जनता अब याचना नहीं रण करेगी

श्रीनिवासयाचना नहीं अब रण होगा, संघर्ष बड़ा भीषण होगा.. हाँ कुछ इसी  तर्ज़ पर अन्ना हजारे ने 4 अप्रैल, 2011 को दिल्ली के जंतर मंतर पर हुंकार भरते हुए.. जन लोकपाल विधेयक के मांग लिए आमरण अनशन पर बैठ गए. पूरे देश में एक स्वत:-स्फूर्त आंधी आयी और भारत की लाखों-करोड़ जनता अन्ना के इस मुहिम से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ गई.. जंतर- मंतर पर मानो हर दिशा से जन सैलाब सा उमड़ने लगा….पूरे वातावरण में वन्दे मातरम की जय घोष  सुनाई देने लगी.. उद्घोषों में इनती तीव्रता थी, मानो ऐसा लग रहा था कि ये आज आसमान का भी सीना वन्दे मातरम और जय हिंद के नारों से छलनी कर देंगे.. कारवां चल पड़ा था.

भ्रष्‍टाचार के खिलाफ अन्ना ने मोर्चा खोल दिया था.. जैसे जैसे वक़्त की सुइयां आगे बढ़ रही थी.. सत्ता में बैठे नेताओं की सांस फूल रही थी.. एक दिन बीता, सरकार के तरफ से बातचीत का बुलावा आया.. सरकार के तरफ से कुछ प्रस्ताव भी आये.. पर अन्ना को ये नामंज़ूर थे.. क्योंकि अन्ना ने सिर्फ उतना ही  माँगा था जितने से भ्रष्‍टाचार के खिलाफ लड़ाई की शुरुआत की जा सके और इससे कुछ भी कम अन्ना को मंज़ूर नहीं था.. खैर दो और दिन बीते, तीसरा दिन भी बीत गया.. बातचीत का सिलसिला चलता रहा.. अन्ना के नुमाइन्दों और सरकार की बीच अनशन के चौथे दिन सुबह 10 बजे बातचीत के लिए एक  और बैठक.. पर नतीजा सिफर.

इतना ही नहीं सरकारी बाबू कपिल सिब्बल ने तो ये भी घोषणा कर दी कि अन्ना की मांगे नहीं मानी जा सकती.. सरकार को लोकपाल तो मंज़ूर है पर जन लोकपाल कत्तई नहीं.. लेकिन अन्ना भी कहा मानने वाले थे.. कह दिया.. दिल दिया है, जान भी देंगे ए वतन तेरे लिए.. सरकार की सांस धौकनी की तरह चलने लगी.. चिंता होने लगी पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों की.. उन्हें लगने लगा कि कही ये हिंद का बूढ़ा शेर चुनावों में उनकी लुटिया ना डुबो दे.. और फिर बातचीत के लिए एक और वक़्त मुक़र्रर किया गया.. तारीख 8 अप्रैल वक़्त- शाम के 6  बजे, स्थल-कुशक रोड नई दिल्ली.. उधर जन लोकपाल के लिए सरकार के साथ बातचीत हो रही थी इधर जंतर मंतर सहित देश के तमाम हिस्सों से एक ही आवाज़ आ रही थी अन्ना तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ है.. अन्ना प्रेस को संबोधित कर रहे थे.. अपने चाहने वालों को भादोसा दिला रहे थे कि अभी तो सिर्फ चार दिन हुए हैं.. वो अभी छह दिन और बिना कुछ खाए पिए आराम से रह सकते हैं.. और उसके बाद भी सरकार नहीं चेती तो… बलिदान, बलिदान, बलिदान.

बलिदान की ये घोषणा सरकार के कानो में पहुंचते ही सरकार की फूलती हुई साँसें उखड़ने लगी.. और फिर आया वो एतिहासिक नतीजा.. जी सरकार ने अन्ना की सारी मांगे मान ली थी.. जन लोकपाल की बात मान ली गई थी.. जंतर-मंतर से जन कारवां इंडिया गेट की तरफ चल पड़ा.. अपनी विजय की घोषणा करने.. जिस रास्ते से ये काफिला गुजरता उन रास्तों पर मौजूद नेताओं के घरों के दरवाजे बंद हो जाते.. चोर हैं चोर हैं के नारों से नेताओं की हवेलियां  हिलने लगती.. क्या बच्चे क्या बूढ़े क्या जवान सभी जयघोष करते इंडिया गेट पर ये घोषणा कर रहे थे कि भ्रष्‍ट लोगों की अब खैर नहीं.. कोई नेता नज़र नहीं आ रहा था.. डर के मारे सभी अपनी मांदों में छिपे पडे़ थे.. क्यों कि गीदड़ों को ये मालूम था कि अन्ना रुपी शेर जंतर मंतर से दहाड़ रहा है और उसकी सेना भ्रष्‍टाचारियों को ख़तम करने कि कसम खा चुकी है.. अब कोई राजा, कोई कलमाड़ी, कोई कोड़ा, कोई पवार.. किसी की भी खैर नहीं.. एक जीत तो हो गई थी.. पर अभी भी एक सवाल बना हुआ है क्या हम इस जीत को असल अंजाम तक पहुंचा पाएंगे.. या कहीं ऐसा ना हो कि इस जीत को भी नेता रुपी जात हमसे झपट ले जाएँ.

लेखक श्रीनिवास प्रतिभाशाली टीवी जर्नलिस्ट हैं. इन दिनों भड़ास के माध्यम से छुट्टा पत्रकारिता कर रहे हैं.

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