गौरहारी गांव को मौत के मुहाने पर खड़ा कर दिया पहाड़ माफियाओं ने

पिछले छह वर्षों से सूखे और तंगहाली से त्रस्त रहा बुंदेलखण्ड का गौरहरी गांव के लोगों के सामने अब एक और नया संकट खड़ा हो गया है। संकट है उनकी जिंदगी का, जिसे दैवीय आपदा ने नहीं बल्कि पहाड़ के माफियों ने इस स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। बुंदेलखण्ड का चित्रकूट हो अथवा बांदा हमीरपुर हो या महोबा। सभी जगहों पर पिछले छह वर्षों से गरीबी और भूख से तड़प रहे किसानों की इस वर्ष भगवान ने सुन ली। इस वर्ष देश के अन्य हिस्सों के साथ साथ बुंदेलखण्ड में भी अच्छी बारिश हुई, लिहाजा फसल की पैदावार भी अच्छी होने के आसार हैं। लेकिन पहाड़ माफिया बुंदेलखण्ड की खनिज सम्पदा का दोहन करते हुए अपनी अमीरी बढ़ाने में लगे हुए हैं। माफियाओं की मनमानी तो देखिए एक आबाद गांव के नीचे खोद डाली है लंबी सुरंग।

बुंदेलखण्ड के महोबा जिले का चार हजार से अधिक की आबादी वाले गौरहरी गांव के मकानों और बाशिंदों की स्थिति देखकर यहां के लोगों की गरीबी का अंदाजा लगाया जा सकता है। लेकिन इनके मकानों के नीचे ऐसी बेशकीमती सम्पदा पड़ी है, जिसकी कीमत देश के अमीरों द्वारा लगाई खतराजाती है। तो विदेशों में भी इसकी कीमत मुंहमांगी मिलती है। गौरहरी के कल्लू का कहना है कि इस खनिज सम्पदा पर ग्रामीणों का अधिकार नहीं बल्कि उन पहाड़ माफियाओं का कब्जा है जो शासन और प्रशासन के प्रतिनिधियों को अवैध खनन के लिए मुंह मांगी रकम देते हैं।

दरअसल इन गरीबों के मकानों के नीचे ऐसे पत्थरों की खान है जो देश में केवल और केवल महोबा जिले के इसी गौरहरी गांव में पाया जाता है। इस पत्थर को देश और विदेशों में गौरा पत्थर के नाम से जाना जाता है। इन पत्थरों से देवी और देवताओं की मूर्तियां, पावडर और बर्तन के साथ-साथ अमीरों के महलों के साज सज्जा के सामान बनाए जाते हैं। इसके अलावा गरीबों की रोटी पर डाका डाल कर अमीर बन बैठे लोग अपनी शान-ओ- शौकत को और ऊंचा दिखाने के लिए अपने महलों में भी इन्हीं पत्थरों का उपयोग किया करते हैं।

बेशकीमती गौरा पत्थर के ढेर पर बसे इस गांव के चार हजार से अधिक लोग मौत खतराके मुहाने पर खडे़ हैं। इन पत्थरों को निकालने के लिए पहाड़ माफियों ने घरों के नीचे लंबी सुरंग खोद डाली है। समूचा गांव दस मीटर मोटी धरती पर बसा है और गांव के मकान हवा में लटककर अपने गिरने के इंतजारी में है। ऐसे में तनिक भी भूस्खलन या कम्पन पूरे गांव की आबदी को मौत के मुहाने पर ले जा सकता है। गांव के राम खेलावन, धर्मजीत बताते है कि गांव का एक भी मकान ऐसा नहीं जिसकी दीवारें फटी न हों। डायनामाइट के द्वारा जब खान में विस्फोट कर पत्थर तोड़ा जाता है तो पूरा गांव थर्रा उठता है। इतना ही नहीं पहाड़ माफिया इस खतरनाक काम में नाबालिग बच्चों को भी लगाते हैं।

गांव के नीचे बड़ी-बड़ी सुरंग खोदकर मनमानी कर रहे ठेकेदारों की शिकायत जब ग्रामीणों ने प्रशासनिक अधिकारियों से करनी चाही तो ठेकेदारों ने उनका मुह बंद करने का भी तरीका बेहद खतरनाक उठाते हैं। खतराअधिकारियों के पास जाने वाले ग्रामीणों की लाठियों से पिटाई की जाती है और मुंह बंद न करने पर जान से मारने की धमकी भी दी जाती है। खान में खतरनाक काम करने वाले मजदूरों तथा मकान गिरने से ग्रामीणों के मौत का सिलसिला भी शुरू हो चुका है। लेकिन आंख बंद कर सब कुछ देख रहे अधिकारियों के कान में मर चुके मजदूरों तथा ग्रामीणों के परिजनों के करूण क्रंदन सुनाई नहीं देते। ग्रामीणों का आरोप है कि ठेकेदार मृत मजदूरों तथा ग्रामीणों के परिजनों को 10-20 हजार रूपए देकर मामला शांत कर देते हैं।

रो-रो कर अपनी बर्बादी की कहानी बता रहे ग्रामीण जब पहाड़ माफियों के मनमानी की शिकायत नीचे से लेकर ऊपर तक के अधिकारियों से कर चुके हैं। तो फिर वह कौन से कारण हैं जिससे कार्रवाई नहीं हो रही है। अधिकारी जांच कर कार्रवाई की बात तो कर रहे हैं, लेकिन अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई और सुरंगों पर बसे ग्रामीणों को कैसे बचाया जाएगा, फिलहाल उनके पास कोई जवाब नहीं है। पहाड़ माफियों के आदेश पर पत्थरों पर हथौडा चलने पर वहां के किसान खासे खतराआक्रोशित हैं। किसानों का कहना है कि हथौडे पत्थरों पर नहीं बल्कि उनके सीने पर चल रहे हैं और बुंदेलखण्ड को बर्बाद करने में पहाड़ माफियों की मनमानी अब ज्यादा दिन नहीं चलेगी। फिलहाल माफियों की मनमानी जारी है और ग्रामीणों के सीने में विरोध की आग धधक रही है।

प्राकृतिक सम्पदा के अत्यधिक दोहन से मौसम का मिजाज बदल रहा है। पहाड़ों से पेड़ों का कटान फिर अनाप शनाप कमाई की लालच में ऊंचे पर्वतों के जमींदोज होने से बादलों ने भी पिछले छह वर्षों तक बुंदेलखण्ड से मुंह मोड़ लिया था। फिलहाल प्रकृति और माफियाओं के बीच मचा घमासान जारी है तथा कानून के रखवाले माफियाओं का साथ दे रहे हैं। लेकिन इस युद्ध में उन ग्रामीणों का क्या दोष जो अपने आंखों के सामने माफियों द्वारा अपने बर्बादी की कहानी लिखते हुए देख रहे हैं। फिलहाल ग्रामीणों में जर्बदस्त रोष है और उनके सीने में धधक रही प्रतिरोध की चिंगारी कभी भी ज्वाला का रूप ले सकती है।

लेखक सुरेश मिश्र पत्रकार हैं.

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