चुनावी बरसात के गोपाल मेढ़क

शिवाशंकर रिमझिम हल्की बारिश के बीच गॉंव की बैठकी में सवाल दर सवाल उठाए जा रहे थे। जवाब पूरी तरह नदारद थे। सवालों के बीच निरुत्‍तर चाईं कोहार बगलें झांक रहे थे। उधर, मदनलाल, बल्लू, श्‍यामू, लाल बाबा, गजानंद, बद्री अहीर, अलगू कोहार मंद-मंद मुस्करा रहे थे। चेहरे पर भाव थे कि अब बताओ बेटा, अपने को दिल्ली रिटर्न बताते हो, अब मुंह से बोली काहे नहीं निकल रही। वाकई गजब का सीन था। गॉंव की त्रिमुहानी वाले पीपल के पास हनुमान मंदिर के चबूतरे पर हर बार की तरह इस बार भी निठल्लों की जमात जुटी थी। यहां की बहस संसद सत्र में होने वाली बहसों को मात दे रही थी।

बहरहाल, गॉंव की बैठकी में आज जो कुछ भी हुआ उसे जानना इसलिए भी जरूरी है कि यह जाना जा सके कि देश के नीति नियंता और महाप्रभु बनने की होड़ में शामिल इन नेताओं के बारे में आमजन की सोच किस कदर बदलने लगी है। तो, किस्सा कोताह यह कि गॉंव के निठल्लों की जमात में बिन बुलाए मेहमान की तरह चांई कोहार भी खरामा-खरामा जा पहुंचे। बुजुर्ग बद्री अहीर के पहुंचते ही वहां पहले से बैठे श्‍यामू गुरु चहक उठे-बस तुम्हारी ही कमी रह गई थी। जवाब में चाईं धीमे से मुस्करा उठे। चाईं कोहार के बैठते ही श्‍यामू गुरु बोले-विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही बरसाती मेढक की तरह नेता उतराने लगे हैं। लकालक होर्डिंग्स और कटआउट से सड़कें पटने लगी हैं। सड़कों पर तो चलना मुश्किल हो गया है। अलगू कोहार ने हामी भरी। बोले-लाखों करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाने वाले राजनीति के इन नए बछेड़ों को कौन समझाए कि कटआउट, होर्डिंग्स के बल पर कितने दिन चलेगी राजनीति।

सच्ची बताएं, निठल्लों की बैठक में अभी यह बातें चल ही रहीं थी कि मौके पर आ पहुंची पंडिताइन भौजी। मीठी झिड़की देते बोलीं-चुप भी करिये लल्ला, अब राजनीति और नेताओं पर भले लोग चर्चा तक करना पसंद नहीं करते। पंडिताइन भौजी की बात सुन गुस्से में पिनक गए चाईं कोहार। तेज आवाज में बोले-ऐसे हालात में जनता नहीं चेतेगी तो सब कुछ बंटाधार नहीं हो जाएगा? चाईं कोहार के गुस्से पर दिलकश मुस्कान के छींटे मारती पंडिताइन भौजी ने सहमति दिखा माहौल को पहले अनुकूल किया फिर बोलीं- हुंह, बाजार लगी नहीं कि गिरहकट आ गए। भौजी की मुस्कराहट ने असर किया। पंडिताइन भौजी की बात से सहमति जताते हुए चाईं कोहार बोले- सही बात। चुनाव नजदीक देखते ही बरसाती मेढक फुदकने लगे हैं। भांति-भांति आवाज में इनकी टर्राहट देखते ही बन रही है। संपादकजी, गॉंव में चलने वाली निठल्लों की इस बार की बैठक का समापन इस निर्णय से हुआ कि हम जनता को मूरख समझने वाले इन बरसाती गोपाल मेढकों को समझना जरूरी है। गौरतलब है कि पंडिताइन भौजी और चाईं कोहार की बातों से अब गॉंवों में रहने वाले अलगू, श्‍यामू गुरु, लालबाबा, नरोत्तम तेली सरीखे कई लोग सहमत होने लगे हैं। याद आ रही है अरमान गाजीपुरी के कविता की लाइनें-

पत्थर कहा गया कभी शीशा कहा गया
जो जैसा था उसे यहां वैसा कहा गया
क्या जाने कितनी खूबियां थीं गुनहगार में
महश्‍ार में जब गया तो वह अच्छा कहा गया

लेखक शिवाशंकर पांडेय दो दशक तक दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिंदुस्‍तान समेत कई बड़े संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उनसे सम्‍पर्क 09565694757 एवं shivashanker_pandey@rediffmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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