गोपीनाथ की मजबूरी, बीजेपी छोड़कर कहीं नहीं जा सकते

निरंजन परिहार गोपीनाथ मुंडे के बारे में लोग अपना ज्ञान दुरुस्त कर लें। ज्ञान यह है कि वे कहीं नहीं जाएंगे। ना कांग्रेस में, ना राष्ट्रवादी कांग्रेस में और ना ही शिवसेना में। वे लोग, जो चीख- चीख कर कह रहे हैं कि मुंडे बीजेपी छोड़ देंगे, वे सिर्फ मुंडे की हवा बना रहे हैं। जो लोग थोड़ी बहुत राजनीतिक समझ रखते हैं, वे यह अच्छी तरह से जानते हैं कि बीजेपी के अलावा उनके लिए कहीं कोई ठिकाना नहीं है। ज्यादा साफ साफ सुनना है तो सच यह है कि प्रमोद महाजन ने किसी भी दूसरी पार्टी में ऐसा कोई खेत नहीं खरीदा, और ना ही उसमें कोई फसल बोई कि उसे काटने मुंडे वहां पहुंच जाएं।

राजनीति में रिश्तों की महिमा के मायाजाल का भी अपना एक अलग संसार है। इसलिए सिर्फ इतना समझ लीजिए कि मुंडे अगर प्रमोद महाजन के बहनोई नहीं होते, तो बीजेपी में वे आज क्या, कहां और किस हालत में होते, यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है। लेकिन यह बताने की जरूरत है कि अपने को मजबूत साबित करने की कोशिशों में गोपीनाथ जो गड़बड़ कर रहे हैं, उससे बीजेपी कमजोर हो रही है, यह हकीकत है। और, यह भी हकीकत है कि इस देश की राजनीति में कोई भी, कभी भी, कहीं भी आता जाता रहा है। लेकिन हुलिए और हालात, दोनों पर गौर करें, तो मुंडे आज तो क्या, कभी भी, कहीं नहीं जाएंगे। और, इसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि बीजेपी जैसा पद और कद उनको और कहीं भी हासिल नहीं होगा। यह बात मुंडे को भी पता हैं। मगर उनको यह भी पता हैं कि रह रहकर अपने ऐसे तीखे तेवर दिखाकर ही वे बीजेपी में खुद को और ताकतवर साबित कर सकते हैं। मुंडे अपने तरीकों से यह ताकत इसीलिए दिखा रहे हैं। बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने 2008 में जब मधु चव्हाण को मुंबई बीजेपी के अध्यक्ष के पद पर बिठाया, तो मुंडे ने लगभग पार्टी छोड़ने का ऐलान सा कर दिया था। और, बीजेपी ने नतमस्तक होकर चव्हाण को तीन दिन बाद ही हटा दिया। और मुंडे की मर्जी के आदमी को मुंबई की बीजेपी सौंप दी।

मूल्यों और सिद्धांतों की राजनीति करनेवाली बीजेपी का यह एक अलग चेहरा था। पर, क्या किया जाए, सवाल मुंडे को सहेजने का था। बाद में तो खैर, मुंडे को लोकसभा में उपनेता का पद देकर और भी ताकत बख्शी गई। पर, मुंडे तो मुंडे हैं। उनकी नितिन गड़करी से खटकी हुई है। इसीलिए अब एक बार फिर पुणे में शहर अध्यक्ष पद पर एक बने बनाए अध्यक्ष को हटाकर पिछली बार की तरह ही अपने आदमी को बिठाने की कवायद में फिर से पार्टी को झुकाने पर तुले हुए हैं। यह मान लिया कि महाराष्ट्र में एक जमाने में पद और कद दोनों में मुंडे के मुकाबले गड़करी बहुत छोटे थे। मुंडे उपमुख्यमंत्री थे, और गड़करी मंत्री। और मुंडे जब पूरे महाराष्ट्र के होने के साथ राष्ट्र के भी नेता बनने की कोशिश में थे, तब गड़करी महाराष्ट्र के सिर्फ एक हिस्से विदर्भ के भी पूरी तरह नेता नहीं थे। यह उस जमाने की कथा है जब प्रमोद महाजन के विराट आकाश के साये का संसार और विशाल हो रहा था। मगर मुंडे पता नहीं यह क्यों भूल गए हैं कि आज महाजन इस दुनिया में नहीं है, और गड़करी देश में बीजेपी के सबसे बड़े पद पर बिराजमान हैं।

