानीय पुलिस हालात से अवगत होने के बाद भी और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद भी कुछ सुनने को तैयार नहीं थी उस दिन। हां यह जरुर है कि अब पुलिस की करतूतों के विरुद्ध उठाई गयी महिलाओं का बयान दर्ज कर लिया गया है। सो उम्मीद है कि आगे कार्रवाई भी होगी। यशवंत का यह कहना सही है कि जब उसकी मां का हत्यारोपी से दूर-दूर तक का कोई वास्ता नहीं है तो फिर उन्हें किस जुर्म में पुलिस अपने साथ ले गयी। दूसरा जवाब क्षेत्र के आला पुलिस अधिकारियों के पास भी नहीं है। हैरत की बात तो यह है कि इस मामले में अधिकारियों से गुहार लगाने के वाबजूद अभी तक किसी भी पुलिसकर्मी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई है।

लेखक देवनाथ अमरभारती के समाचार संपादक हैं.

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