चलो रवीश कुमार रवीश कुमार खेलते हैं…

हम मुद्दों से ज्यादा ऑल टाइम मीडिया पर लिख रहे हैं। पत्रकारों पर लिख रहे हैं। बेवजह उन्हें घसीट रहे हैं। दो-चार जाने-पहचाने चेहरों को पकड़ लेते हैं, और उन्हें ट्रोल करा देते हैं। ख़बरर्ची ख़बर से बड़ा बना दिया गया है। लोग एंकर के मुंह से ख़बर सुनने की बजाय दूसरों से एंकर की ख़बर सुन रहे हें। पत्रकार ख़बरों का विश्लेषण करने की वजाय मीडिया का विश्लेषण ही करने में लगे हैं। हर कोई हर दूसरे घंटे पर मीडिया पर बैठा लेक्चर दे रहा है। मीडिया बर्बाद है, बिक गई है, वो उसका चमचा है, वो भक्त है, वो आपिया है। सब मुद्दे गायब हैं। ईमानदारी से बोल रहा हूं- हम पत्रकारों से अच्छी वैश्या होती हैं (हालांकि वो समाज में सबसे अच्छी होती हैं) कम से कम अपने प्रोफेशन पर गर्व तो करती हैं। यहां तो पत्रकारों ने ही पत्रकारिता को गेट के बीच में फंसी हुई कुतिया बना दिया है। हर कोई आता है और मारता है।

ग़ज़ब है, यार..सही में हमारी मीडिया का कोई स्वर्णकाल नहीं था…लेकिन इतना श्मशानकाल भी कभी नहीं था। दोनों धड़े हर तीसरे दिन अपने-अपने घिसे-पिटे मुथरे पड़ चुके हथियारों के साथ निकल आते हैं। दोनों को इसमें नेम और फेम दोनों मिलते हैं। मुद्दों की तो कमी है ही नहीं। लेफ्ट वालों को लगता है कि दूसरे समूह के लोग चुतिए हैं, उन्हें कुछ आता ही नहीं। उन्होंने किताबें ही नहीं पढ़ी। जबकि इसी वक्त वो भूल जाते हैं कि पूरी दुनिया ने राइट को स्वीकार किया है। वहीं, राइट वालों को लगता है कि ये वामपंथी गधे होते हैं किताबों के सिवाय इन्हें कुछ नहीं आता। जनता ने इन्हें नकार दिया है। इन दोनों के बीच में जो पत्रकारिता के मानकों पर खरा उतरकर सरोकार की पत्रकारिता करने का साहस करता है उसे सबसे ज्यादा प्रताड़ित करने की कोशिश की जाती है। उसे गालियां दी जातीं है। गुंडे पीछे लगाए जाते हैं। धमकाया जाता है। उसका ब्लॉग हेक किया जाता है। उसके दफ्तर के सामने भी कुछ टुच्चे पहुंच जाते हैं।

ये सब गुस्ता फूट रहा था उस काली स्क्रीन के ख़िलाफ़ जो पत्रकारिता के इतिहास में एक इतिहास के तौर पर दर्ज हो गई। ये चल ही रहा था…तब तक उसने बागों में बहार ला दी। अब बहार तो राइटवालों को कभी पसंद थी ही नहीं, वो भी रवीश के द्वारा लाई हुई…इसीलिए यही होना था जो हो रहा है। महाराज, सच सच बोलिए, दिल खोल कर बताइए। मेरा भाई शराबी है इसलिए मैं पत्रकारिता नहीं कर सकता, जबकि मैंने पान बहार भी नहीं खाया ? मेरा भाई कथित तौर पर एक मामले में फंस गया..क्या इसका मतलब पच्चीस सालों मेरी पत्रकारिता बेकार हो गई। पत्रकारिता शुरू करने से पहले अपने परिवार से कह देता कि भाई अब आप लोग कुछ मत करो। गज़ब दौर है बे…ग़ज़ब की बुध्दिजीविता है…गज़ब के तर्क हैं। इनका कहना है कि आपके भाई ने कांड किया है तो आपने सफाई क्यों नहीं दी।

सुनो, पहली कांड किया है या नहीं सिद्ध नहीं हुआ। दूसरा, अगर सिद्ध हो भी जाता है तो मेरे भाई को सज़ा मिलेगी या मुझे? अगर कोर्ट उसकी जगह मुझे सजा दे दे क्योंकि मेरा नाम रवीश कुमार है तो मैं मांफी भी मांग लेता हूं।  तीसरा, तुम्हारा घटिया-सा सवाल है कि तुम्हारे चैनल पर ख़बर क्यों नहीं चली..ग़ज़ब है भाई, मैं अपने चैनल का एडिटर इन चीफ हूं क्या जो मैंने ख़बर रोक दी। अभी कुछ दिनों में तमाम लोगों का दलित प्रेम उमड़ आया है। मुझे सच में इससे हमदर्दी है, उम्मीद करता हूं दूसरों दलितों के मुद्दों पर भी ये लोग इतने ही मुखर होंगे जितने इस पर जो अभी सिद्ध नहीं हुआ है।

पता है, इस पूरे खेल में सबसे रोमांचक होता है…कुंठित लोगों की कुंठाओं को देखना। बहुत मजा आता है. रवीश से सालों से कुंठा भरी पड़ी थी, चांस ही नहीं मिल रहा था. अब सस्ता चांस ढ़ूंढ वो भी किसी दूसरे के आरोप को जबर्दस्ती उसके ऊपर मढ़ कर। सच बता रहा हूं, आप ऑव्जर्व करना इस चीज़ को। और हां, ये दोनों तरफ से है। लेफ्ट की तरफ कुछ ऐसे लोग हैं जिन्हें अब कोई सीरियस नहीं लेता, मतलब वो लगभग पत्रकारिता से रिटायर्ड हो चुके हैं…तो ऐसे वक्त ये लोग रवीश के पक्ष में हथियार लेकर खड़े होने का दिखावा करते हैं…जिससे खुद उन्हें दो-चार वेबसाइट छाप दें। एक दूसरे तरह के लोग भी हैं लेफ्ट की तरह जो नंबर वन के चुतिए होते हैं…उन्हें सिर्फ सिर्फ इतना आता है कि अनपढ़-गंवार है। लेफ्ट वालों के लिए और रवीश के लिए भी ऐसे लोग सबसे ज्यादा ख़तरनाक हैं.

ये लोग राइट को पूरे दिन अनपढ़-गंवार बोलते रहते हैं, खुद प्रेमचंद को भी नहीं पढ़ा महाशय ने। खैर, छोड़ो। अंत में इतना जान लो, कि दुनिया की कोई भी ताकत सच को हरा नहीं सकती, तुम ज्यादा लोगों को कुछ दिनों के लिए भ्रमित कर सकते हैं…। अरे, चलो फिर चलते हैं- रवीश कुमार-रवीश कुमार ख़ेलते हैं।

चमन कुमार मिश्रा
पत्रकारिता का विद्यार्थी
chamanmishra33@gmail.com

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