प्रकाश जावड़ेकर ने दिल्ली में बैठकर बिल्कुल ठीक कहा, कि महाराष्ट्र में सब कुछ ठीक ठीक है। कोई संकट नही है। जावड़ेकर जब यह कह रहे थे, तो उनके चेहरे पर आश्वस्त भाव इसलिए भी साफ झलक रहा था, क्योंकि मुंडे की फितरत से वे कई सालों से अच्छी तरह वाकिफ हैं। मुंडे और उनकी राजनीति के सारे ही समीकरणों के राज अपन भी अच्छी तरह जानते हैं। इसलिए यह साफ कहा जा सकता है कि प्रमोद महाजन की वजह से बीजेपी के भीतर भले ही मुंडे अपने आप को बहुत महत्वपूर्ण साबित करने में सफल रहे हों, लेकिन महाराष्ट्र की दूसरी किसी भी पार्टी के लिए वे कोई बहुत उपयोगी नहीं है। चमचागिरी की कोशिश में मुंडे के चंगू उनको ओबीसी का बहुत बड़ा नेता बताते रहे हैं। मगर, मुंडे का मन खुद भी मानता है कि महाराष्ट्र के भीतर ही नहीं, सह्याद्री की पहाड़ियों के पार भी ओबीसी की नेतागिरी में छगन भुजबल उनसे बहुत बड़े हैं। महाराष्ट्र में उनके मुकाबले मुंडे की कोई हैसियत नहीं है। भुजबल देश भर में निर्विवाद रूप से ओबीसी के सबसे बड़े नेता हैं, यह वे बिहार जाकर 30 लाख लोगों को जुटाकर देश के अब तक के ज्ञात इतिहास की सबसे बड़ी रैली करके साबित भी कर चुके हैं। यह तो भला हो रिश्तेदारी का, कि महाजन के बहनोई होने की वजह से बीजेपी में मुंडे को एक मजबूत हैसियत हासिल हो गई। मगर, आज ना तो महाजन आज हमारे बीच है, और ना ही बेचारी बीजेपी इतनी ताकतवर, कि उसको इस कदर झिंझोड़ा जाए। इस सबके साथ यह भी ख्‍याल में रखना चाहिए कि राजनीति में बाकी सारी बातों के अलावा धैर्य और प्रतीक्षा का भी बहुत बड़ा महात्म्य है। मुंडे को यह समझना चाहिए कि गड़करी कोई पूरी ऊम्र के लिए बीजेपी के अध्यक्ष नहीं बने हैं कि उनसे खुंदक निकालने की कोशिश में रह रहकर पार्टी को नीचा दिखाया जाए।

उद्धव ठाकरे से मुंडे के मिलने पर भाई लोगों ने खूब अंदाज लगाया कि वे शिवसेना में जा सकते हैं। अपनी बात के समर्थन में लोगों ने कई सारे तर्क भी गढ़ लिए। लेकिन दूसरे ही दिन मुंडे राष्ट्रवादी कांग्रेस के छगन भुजबल के घर पहुंच गए। और उससे अगले दिन महाराष्ट्र राष्ट्रवादी कांग्रेस के अध्यक्ष मधुकर राव पिचड़ मुंडे के घर चाय पीने गए, कइयों ने यह अंदाज लगाया कि राष्ट्रवादी कांग्रेस में उनके लिए जगह बनाई जा सकती है। उनके कांग्रेस में जाने की भी खबरों ने भी जन्म लिया। लेकिन ऐसा कुछ भी होनेवाला नहीं है। बीजेपी छोड़कर जाना मुंडे के लिए मुनासिब नहीं है। या यूं भी कहा जा सकता है ऐसा करना मुंडे के लिए मुसीबत से कम नहीं होगा। जब अपन यह दावा कर रहे हैं, तो जरा इसका गणित भी समझ लीजिए। मुंडे ने बीजेपी में बड़े नेता होते हुए भी बहुत छोटे छोटे मामलों में पार्टी को सार्वजनिक रूप से झुकाकर उन्होंने जिस तरह की अपनी छवि बनाई हैं, उसको देखकर कौन पार्टी उनको घास डालेगी? जवाब निश्चित रूप से आपका भी ‘कोई नहीं’ ही होगा। मुंडे का यह गणित अब सभी जान गए हैं। और राजनीति में आपका गणित बाकी लोग जब समझने लग जाएं, तो वह गणित न होकर सिर्फ एक मजाक रह जाता है। मुंडे इसीलिए बाकी राजनीतिक पार्टियों के लिए मजाक बने हुए हैं। मजाक नहीं होते, तो उस दिन मीडिया के सवाल में मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण उलटकर हंसते हुए यह सवाल नहीं पूछते कि ‘मुंडे का क्या अब मुझसे मिलना ही बाकी रह गया है।’  इसीलिए अपना कहना है कि मुंडे कहीं नहीं जाएंगे। नाराजगी जताकर वे सिर्फ अपने बारे में हवा बना रहे हैं। खबरों में रहना उन्हें आता है और यह उनकी आदत में भी शामिल है। और आदत से मजबूर आदमी अदना होने के बावजूद औरों को उनकी औकात दिखाने की कोशिश में ऐसे काम अकसर किया करता है। गोपीनाथ यही गड़बड़ कर रहे हैं! मगर इससे बीजेपी की बदहाली हो रही है, यह चिंता किसको है?

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्‍लेषक और जाने माने पत्रकार हैं.

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