क्रांति के दीवानों ने जिस कलम की धार से अंग्रेजी शासन के खिलाफ बगावत पैदा करके देश को आजाद कराया था, वही कलम आज कारपोरेट घरानों के लिए मोटी कमाई का जरिया बन गई है। दबे-कुचलों और शोषितों की आवाज को जन-जन तक पहुंचाने के लक्ष्य को लेकर शुरू हुई मिशन पत्रकारिता वर्तमान परिवेश में माफियाओं, नेताओं, अपराधियों और फिल्मी सितारों की पब्लिसिटी का जरिया बन कर पीत पत्रकारिता में तब्दील हो गई है।
विडंबना है कि जो माध्यम लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने, गैरकानूनी कारनामों को उजागर करने और दोषियों को सजा दिलाने के लिए उपयोग किया जाता था, वह आज अपराधियों और दोषियों की सुरक्षा कवच बन गई है। धन और विलासता की चाहत में पत्रकारिता के नियम और कानूनों को ताक पर रख दिया गया है। महानगरों और शहरों में बैठे पत्रकारिता के आकाओं ने मीडिया जगत में ऐसे जाल बुन रखे हैं कि मिशन पत्रकारिता की चाहत रखने वाले युवाओं को मजबूर होकर पीत पत्रकारिता करनी पड़ती है अथवा दूसरे क्षेत्र में जाना पड़ता है।
देश के अति पिछड़े गांवों से दबे-कुचलों, उत्पीड़ितों और शोषितों की आवाज को मीडिया के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने की कोशिश में देश और राज्यों की राजधानी का रुख करने वाले युवा मीडिया हाउसेज के उच्च पदों पर आसीन पत्रकारिता के पुरोधाओं की राजनीति के शिकार होकर दो वक्त की रोटी के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो जाते हैं। बड़े मीडिया हाउसेज में संघर्षरत युवाओं को बिना रिफरेंस के प्रवेश तक नहीं मिलता। भारी जद्दोजहद के बाद अगर किसी मीडिया ग्रुप में उन युवाओं को काम करने का मौका मिल जाए तो वहां पत्रकारिता के सरोकार को भूल कर ही काम करना पड़ता है अन्यथा छुट्टी पक्की है।
महानगरों की पत्रकारिता में आम आदमी की दिक्कतों से पहले बाजारवाद की जड़ तलाशी जाती है। यदि पीड़ित की खबर से मीडिया हाउस को कोई नुकसान हो रहा है तो 12 से लेकर 40 पेज तक के अखबार में इस खबर के लिए जगह कम पड़ जाती है। ऐसा सिर्फ बड़े शहरों की पत्रकारिता में ही नहीं है। छोटे शहरों में भी यही हो रहा है। छोटे शहरों और जनपदों में पत्रकारिता के शौक के चलते अपने घर की पूंजी फूंक कर बिना पैसे के काम करने वाले लोग (पत्रकार कहना गलत होगा क्योंकि उनको मीडिया हाउसेज की ओर से कोई अथारिटी लेटर अथवा पहचान पत्र तक नहीं जारी किया जाता जिससे वे सूचना विभाग में पत्रकार के रूप में पंजीकृत हों सकें) एक से बढ़ कर एक खबर लाते हैं, लेकिन उसका फायदा दफ्तर में बैठ कर राजनीति करने वाले उठाते हैं। घर की पूंजी फूंक कर खबर लाने वाले को तो अपनी खबर पर नाम भी नहीं मिल पाता है। समस्याओं से भरे छोटे जनपदों के कथित पत्रकारों ने भी अब पत्रकारिता के शौक को व्यावसायिक बना लिया है। इससे पीड़ितों और शोषितों की सिसकती आवाजें मुख्यालय से दूर सुदूर गांवों में दम तोड़ रही है। क्या यहीं मिशन पत्रकारिता है?
मिशन पत्रकारिता के रूप में शुरू हुआ लेखनी का दौर इस समय संक्रमण काल से गुजर रहा है। इस संक्रमण काल में अपनी पारंपरिक पृष्ठभूमि से संपन्न चंद लोग मिशन पत्रकारिता को जीवित रखने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन पैसे के अभाव में प्रसार कम होने से उनकी लेखनी की धार शोषितों और पीड़ितों को राहत नहीं दिला पा रही है। ऐसे अखबारों का प्रसार और असर कम होने के कारण अच्छी से अच्छी खबर आम जनता से प्रतिक्रया नहीं हासिल कर पाती। ना ही मिशन पत्रकारिता को जीवित रखने के लिए निकाले जा रहे खबरनवीसों को जनता का सपोर्ट मिल पाता है। परिणामस्वरूप भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबी सरकारों के नुमाइंदे दफ्तरों में बैठकर रेवड़ी खाते नजर आते हैं। प्रिंटिंग के लिए आवश्यक कच्चे माल के महंगा होने से छोटे अखबारों पर आर्थिक संकट गहरा जाता है और ये अखबार धीरे- धीरे निकलना बंद हो जाते हैं। साथ ही मिशन पत्रकारिता के पुरोधाओं की कलम की धार भी कुंद हो जाती है। मिशन पत्रकारिता जगत के कई ऐसे अखबार हैं जो अब इतिहास बन कर रह गए हैं। कुछ निकल भी रहे हैं तो आम जनता की पहुंच से बाहर हैं। भ्रष्टाचार रूपी दानव के चंगुल में फंसे भारत की जनता न्याय के चौथे स्तंभ की भमिका को लेकर आशंकित है। वर्तमान दौर में मीडिया की भूमिका को लेकर बुद्धजीवियों में एक बहस छीड़ चुकी है जिसका जवाब किसी के पास नजर नहीं आ रहा है कि- क्या देश के तीनों पायों की तरह चौथा पाया भी पंगु हो जाएगा जिसे अभी तक पूर्णत: संवैधानिक अधिकार भी नहीं मिल पाया है?
लेखक शिव दास उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के गांव तिनताली के निवासी हैं। शिव पत्रकारिता में कई वर्षों के उतार-चढ़ाव के बाद इन दिनों दिल्ली में हैं। उनसे संपर्क करने के लिए उनके मोबाइल 09910410365 पर ट्राई कर सकते हैं या फिर उन्हें [email protected] पर मेल कर सकते हैं।

